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भाषा शिक्षणः हिन्दी शब्द का अर्थ क्या है?

हिन्दी के लिए खड़ी बोली शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ है अच्छी भाषा। यह शब्द समकालीन हिन्दी का सूचक है। हिन्दी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में रोज़मर्रा के संवाद की भाषा है। इसके साथ ही स्थानीय भाषाओं का लोक साहित्य भी उपलब्ध है, जो हिन्दी को समृद्ध करने में अपनी भूमिका निभाता है। जैसे उत्तर प्रदेश की अवधी व ब्रज भाषा काफी समृद्ध साहित्यिक परंपरा वाली भाषाएं हैं।

सरकारी स्कूलों में शिक्षण का माध्यम

उत्तर भारत के सरकारी विद्यालयों में यह शिक्षा का माध्यम भी है, लेकिन अब उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी सरकारें हिन्दी के अलावा इंग्लिश मीडियम स्कूलों के जरिये विद्यार्थियों व अभिभावकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास कर रही हैं, यह परिवर्तन समसामयिक बदलाव को रेखांकित करता है।

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उत्तर भारत के बहुत से स्कूलों में शिक्षण का माध्यम है हिन्दी भाषा।

आमतौर पर माना जाता है कि हिन्दुस्तानी (आम बोलचाल की हिन्दी, रेखता, हिन्दवी आदि) संस्कृत और अन्य इण्डो आर्यन भाषाओं गुजराती, मराठी, बंगाली, पंजाबी, नेपाली इत्यादि से काफी जुड़ी है। इसका उद्गम स्थल सैनिकों के कैंप रहे हैं। रेखता शब्द का अर्थ ही ‘सैनिक कैंप’ होते हैं। जहाँ विभिन्न भाषाओं के जानने वाले सैनिक आपस में संवाद के लिए एक साझी भाषा का आविष्कार करते हैं। यह एक ऐसा शब्द है जो खड़ी बोली के प्रारंभिक रूप को जानने के लिए किया जाता है।

10 स्वर और 36 व्यंजन वाली भाषा है हिन्दी

हिन्दी में कुल 46 ध्वनियाँ हैं, जिनमें 10 स्वर और 36 व्यंजन हैं। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। लेकिन केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के राजभाषा विभाग के अनुसार हिन्दी में 13 स्वर है, 35 व्यंजन और 4 संयुक्त व्यंजन है, यानि कुल 52 ध्वनियों वाली भाषा है हिन्दी।

देवनागरी लिपि में लेखन को सीखना आसान नहीं है। अंग्रेजी में मात्राओं जैसी कोई चीज़ नहीं होती है, लेकिन हिन्दी में अक्षरों के ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं चारो तरफ मात्राएं लगती हैं, और इसके कारण अक्षर की ध्वनि में बदलाव होता है और शब्दों के अर्थ में बदलाव होते हैं। शायद यही कारण है कि नागरी लिपि में लेखन-पद्धति को बहु-आयामी माना जाता है।

संदर्भः हिन्दी एक मौलिक व्याकरण। इसके लेखक रमा कान्त अग्निहोत्री जी हैं। अंग्रेजी भाषा में लिखी इस किताब का हिन्दी में अनुवाद अनुशब्द ने किया है।

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