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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

आलोचना तो हुई, मगर तारीफ़ क्यों नहीं?

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शिक्षा के क्षेत्र में आलोचना एक आदत का रूप ले चुकी है। लोगों के स्वभाव का हिस्सा हो चुकी है। ऐसे में जरूरी है कि इसी के समानांतर तारीफ़ करने की संस्कृति का विकास किया जाए। ताकि लोग खुले दिल से एक-दूसरे के अच्छे प्रयासों की तारीफ़ कर सकें।

इसके अभाव में शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त नैराश्य को कम करना और उसे उम्मीद की रौशनी से भरना संभव नहीं हो सकेगा।

समस्याओं के प्रति आकर्षण

कई बार विभिन्न समस्याओं के प्रति शिक्षकों का व्यवहार चुंबक की तरफ आकर्षित होने वाले लोहे की तरह होता है। जिसमें समस्या को चारो तरफ़ से घेरकर उसे और भारी बना देने की कोशिश होती है ताकि उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से लिया जाए।

इसके साथ ही उनके ऐसे सवालों के भी जवाब दिए जाएं, जिनके कोई जवाब किसी के पास हैं नहीं। क्योंकि समस्याओं को पोषने की परंपरा का निर्वाह करने वाली व्यवस्था में समाधान की संस्कृति का विकास होने में वक्त तो लगता है।

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