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प्रोफेसर एच.सी. वर्मा: ‘बच्चों के सीखने की नैसर्गिक क्षमता पर भरोसा करें शिक्षक’

tcm-kanpur-3आईआईटी कानपुर के मशहूर प्रोफ़ेसर एच. सी. वर्मा  ने 30 जून-2017 को जब सेवानिवृत्ति की घोषणा की थी, तो इसकी चर्चा पूरे देश में हुई थी। आपकी सबसे चर्चित किताब का नाम है ‘कॉन्सेप्ट्स ऑफ़ फिजिक्स’। विद्यार्थियों से आपका गहरा जुड़ाव रहा है और शिक्षक समुदाय के साथ भी उनका संवाद निरंतर बना रहा है। 

हाल ही में एच. सी. वर्मा सर ने कानपुर में शिक्षकों के एक सम्मेलन के दौरान वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी विसंगतियों की तरफ इशारा किया और समाधान का रास्ता भी दिया। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में उस विभाजन की लकीर पर भी सवाल खड़ा किया जो विद्यार्थियों को सीखने वाले और शिक्षक को सिखाने वाले के रूप में रेखांकित करती है। उन्होंने कहा कि छोटे बच्चे में सीखने की अपार क्षमता होती है।

हम स्कूल या कॉलेज में विद्यार्थियों को सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया से काट देते हैं, इस पर फिर से विचार करने की जरूरत है ताकि हम ऐसे माहौल का निर्माण कर सकें, जिसमें बच्चों के सवालों के लिए जगह हो और उसकी जिज्ञासा को शांत करने की सीधी-सीधी कोशिश न करने की बजाय, उसे खुद सवालों से जूझने और समाधान का रास्ता खोजने का अवसर मिले ताकि उसका खुद से सीखने का आत्म-विश्वास बना रहे। अब विस्तार से पढ़िए उन्होंने शिक्षकों को संबोधित करते हुए क्या कहा?

क्या सच में बच्चे ‘अबोध’ हैं?

children-of-village-playing-in-communityहमारी शिक्षा व्यवस्था के भीतर कक्षा एक से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक मानकर चला जाता है कि हमारा बच्चा बहुत अबोध है। जैसे कहते हैं कि कुम्हार गीली मिट्टी को आकार देता है। फिर उससे अच्छी-अच्छी चीज़ें निकलती हैंस बढ़िया-बढ़िया कलश बनते हैं, बढ़िया-बढ़िया मूर्तियां बनती हैं। तो हमारा जो बच्चा होता है उसी तरीके से मिट्टी का लोंदा है, उसको जब तक आकार नहीं देंगे तबतक उसकी कोई वैल्यू नहीं होगी। शिक्षक का काम है शिक्षा देना, सिखाना। जबकि बच्चे का काम है जो शिक्षक सिखाए, उसको सीख लेना। मैं इस अवधारणा के ऊपर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाना चाहता हूँ।

आपके पास जब बच्चे पहली बार स्कूल आते हैं, उस समय उनकी उम्र कम से कम तीन साल की होती है अगर प्ले स्कूल, नर्सरी, केजी वगैरह को जोड़ लें। उनकी उम्र पाँच साल की होती है, जब आप कक्षा एक से पढ़ाना शुरू करते हैं। आपके घर में दो साल का बच्चा, ढाई साल का बच्चा, तीन साल का बच्चा क्या एक पूरी भाषा नहीं जानता है, जो आप घर पर बोलते हैं। स्कूल में आने के पहले क्या उसने एक पूरी लैंग्वेज नहीं सीख रखी है? किसने सिखाया उसको ये सब। उसको सिखाने वाला शिक्षक कहां था? कहाँ नवाचार था। शब्द सिखाना। बोलना सिखाना। उच्चारण सिखाना।

‘बच्चे बहुत कुछ सीखकर स्कूल आते हैं’

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इस उम्र के बच्चे शब्दों से वाक्य की रचना करना, इस बात का ध्यान रखते हुए कि कौन सा शब्द पहले आता है, कौन सा शब्द बाद में आता है। उनको अगर कहना है कि गुब्बारे वाला आ रहा है, तो बच्चा बोलता है कि गुब्बारे वाला आ रहा है। ‘गुब्बारा’ पहले बोलना है, ‘वाला’ उसके बाद बोलना है, ‘आ’ उसके बाद बोलना है, ‘रहा’ उसके बाद बोलना है और ‘है’ उसके बाद बोलना है। इतना सारा ज्ञान कौन से शिक्षक ने बच्चे को दिया था, वो केवल एक भाषा ही नहीं सीखता है। बल्कि बहुत सी चीज़ें सीखता है। बहुत सारा साइंस सीखता है। वो बहुत सारा सोशल साइंस और इन्वायरमेंटल साइंस सीखता है। उसको सारे रंगों की पहचान होती है।

दो ढाई साल के बच्चे को पता होता है कि लाल रंग कौन सा है, और नीला रंग कौन सा है? वह केवल शब्द ही नहीं सीखता है, बल्कि व्यावहारिक रूप से वह इन रंगों को पहचान सकता है। अगर आप उससे कहें कि लाल वाली फ्रॉक पहन लो, तो बच्चा लाल वाली फ्रॉक ही लायेगा या लायेगी।  वह नीला वाला उठाकर नहीं लायेगी। ये रंगों की पहचान किसने सिखाई है, उसको। चेहरा पहचानना कि ये मेरी माँ हैं, ये मेरी चाची हैं, ये मेरी नानी हैं, ये मेरी दादी है, ये मेरे पिता जी हैं, ये मेरे चाचा जी हैं, ये मेरे भाई हैं। यह पहचानने में बच्चा कभी गलती नहीं करता है। किसी चेहरे को देखकर उसे याद रखना और ठीक-ठीक नाम से उसे पुकारना, किसने सिखा दिया होगा उसको।

‘बच्चा भी जानता है न्युटन के नियम’

Thane-Municipal-Corporation-schoolउदाहरण के तौर पर अनुमान लगाना। अगर घर में कोई अतिथि आया है तो उस अतिथि को अंकल बोलना है, या उस अतिथि को अगर वो छोटा है तो भाई बोलना है, वो चेहरा देखकर कि अगर कोई बुजुर्ग व्यक्ति आए हैं तो उनके साथ अलग व्यवहार करना है। सम-वयस्क है तो उसके साथ अलग व्यवहार करना है। महिला है तो उसके साथ अलग व्यवहार करना है। बच्चे चेहरा पढ़कर जान जाते हैं कि ये लोग अंकल वाली कैटेगरी के लोग हैं। या ये दादा जी वाली कैटेगरी के लोग हैं। या ये मेरे जैसे बच्चों वाली कैटेगरी के लोग हैं।

बच्चे गणित बहुत सारा सीख जाते हैं, आप उसको एक चॉकलेट दीजिए, उसके छोटे भाई को दो चॉकलेट दीजिए, फिर वो झगड़ा करता है कि मेरे को दो चॉकलेट नहीं मिली तो बच्चे को पता होता है कि किसके पास ज्यादा है। किसके पास कम है। किधर वाली चॉकलेट ज्यादा है, यह बात बच्चे अच्छे से जानते हैं। लगभग 20 तक की संख्या का उनको अंदाजा होता है। 10, 8, 6, 5 वे पहचानते हैं। कौन बड़ा है, कौन छोटा है, बच्चे इस क्रम से भी अवगत हो जाते हैं। आपके डेढ़-दो साल के बच्चे को बहुत सारा फिजिक्स भी पता होता है, अगर आपके बच्चे ने अपना खिलौना चटाई पर रख दिया है और उसको थोड़ी देर बाद इच्छा होती है उस खिलौने से खेलने की। तो वह अपना खिलौना ढूंढने के लिए उसी चटाई पर जाता है। क्योंकि उसको न्युटन का पहला नियम पता है कि अगर कोई वस्तु विराम वाली अवस्था में पड़ी है तो वह वहीं पड़ी रहेगी, कहीं नहीं हिलेगी।

‘बच्चे में सीखने की जबर्दस्त क्षमता होती है’

a-student-making-picture-in-government-school-of-indiaन्यूटन का नियम पता है उसको। अगर उसको चटाई पर उसका खिलौना नहीं मिलता है तो सबसे पूछता फिरता है कि किसने उठाया? न्यूटन के गति नियम का दूसरा भाग है कि जबतक उस वस्तु पर कोई बाहरी बल नहीं लगेगा, वह विराम वाली अवस्था में पड़ी रहेगी। वो भी उसको पता है।

इस तरह से बहुत सारी फिजिक्स सीखी उसने। बहुत सारा गणित सीखा उसने। बहुत सारा सामाजिक व्यवहार सीखा उसने। बहुत सारा पर्यावरण विज्ञान सीखा उसने। एक बच्चे को नन्ही सी उम्र के अंदर में किसने इतना कुछ सिखा दिया। दो-ढाई या तीन साल की उम्र के भीतर में। ये उस बच्चे में सीखने की बहुत जबर्दस्त ताक़त है। वो बिना किसी पाठ्यक्रम के. बिना किसी प्रयास के, बिना किसी नवाचार के वो खुद से सीख जाता है।

उसके चारो तरफ जो घटनाएं हो रही हैं उसको देख-देखकर सीख जाता है। उसके आसपास जो भी घटित हो रहा है, उसको देखकर वह पूरी तरह से सीख लेता है। सीखने की यह प्रक्रिया बग़ैर किसी अतिरिक्त प्रयास के हो रही होती है। लेकिन हम उसके सीखने की क्षमता और बच्चे को कम करके आँकते हैं। हमारे स्कूल सिस्टम के अंदर में जब वो आये, चाहें वह पहली क्लास हो, चाहें 12वीं हो या बीएससी हो या एमएससी हो हम उसकी क्षमता को बहुत कम करके देखते हैं। हम सिखाएंगे, तब वो सीखेगा। हम नहीं सिखाएंगे, तो वह नहीं सीखेगा।

‘जब परीक्षा नहीं होती, तब भी बच्चे तेज़ी से सीखते हैं’

DSCN0062अगर वो अपने से सीखने की कोशिश करता भी है, तो हम उसको कहते हैं कि बच्चे ये आउट ऑफ सिलेबस बातें मत करो। ये तुम्हारी पाठ्य-पुस्तक में नहीं है। जब तुम चौथी क्लास में पहुंचोगे तब यह तुम्हारी किताब में आयेगा, तब बताएंगे। अभी आप तीसरी कक्षा में हो या आपके पाठ्यक्रम में नहीं है। हम परीक्षाएं लेते हैं, उसने क्या सीखा उसकी जाँच करते हैं हम। ये परीक्षाएं बड़ी घातक होती हैं। हमने पहले दो साल में तो कोई परीक्षा नहीं ली थी, जन्म के पहले पाँच-दो साल में तो हमने कोई परीक्षा नहीं ली थी उसने कितनी तेज़ी से सीख था।

आप बच्चे की परीक्षा लेते हो। उसको याद कराते हो। उसको शिद्दत के साथ मेहनत करते हो। पहले शिक्षक मेहनत करते हैं। फिर बच्चे जब घर जाते हैं तो माता-पिता मेहनत करते हैं। माता-पिता से काम नहीं चलता है तो एक ट्युटर भी रख देते हैं, वो मेहनत करता है। हम इतनी सारी मेहनत करते हैं उसको सिखाने के लिए और तब भी परीक्षा के बाद बहुत सारे बच्चों को कहना पड़ता है भैया तुमने कुछ नहीं सीखा,   भैया तुमने बहुत कम सीखा, तुम्हें तो इतने ही नंबर आये। तुम्हें तो इतने ही नंबर आये।

सीखने की ‘स्वाभाविक प्रक्रिया’ को महत्व दें

education mirror, primary education in indiaऐसा करते हुए हम किसी बच्चे के सीखने की जो प्रक्रिया है, वो हम बाधित करते हैं। उसके सीखने की जो स्वाभाविक प्रक्रिया, उसके अंदर की जो प्रक्रिया है, उसके सीखने की जो शक्ति है, उसको हम बाधित करते हैं।

भांति-भांति के तरीकों से हम अपनी बातें उस पर थोपते हैं। हम अपनी बातें इतनी थोपते हैं कि धीरे-धीरे कालान्तर वो उसकी नैसर्गिक शक्ति थी वो कम होती जाती है, घटती जाती है, वो और घटती जाती है। एक समय के बाद उसके स्वयं के सीखने की क्षमताएं बिल्कुल समाप्त हो जाती हैं।

उसका अपना विश्वास बिल्कुल समाप्त हो जाता है। उसके बाद बाढ़ आती है, हमारे जो कोचिंग इंस्टीट्यूट्स होते हैं। हमारे देश में कोटा और बहुत सारी जगहों पर ऐसे इंस्टीट्यूट होते हैं, उनकी बाढ़ आ जाती है क्योंकि बच्चे के पास अब आत्म-विश्वास नहीं है। वह सोचता है कि जबतक हमें कोई पढ़ाएगा नहीं, हम नहीं पढ़ सकते। जबतक हमें कोई सिखाएगा नहीं, हम नहीं सीख सकते। ऐसा हमने बच्चों के मन के अंदर एजुकेशन सिस्टम के द्वारा कूट-कूटकर भरा है। उसके तमाम दुष्परिणाम होते हैं।

बच्चों के सोचने और सीखने की क्षमता को प्रोत्साहित करें

education_mirror-imageमैं आपको आईआईटी कानपुर की कहानियां सुनाता हूँ। मैं वहां से हूँ तो शायद आपको वहां की कहानियां सुनकर अच्छा लगे। हमारे आईआईटी कानपुर में वो जो बच्चे आते हैं जेईई, कोटा-वोटा करके आते हैं। मैं अभी अपनी सेवानिवृत्ति से पहले का एक आँकड़ा साझा करता हूँ। आईआईटी के प्रथम वर्ष में प्रवेश लेने वाले 436 विद्यार्थी थे। पहले सेमेस्टर के अंत में जो परीक्षा हुई, उसमें 180 नंबर की परीक्षा हुई। कुछ लोग फेल कर गये, कुछ लोग पास कर गये। इसमें से 97 लोग फेल कर गये। 180 नंबर की परीक्षा में 23 का पास मार्क था, उसके बाद भी 97 बच्चे फेल हो गये। कोटा और अन्य इंस्टीट्यूट के अथक प्रयासों के बावजूद आईआईटी कानपुर में आने वाले बच्चे कुछ सोच नहीं पाते हैं, कुछ सीख नहीं पाते हैं, अपने से कुछ गढ़ नहीं पाते हैं।

ये एक बहुत बड़ी समस्या है। आप सभी शिक्षक जो सही दिशा में बदलाव देखना चाहते हैं, आप सभी से ये प्रश्न है कि हम अपनी व्यवस्था में बहुत अच्छी तरह से सिखाते हैं। बहुत अच्छी तरह से पढ़ाते हैं। सरकार तमाम योजनाएं बनाती हैं, शिक्षक बड़े मन से उसको क्रियान्वित करते हैं। लेकिन उसके बाद वो विद्यार्थी जब जेईई में सेलेक्ट होते हैं। माला-वाला पहनाई जाती है। शहर में होर्डिंग-वोर्डिंग लगती है। मगर परिणाम क्या निकलता है, एक उदाहरण मैंने आपके समाने रखा है।

‘बच्चों को सीखने का अच्छा माहौल दे शिक्षक’

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एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

हम शिक्षकों को सिर्फ इतना करना है कि बच्चों को ऐसा माहौल दें  जिसमें  वो अपने दिमाग का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें ,ज्यादा से ज्यादा प्रश्न करें आपसे, और आप उनकी मदद करें उन सवालों का जवाब ढूंढने में और यकीन मानें  ये उत्तर ढूंढने की प्रक्रिया हम शिक्षकों को भी बहुत कुछ नया सीखने में मददगार होती है। यहाँ बैठे हुए शिक्षकों को जब कोई नया प्रश्न मिले बच्चों द्वारा जिसका उत्तर वो नहीं जानते तो आप अवश्य ही जश्न मनाएं, कि आज मैं ऐसे प्रश्न से रूबरू हुआ जिसका उत्तर मुझे मालूम न था क्योंकि ये प्रश्न आपको कुछ नया सिखाकर ही दम लेगा।

शुरू से अंत तक शिक्षकों को ये प्रयास करने की आवश्यकता है कि वे बच्चों के अपने अनुभवों का प्रयोग करते हुए बच्चों के ज्ञान का सृजन करवायें ,क्योंकि यही चीज़ लंबे समय तक उनके साथ रहती है। लंबे समय तक वही चीजें महफूज़ रहती हैं जिसका आप अनुभव करते हैं। इसके साथ ही साथ उन्होंने ये भी कहा कि मुझे उन शिक्षकों से थोड़ी सी चिढ़ होती है जो बच्चों को फटा-फट सब सिखा देते हैं, और इस बात में यकीन रखते हैं। क्योंकि आपने बच्चे की क्षमता का तो प्रयोग ही नहीं किया। आपने, अपनी क्षमता का प्रयोग किया और सिखा दिया सब कुछ जो और जैसा आप चाहते थे। यहाँ गौर करने वाली बात ये थी कि इस सीखने की प्रक्रिया में बच्चे के दिमाग का कितना प्रयोग हुआ क्या उसने भी कुछ दिमागी कसरत की,अगर नहीं, तो क्या उसका दिमाग मजबूत हुआ या होगा ? इस पर भी सोचने की आवश्यकता है।

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3 Comments on प्रोफेसर एच.सी. वर्मा: ‘बच्चों के सीखने की नैसर्गिक क्षमता पर भरोसा करें शिक्षक’

  1. Anand Tiwari // October 20, 2017 at 12:36 am //

    Very nice …but say something about techniques of teaching …

    Liked by 1 person

  2. बहुत-बहुत शुक्रिया विजय जी, यह पोस्ट पढ़ने और टिप्पणी करने के लिए।

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