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उत्तराखंड में NCERT की किताबों को लागू करने का विरोध क्यों हो रहा है?

इस पोस्ट के लेखक महेश चंद्र पुनेठा उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। कविताओं के साथ-साथ, शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर वे सक्रियता से लिख रहे हैं। शिक्षा से जुड़े सरोकारों पर विमर्श के सिलसिले को आगे बढ़ाने में ‘शैक्षिक दखल’ के माध्यम से योगदान से दे रहे हैं। वे उत्तराखंड में एनसीईआरटी की किताबों को लागू करने की पहल को सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं और इसके विरोध पर सवाल खड़ा करते हैं। वे कहते हैं, “एन सी ई आर टी की किताबों में सीमित पाठ्यक्रम और सीमित अभ्यास होने का आरोप लगाने का मतलब है ज्ञान और जानकारी के बीच अंतर की समझ न होना।”

वे कहते हैं कि उत्तराखंड में NCERT की किताबों को लागू करने को लेकर बहस काफी तेज हो गई है। निजी विद्यालय के प्रबंधकों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है ।उनका तर्क है कि एनसीईआरटी की किताबों को लागू करने से स्कूलों का शैक्षिक स्तर गिरेगा, लेकिन यह तर्क गले उतरने वाला नहीं है।

मेरा मानना है कि इतनी सुचिंतित बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ से लैस रोचक और बहुआयामी किताबें दूसरी नहीं है। इन पुस्तकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सूचनाओं, तथ्यों,आंकड़ों आदि पर जोर न देकर बच्चे की अवधारणा और समझ को विकसित करने पर बल देती हैं। रटने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करती हैं । बच्चे को सोचने -समझने -करने का अधिक अवसर प्रदान करती हैं।

क्यों लागू होनी चाहिए एनसीईआरटी की किताबें

एनसीईआरटी की किताबें पहले से तैयार ज्ञान का कोई पैकेज नहीं थोपती हैं, बल्कि संग्रहण- वर्गीकरण- अन्वेषण और विश्लेषण करते हुए ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं।सबसे अच्छी बात यह है कि ये किताबें इस बात को स्थापित करने में सफल रही हैं कि अंतिम सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है ,इसलिए हमेशा नई खोज जारी रहनी चाहिए । इस तरह कल्पनाशील, गतिविधियों और सवालों के माध्यम से बच्चों को अपने अनुभव के इस्तेमाल का मौका देती हैं । यह किताबें सधे-सधाए और तयशुदा उत्तर नहीं देती हैं बल्कि बच्चों को सोच समझकर अपना मत खुद बनाने के लिए प्रेरित करती हैं।

पढ़ने के सच्चे आनंद से रूबरू कराती हैं एनसीईआरटी की किताबें

इन पुस्तकों के माध्यम से यह कोशिश की गई है कि बच्चों को मानसिक दबाव और बोरियत से बाहर निकालकर पढ़ने का सच्चा आनंद लेने दिया जाए । बच्चों की समूह में अपने हाथों कार्य करने की इच्छा का सम्मान किया जाए। बहस और प्रश्न करने के अवसर प्रदान किए जाएं, ताकि विश्लेषण क्षमता का विकास करते हुए भविष्य के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण विकसित किया जा सके।

यह पहली बार हुआ है कि किताबों में छोटी-छोटी कहानियां अनुभव अखबारी कतरनों और कार्टूनों को शामिल कर विषय वस्तु को रोचक आनंददायक, जीवंत ,संप्रेषणीय और प्रभावशाली बनाया गया है।

ncert-booksइन पुस्तकों में ऐसे अनेक झरोखे हैं ,जो बच्चों को ज्ञान के विस्तृत आकाश में उड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चों को पुस्तकालय का इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित करती हैं। इस तरह उनके भीतर स्वाध्याय की प्रवृत्ति विकसित करती हैं।

अखबार, दूरदर्शन ,रेडियो, इंटरनेट जैसे संचार साधनों को भी पाठ्यपुस्तक के साथ जोड़ देती हैं, जिससे बच्चे सूचना की एक बड़ी दुनिया से जुड़ते हैं और इन्हें स्कूली शिक्षा के हिस्से के रूप में देखने लगते हैं।

इससे बच्चों का विजन व्यापक होता जाता है उनको समझ में आता है कि सीखना स्कूल की बंद दीवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया अपने आप में एक बड़ा स्कूल है।

एनसीईआरटी की किताबों के विरोध का ‘कुतर्क’

इन किताबों को तैयार करते हुए एक और बात का ध्यान रखा गया है कि ज्ञान को विभिन्न विषयों की सीमा में न बांधकर समग्रता में दिखाया जाए विभिन्न विषयों के अंतर्संबंध को इस तरह विकसित किया गया है कि ज्ञान का पारस्परिक संबंध सामने आ सके इस तरह विषयों की दीवार को गिराया गया है। इन किताबों पर एक आरोप यह लगाया जा रहा है कि इन में बहुत कम जानकारियां हैं।

पठन कौशल, पढ़ने की आदत, रीडिंग स्किल, रीडिंग हैबिट, रीडिंग रिसर्च,

एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

इसके पीछे कारण यह है कि यह किताबें ज्ञान प्रदान करने के लिए नहीं बल्कि ज्ञान निर्माण करने के लिए तैयार की गई है , ताकि बच्चे ज्ञान के ग्राहक मात्र न रहकर ज्ञान के निर्माता बन सके यह तभी संभव है जब स्कूल की दैनिक जिंदगी और कार्यशैली में फेरबदल हो शिक्षण और मूल्यांकन के तरीके बदलें यह पुस्तकें इस सब के लिए आधार तैयार करती हैं।

इन किताबों को कमतर वही कह सकता है जिसको शिक्षा और बाल मन की अधकचरी समझ हो। जो इन किताबों में आए बदलाव के कारणों को अच्छी तरह से नहीं समझते हों। हां ,यह जरूर है कि इन किताबों को लागू करने के साथ-साथ इनके इस्तेमाल के बारे में भी शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पड़ेगी ,अन्यथा जो बात आज प्रबंधकों के द्वारा कही जा रही हैं वहीं बा बातें आने वाले समय में शिक्षकों द्वारा कहीं जाएंगी।

उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री कह रहे हैं एन सी ई आर टी की किताबें लागू होंगी लेकिन निजी विद्यालय इस आदेश की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। उत्तराखंड के विभिंन हिस्सों से खबर आ रही है कि निजी विद्यालय अभिभावकों को निजी प्रकाशकों की महँगी किताबें लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अभिभावकों को भी सामने आना होगा। इस बात का विरोध करना पड़ेगा। सवाल सिर्फ किताबों का नहीं बल्कि निजी विद्यालयों की मनमानी का है।

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