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पुस्तक समीक्षाः अनारको के आठ दिन

new doc 2019-03-07 (2)_11798047408450830184..jpgइस पुस्तक की समीक्षा की है मनोहर चमोली  जी ने। वे एक शिक्षक हैं। लेखक भी और सक्रिय पाठक भी। इस पुस्तक के बारे में वे लिखते हैं, “अनारको एक लड़की है। घर में लोग उसे अन्नो कहते हैं। इस किताब में अनारको यानि अन्नो के आठ दिन के आठ किस्से हैं। लेकिन मानो उनमें सारी दुनिया आ समाई हो। अनारको में पाठक अपना बचपन भी देखता है और हर बच्चे का बालमन भी पढ़ सकता है। यह किताब ऐसी है कि सजग पाठक एक ही बैठक में पढ़ सकता है।”

लेखक सत्यु की भाषा न सिर्फ सरल और सहज है बल्कि वे बालमन के गहरे अध्येता लगते हैं। वे बच्चों की दुनिया से वाकिफ हैं। यही नहीं वे बच्चों में बचपना नहीं रेखांकित करते। वे तो अनारको के मुख से वह बुद्धिमता,चतुराई और सरलता भी उद्घाटित करते हैं जो एकदम सच है और इस किताब को खास बनाती है। कहीं कोई संदेश नहीं हैं। कोई उपदेश नहीं है। बल्कि अप्रत्यक्ष तौर पर बड़ों का बचकानापूर्ण रवैया,व्यवहार और तरीका किताब में पात्रों के जरिए सामने आता है। यह किताब इस बात का परिचायक है कि हम बड़े आखिर जिस बचपने को बीताकर बड़े होते हैं क्यों बालपन को लेकर अज्ञानी,निष्ठुर,कठोर और अवैज्ञानिक हो जाते हैं।

इस किताब में आठ दिन की अनारको की दिनचर्या मात्र है। बानगी के तौर पर आपके समक्ष दो-एक अंश दे रहा हूँ-

अनारको के आठ दिन के ‘प्रमुख अंश’

‘आज अनारको का मूड खराब है। सुबह-सुबह माँ ने बिस्तर से उठा दिया और कहा कि ये लोटा ले और मंदिर में ठाकुर जी को जल चढ़ा आ। अनारको ने पूछा कि ठाकुर जी को जल क्यों चढ़ाएँ? तो माँ ने कहा,‘‘ठाकुर जी को जल चढ़ाने से वह खुश होते हैं।’’ अनारको ने पूछा,‘‘ठाकुर जी को खुश क्यों करना?’’ तो माँ ने जरा जोर से कहा,‘‘ये भी कोई पूछने की बात हुई? चल उठ, और मंदिर जा।’’ अनारको ने समझाते हुए पूछा,‘‘अच्छा,ठाकुर जी क्या सिर्फ मंदिर में रहते हैं?’’ अम्मा को मौका मिला और झट से कहने लगीं,‘‘बेटी,ठाकुर जी तो हर जगह रहते हैं-पत्थरों में,पेड़ों में, घर में,दीवार में,सड़क पर, खेत में और पता नहीं कहाँ-कहाँ।’’ इस पर अनारको ने कहा,‘‘फिर मैं लोटे का यह पानी बाहर भिंडी के पौधों में डाल आऊँ?’’ माँ ने इस पर कुछ नहीं कहा। खींचकर उसे बिस्तर से उतारा और जमा दी चपत।’

‘नाटे से थे मास्साब और उम्र भी कम थी उनकी। पर आज देखो तो उनके भी तेवर बदले हुए। आते ही पूछने लगे,‘‘अच्छा बताओ,आज कौन आ रहे हैं अपने यहाँ?’’ बस अनारको खड़ी हो गई और पूछा,‘‘मास्साब ,प्रधानमंत्री कौन होते हैं?’’

मास्साब अकड़-रो गए,‘‘तुम प्रधानमंत्री नहीं जानती? देश के प्रधानमंत्री! अच्छा चलो बताओ,हमारे देश के प्रधानमंत्री का नाम क्या है?’’ नाम तो अनारको जानती थी लेकिन बताया नहीं। बदले में उसने पूछा,‘‘मास्साब,प्रधानमंत्री को मेरा नाम पता है?’’ इस पर तो मास्साब की अकड़ ही कम हो गई और चकरा भी गए। फिर कहा,‘‘प्रधानमंत्री को और कोई काम नहीं कि तुम्हारा नाम याद करते फिरें ……चलो बैठ जाओ।’’

फिर मास्साब सबको बताने लग गए या यूँ समझो पढ़ाने लग गए। इधर अनारको सोचने लगी-‘प्रधानमंत्री भी कैसा आदमी होगा? सब लोग उसको जानते हैं और वो किसी को नहीं जानता…..! कैसा अकेला-अकेला होगा प्रधानमंत्री !’

किताब के चित्र

किताब में हर दिन के हिसाब से रोचकता भरे हुए चित्र भी हैं। चित्रकार चंचल के चित्र अनारको के आठ दिनों को और भी जीवंतता प्रदान करते हैं। मुझे यकीन है कि आप इस किताब को पढ़ते हुए कई बार मुस्करा रहे होंगे और खुद में दो तरह से झांक रहे होंगे। पहला अपना बचपन याद कर रहे होंगे। दूसरा अब अपने आस-पास के बचपन को दूसरे मगर सकारात्मक नज़रिए से देख रहे होंगे। यह कम है क्या !

किताब के बारे में

किताब: अनारको के आठ दिन
लेखक: सत्यु
पृष्ठ: 104
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्य: 60
वेबसाइट : http://www.rajkamalprakashan.com
मेल : info@rajkamalprakashan.com

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(लेखक परिचय : मनोहर चमोली ‘मनु’ उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं। शिक्षण और लेखन में सतत सक्रिय हैं। उनकी लिखी  ‘ऐसे बदली नाक की नथ’ और ‘पूछेरी’ पुस्तकें नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुई हैं। ‘चाँद का स्वेटर’, ‘बादल क्यों बरसता है?’ और ‘अब तुम गए काम से’ सहित पांच पुस्तके ‘रूम टू रीड’ से प्रकाशित हुई हैं। सम्पर्क: 7579111144)

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