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‘आठवीं तक फेल न करने’ वाली नीति में बदलाव को मिली कैबिनेट की मंजूरी

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया। इसे पाँच साल पूरे हो गए हैं। इसके तहत 6-14 साल तक की उम्र के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के सात साल बाद केंद्रीय कैबिनेट ने ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ को समाप्त करने का फ़ैसला किया है। ताकि राज्य सरकारें 6ठीं, 7वीं व 8वीं कक्षा में बच्चों को क्रमोन्नत होने से रोक सकें। इसकी माँग विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा लंबे समय से की जा रही थी, जिसे सरकार की तरफ से मंजूरी मिल गयी है।

शिक्षा का अधिकार क़ानून में संशोधन

शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 के अनुच्छेद-16 का एक खण्ड के रूप में नो डिटेंशन पॉलिसी को शामिल किया गया था। यह कहता है, “स्कूल में प्रवेश लेने वाले किसी भी बच्चे को किसी क्लास में फिर से नहीं रोका जाएगा या प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”

ग़लती बच्चों की नहीं है

हर बच्चा सीखता है। वे सीखना चाहते हैं। बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं। मगर शिक्षक समुदाय में से कुछ लोगों ने शोर मचा दिया कि बच्चे सीखना ही नहीं चाहते। वे तो परीक्षाओं का डर न होने से पढ़ना ही नहीं चाहते। ऐसे में जरूरी है कि शिक्षकों की तरफ से भी शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश हो। इसके साथ ही छात्र-शिक्षक अनुपात का भी मुद्दा काफी अहम है।

सरकार के इस फ़ैसले पर युवा साहित्यकार और शिक्षक प्रशिक्षक नवनीत नीरव लिखते हैं, “जिंदगी पास-फेल से कहीं आगे है बाबू मोशाय। कर दी ना सरकारों जैसी बात। #पांचवीं-आठवींफेल”

एक और अहम बदलाव

शिक्षा का अधिकार क़ानून में संशोधन विधेयक, 2017 को लोकसभा के बाद राज्य सभा ने भी पारित कर दिया। इसके बाद प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले 11 लाख शिक्षकों को न्यून्त अहर्ता हासिल करने के लिए 31 मार्च, 2019 तक का समय मिल गया है।

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि दो साल के भीतर ऑनलाइन और ऑफलाइन कोर्स के माध्यम से शिक्षकों को न्यूनतम अहर्ता हासिल करने में सहयोग किया जाएगा।

साल 2010, 1 अप्रैल से शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के बाद पाँच साल तक का समय दिया गया था, यह समय साल साल 2015 में ही पूरा हो गया था, सरकार ने इसमें चार साल की बढ़ोत्तरी करने का फ़ैसला किया है।

 

 

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