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एजुकेशन टिप्सः शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के 5 ख़ास तरीके

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कभी-कभी एक शिक्षक ही किसी बच्चे के जीवन में बदलाव का प्रमुख कारण बन जाता है। 

प्रभावशाली शिक्षण की बुनियादी बात है कि इसे दो-तरफा होना चाहिए। यानि ऐसे शिक्षण में संवाद की गुंजाइश हो और क्लासरूम में बच्चों की आवाज़ भी सुनाई देती हो। अपने क्लासरूम में संवाद की गुंजाइश बनाने की प्रक्रिया बग़ैर तैयारी के संभव नहीं है। तैयारी के साथ होने वाला काम दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ता है।

उदाहरण के तौर पर अगर आप छठीं कक्षा के बच्चों के साथ विज्ञान के कालांश में सजीव और निर्जीव वस्तुओं वाले टॉपिक को पढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पहले से सोचना होगा कि बच्चों के पूर्व-अनुभव क्या हैं? बच्चों से किस तरह के सवाल पूछने से संभावित जवाब कौन-कौन से आएंगे? बच्चों के परिवेश के हिसाब से इस टॉपिक को समझाने के लिए कौन से प्रयोग जीवंत रूप से आसपास मौजूद संसाधनों के माध्यम से किये जा सकते हैं।

1. पढ़ाने से पहले करें पूर्व-तैयारी

यानि संवाद की पूर्व-तैयारी कक्षा में आपके शिक्षण को जीवंत बना देगी। जब आप बच्चों के सामने होंगे तो पूरे कालांश की एक रूपरेखा आपके मन में होगी, संवाद के लिए जरूरी सवाल आपके पास होंगे। टॉपिक को समझाने के लिए कुछ उदाहरण आपके पास पहले से तैयार होंगे और बच्चों के तत्काल आने वाले जवाब और प्रतिक्रियाओं के माध्यम से आप चर्चा को एक सार्थक दिशा में आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे।

इतना ही नहीं कालांश की समाप्ति के बाद आप बच्चों को क्या होमवर्क देंगे और भविष्य में किन-किन प्रोजेक्ट के ऊपर उनको विभिन्न समूहों में बाँटकर काम करने का अवसर दे सकते हैं, आपके तैयारी की यात्रा यहाँ तक भी जायेगी। यह सबकुछ तभी संभव हो पायेगा, जब आप पाठ को पहले से पढ़ लें। उसके उद्देश्य को आत्मसात कर लें और एक योजना के साथ कक्षा-कक्ष में पढ़ाने के लिए जाएं। दो-तरफा संवाद सुनिश्चित करने की कोशिश करें और बच्चों की भागीदारी हासिल करने का सायास प्रयास करें।

2. हर बच्चे के जवाब को दें महत्व

कक्षा-कक्ष में चर्चा के दौरान हर बच्चे को भागीदारी देने का प्रयास करें। यह एक दिन में संभव न हो तो सप्ताह के अलग-अलग दिनों में बच्चों को अपनी बात रखने का अवसर दें। ताकि कोई भी बच्चा यह न महसूस करे कि कक्षा-कक्ष में जो पढ़ाया जा रहा है, वह उसके लिए समझना मुश्किल है। उसको लगे कि कक्षा का संचालन उसके लिए ही किया जा रहा है। इससे बच्चे खुद भी सीखने की जिम्मेदारी लेंगे और तैयारी के साथ कक्षा में आएंगे।

3. अपनी कक्षा में मौजूद बच्चों को समझें

बर्मिंघम के एक स्कूल में प्रिंसिपल डेनी स्टील लिखते हैं, “कल आप भी बच्चों के दिन को यादगार बनाने की वज़ह हो सकते हैं। आप केवल एक पाठ भर नहीं पढ़ा रहे हैं…आपकी उदारता एक बच्चे की ज़िंदगी को थोड़ा और बेहतर बना रही है।” इस बात में बच्चों के जीवन से जुड़ने और उसे सहज बनाने के लिए होने वाले प्रयास को रेखांकित किया गया है। ठीक इसी तरह की बात एक शिक्षिका ने कही कि मैं गणित नहीं पढ़ाती, मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ जो मेरी कक्षा में मौजूद होते हैं। यानि कक्षा में बच्चों की मौजूदगी को सशक्त बनाना और उसके महत्व को रेखांकित करना। बच्चों के लिए वहां होने के अनुभव को यादगार बनाने बेहद जरूरी है। बच्चों के समझने वाले पक्ष में बहुत सारी चीज़ें शामिल हैं जैसे प्राथमिक या उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के शारीरिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए कौन-कौन से खेलों में उनकी अच्छी भागीदारी हो सकती है।

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इस तस्वीर में बच्चे अपने नन्हे दोस्तों को सीखने में मदद कर रहे हैं। ऐसी संस्कृति का विकास सीखने-सिखाने के माहौल को बेहतर बनाने में सक्रिय योगदान देता है। 

बच्चों के संज्ञानात्मक विकास के लिए उनके साथ कौन-कौन सी गतिविधियां की जा सकती हैं ताकि उनको तर्क करने, विश्लेषण करने, तुलना करने, अनुमान लगाने और दुविधा की स्थिति में अपना एक पक्ष चुनने की प्रक्रिया से रूबरू होने का मौका मिले। ऐसा किसी कहानी या नाटक पर रोल प्ले या चर्चा के दौरान हो सकता है। या फिर किसी वास्तविक अनुभव पर चर्चा के दौरान भी ऐसे बिंदुओं को रेखांकित किया जा सकता है। बच्चों के परिवेश व संस्कृति को समझना भी बेहद जरूरी है,  इसके बग़ैर शिक्षण की प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने की कोशिश अधूरी रह जायेगी।

उदाहरण के तौर पर तेलंगाना से सटे हुए कर्नाटक के ज़िले यादगीर में शिक्षकों को तेलगू सीखनी होती है ताकि वे वहाँ के बच्चों के साथ संवाद कर सकें। ऐसा शिक्षकों ने बातचीत के दौरान बताया कि ऐसा करना उनकी और बच्चों दोनों की जरूरत का समाधान देता है। बग़ैर ऐसे संवाद के सीखना संभव नहीं हो सकता है, जिसमें सुनकर समझना और समझकर जवाब देना शामिल न हो।

4. हर बच्चा है ख़ास

मनोविज्ञान का एक सिद्धांत है जो वैयक्तिक विभिन्नता (individual difference) को महत्व देने की बात करता है। जैसे पेड़ का हर पत्ता अपनी बनावट, आकार, अवस्था और परिवेश के कारण अलग है, ठीक वैसे ही बच्चे अपने आनुवांशिक और परिवेशीय कारणों से अलग-अलग होते हैं। उनकी रुचियों में अंतर होता है। उनकी आदतों में अंतर होता है। उनके सीखने के तरीके में अंतर होता है।

बच्चों में किसी चीज़ के बारे में जानने की जिज्ञासाओं में भी अंतर होता है। इस कारण से एक शिक्षक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह अपनी सिखाने के तरीके में ऐसी विविधता रखें जो सभी बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो। अगर हम किसी ख़ास तरीके से पूरे साल पढ़ाते रहें और कुछ ही बच्चों का सीखना हो रहा हो तो हम क्या करेंगे? जाहिर सी बात है कि हम बच्चों की बैठक व्यवस्था समेत उनको पढ़ाने के लिए अपनाये जाने वाले तरीके पर फिर से ग़ौर करेंगे कि कहाँ चूक हो रही है ताकि इस समस्या का समाधान खोजा जा सके।

5. बच्चों के सीखने की स्वायत्तता को महत्व दें

हम बच्चों के साथ उनके सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाने और सार्थक दिशा देने के लिए काम करते हैं। हमारा दीर्घकालीन लक्ष्य होता है कि बच्चा खुद से चीज़ों को करके देखने लगे। वह खुद से सवालों के साथ जूझे और समाधान लेकर आने का प्रयास करे। वह स्वतंत्र रूप से पढ़ने लगे। वह किसी सामग्री को पढ़कर उससे खुद ही सवाल बना ले और सवालों का जवाब भी खोजे। एक बच्चा जो भी कुछ पढ़ रहा है, उसे अपने शब्दों में अभिव्यक्त करने का सफल प्रयास करे। अपनी लिखी हुई सामग्री को रोचक बनाने के लिए चित्रों का इस्तेमाल करे। इसके लिए बच्चों को रचनात्मक स्वतंत्रता देनी होगी ताकि वे ग़लती करें, उससे सीख लें और अगले काम में इस सीख को इस्तेमाल करें ताकि सीखने की प्रत्रिया की निरंतरता बनी रहे।

बातें और भी हैं। मगर उनकी चर्चा अगली पोस्ट में। इस पोस्ट के बारे में अगर आपके कोई अनुभव या विचार हैं तो कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर साझा करें ताकि संवाद हो सके। विमर्श के इस सिलसिले को भी दो-तरफा बनाने की जरूरत है ताकि लेखों का ज़मीनी अनुभवों और सवालों के साथ संवाद हो सके।

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