Trending

‘साक्षरता और कौशल विकास’ की थीम पर केंद्रित है 52वां अन्तरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस

दुनिया भर के विभिन्न देशों में 8 सितंबर को ‘अन्तरराष्टीय साक्षरता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य है कि पूरी दुनिया में साक्षरता के प्रति जागरूकता का प्रसार हो और ज्यादा से ज्यादा आबादी को साक्षर बनाने (पढ़ना-लिखना सिखाने) के अभियान में सफलता हासिल करने के प्रयासों को गति मिले। इस साल 2018 में 52वें अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की थीम ‘साक्षरता और कौशल विकास’ है।

ध्यान देने वाली बात है कि साक्षरता दिवस, वैश्विक स्तर पर व्यक्तियों, समुदायों और विभिन्न समाजों के लिए साक्षरता के महत्व को रेखांकित करता है। यूनेस्को की तरफ से इसकी शुरुआत 8 के लिए सितंबर का दिन चुना गया। यह निर्णय 17 नवंबर 1965 को तेहरान में शिक्षा मंत्रियों की बैठक में किया गया था, इसलिए भी यह दिन ऐतिहासिक महत्व का है। हर साल यूनेस्को की तरफ से 8 सितंबर को वैश्विक साक्षरता की स्थिति को लेकर रिपोर्ट जारी की जाती है।

72 प्रतिशत है भारत की साक्षरता दर

यूनेस्को की तरफ से जारी आँकड़ों के अनुसार भारत की साक्षारता दर 72.1 प्रतिशत है। इसमें से पुरुषों की साक्षरता दर 80 प्रतिशत है। वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 62.8 प्रतिशत है। भारत में 28 करोड़ वयस्क पढ़ने-लिखने के बुनियादी कौशल से वंचित हैं, ऐसे में प्रौढ़ साक्षरता के लिए होने वाले प्रयास बेहद अहम हो जाते हैं। महिला साक्षरता को लेकर विशेष प्रयास करने की जरूरत भारत में है।

cropped-how-children-learn

आज़ादी के 71 साल बाद भी भारत के बहुत से ज़िले ऐसे हैं जहाँ महिलाओं की साक्षरता का प्रतिशत 40 फीसदी से कम है। राष्ट्रीय स्तर के औसत का यह अर्थ कतई नहीं है कि पूरे भारत में महिलाओं व पुरुषों के साक्षरता की स्थिति एक जैसी है। सरकार और ग़ैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा संयुक्त रूप से प्रयास हो रहा है कि साल 2022 तक इस खाई को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाये। देखना होगा कि इस लक्ष्य में उम्मीद के अनुसार कितनी सफलता हासिल होती है।

साक्षरता का क्या महत्व है?

किसी भाषा में लिखी सामग्री को समझकर पढ़ने का कौशल जीवन के हर क्षेत्र में काम आता है। अगर किसी इंसान को पढ़ना नहीं आता है तो उसे किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसे हर पढ़ा-लिखा आदमी आम शब्दावली में साहब नज़र आता है। साक्षरता या पढ़ने का कौशल एक आत्मविश्वास देता है, चीज़ों को समझने का एक जरिया।

किसी लिखी हुई सामग्री के बारे में सोचने और उसका विश्लेषण करने का। इसलिए साक्षरता को केवल अक्षरों तक सीमित नहीं करना चाहिए। केवल नाम लिख लेना भर पर्याप्त नहीं है। नाम लिखना-पढ़ना तो बच्चों को दो-तीन महीने में सिखाया जा सकता है, इससे वे अपना और दूसरे का नाम लिख-पढ़ लेंगे। मगर सिर्फ नाम में क्या रखा है, वाली बात सामने होगी। असली मुद्दा तो नाम से आगे जाने का है ताकि इंसान दुनिया में अपने अस्तित्व को सम्मान के साथ जी पाए।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x