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चर्चाः क्लासरूम में बदलाव के लिए अपनाएं 40/20 का फॉर्मूला

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शिक्षण की निरंतरता से कक्षा-कक्ष में सकारात्मक बदलाव होते हैं। 

गर्मी की छुट्टियों का समय पुराने अनुभवों के बारे में विचार करने और नये सत्र को यादगार बनाने का अवसर भी है। समर कैंप अगर बच्चों के लिए आयोजित होते हैं तो शिक्षक साथियों के लिए भी विभिन्न तरह के प्रशिक्षणों में भाग लेने के अवसर गरमी की छुट्टियों में सुलभ होते हैं। इस दौरान हम क्लासरूम से जुड़े ज़मीनी अनुभवों पर संवाद का सिलसिला जारी रखेंगे। उसी कड़ी में पेश है यह पहली पोस्ट।

भाषा की कक्षा में होने वाले प्रयासों का लाभ विभिन्न विषयों के शिक्षण में होता है। इससे एक बच्चा ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करना सीखता है। अपने अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करने का आत्मविश्वास हासिल करता है। लिखे हुए और छपे हुए शब्दों के साथ एक दोस्ती का रिश्ता बनाता है और अर्थ निर्माण की प्रक्रिया से रूबरू होता है। इसी के संदर्भ में 40/20 का फॉर्मूला व्यावहारिक प्रयासों से चीज़ों को बेहतर बनाने का रास्ता देता है। इसका अर्थ है कि भाषा के कालांश में एक शिक्षक साथी द्वारा नियमित रूप से 40 मिनट तक शिक्षण कार्य किया जाए। महीने में 20 दिन तक का समय बच्चों को मिले। इसके अतिरिक्त शेष समय पाठ की पुनरावृत्ति और रचनात्मक गतिविधियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

बच्चों की रुचि व भागीदारी को मिले प्राथमिकता

40 मिनट का समय 20 दिनों तक देने के दौरान यह सुनिश्चित करना कि बच्चे शिक्षण की प्रक्रिया में रुचि लें और सीखने की खुशी और आनंद से रूबरू होते रहें। भाषा और आनंद के रिश्ते का अहसास कविताओं, कहानियों, नाटक व अन्य रोचक गतिविधियों व चर्चाओं के माध्यम से बच्चों को कराया जा सकता है। किताबों से बच्चों के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के लिए लायब्रेरी के कालांश का आवंटन हर सप्ताह के टाइम टेबल में किया जा सकता है।

इसके साथ ही बच्चों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने का समय (रीडिंग टाइम) भी दिया जा सकता है, जो उनको अपने भाषायी कौशल को मजबूत बनाने और पढ़ने की निरंतरता को जारी रखने की संभावनाओं को विस्तार देगा। पढ़ने की संस्कृति का विकास करने में शिक्षकों को भी बच्चों के साथ-साथ खुद भी किताबें पढ़ने का प्रयास करना जरूरी है, तभी वे बच्चों को किताबों के बारे में सहजता के साथ बता सकेंगे कि किस किताब में कौन सी कहानी है।

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