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मुझे भी ऐसा बनना है ताकि लोग कहें, “क्या लड़की है!”

What_a_girl..jpgक्या लड़की है!, यह एक किताब का नाम है। इसके लेखक ग्रू दाहले हैं और इस किताब के चित्र बनाएं हैं स्वेन नीहूस ने। हिंदी भाषा में इसका अनुवाद अरुंधती देवस्थले ने किया है। यह किताब ‘ए एण्ड ए बुक्स’ द्वारा प्रकाशित की गई है। इस कहानी की मुख्य पात्र का नाम है शीलू, जो एक आदर्श लड़की है। सालों से वह वही करती आई है जो एक अच्छी लड़की को करना चाहिए।

लेकिन उसकी ज़िंदगी में एक दिन ऐसा भी आता है जब वह अपनी मर्जी से जीने लगती है, अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले खुद लेने लगती है। सही-ग़लत का फ़ैसला खुद करने लगती है। इस कोशिश में वह परिवार की सभी नानियों, दादियों को भी आज़ाद करा देती है। नार्वे की शीलू जब भारत की लड़कियों से मिलती है तो क्या कहानी बनती है? पढ़िए इस पोस्ट में लक्ष्मी की कलम से

अच्छी लड़कियों की ‘उपाधि’

अक्सर लोग कहते हैं कि क्या लड़की है? कितनी अच्छी है। ये उपाधि प्रायः उन्हीं लड़कियों को दी जाती है जो सबकी बातें सुनती हैं, चाहे उनके मन में कोई जिज्ञासा पैदा हो रही है, या फिर वे अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को दबाकर सुनती हैं। इसलिए वे एक अच्छी लड़की कहलाती हैं। पर क्या लड़की है, इस वाक्यांश के कई अर्थ निकलते हैं, एक तो सीधी-साधी चुप चाप सी रहने वाली, क्या लड़की है। पर सही मायने में यह कहा गया है कि एक अच्छी लड़की होना सही है, लेकिन चुपचाप बैठकर वह अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छाओं को मार देती है वो तो समाज की नज़रों में अच्छी लड़की है ही।

मैं भी बनूं ‘क्या लड़की है!’

लेकिन दुनिया को हिला देने वाली लड़कियों से तात्पर्य ऐसी लड़कियों से है जो विषम परिस्थितियों से भी लड़कर सही चीज़ों को चुनकर आगे बढ़ती हैं। अपना रास्ता खुद बनाती हैं और दूसरों को भी अपना रास्ता बनाने के लिए प्रेरित कर पाती हैं, ऐसी लड़कियां वास्तव में मिसाल हैं

हमारे आज के समाज में इतना भेदभाव, भ्रष्टाचार बढ़ रही है कि उसके वजह से लड़की अपने घर से बाहर नहीं निकल पाती है और वह चारदीवारी के अंदर रहकर ही अपना गुजारा करती है। उसी चार दीवारी के अन्दर उसकी काबिलियत, इच्छाएं, पहचान, सबकुछ चार दीवारी के अंदर ही खत्म हो जाती है। इसलिए मैं क्या लड़की हूँ? मुझे ये बनना है।

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