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‘अनारको के आठ दिन’ की कहानी क्या है?

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘अनारको के आठ दिन’ एक लड़की की कहानी है, जिसे उसके घर में प्यार से अन्नो कहा जाता है। इस किताब में अन्नो एक ऐसी लड़की के किरदार के रूप में सामने आती है जो जिन्दगी में अर्थ और आनंद की तलाश करती है। उसके सवाल इतने सधे हुए होते हैं कि उसके पापा कहते हैं कि उल्टे-पुल्टे सवाल मत पूछो पढ़ाई करो। वह जान जाती है कि पापा के पास उसके सवालों के जवाब नहीं हैं, इसलिए वह ऐसा कह रहे हैं। वह माँ से भी खूब सवाल करती है और अपने दोस्तों के साथ खूब धमाचौकड़ी भी करती है। इस किताब के कुछ अंश इतने सार्थक बन पड़े हैं जीवन की गुढ़ बातों को समझना बेहद आसान सा हो जाता है।

किताब के प्रमुख अंश

इस पुस्तक के लेखक सत्यु हैं और इसके चित्र चंचल ने बनाये हैं। भाषा का प्रवाह छोटे-छोटे वाक्यों और सधे हुए पैराग्राफ से बन पड़ता है। किताब को पढ़ते हुए पाठक बच्चों की नजर से अन्नो की दुनिया से घुलमिल जाता है और अन्नो के दोस्तों व परिवार से एक परिचय पा लेता है। कुछ संवाद बिल्कुल ही असंभव से लगते हैं, मगर साहित्य की यही तो सुंदरता है सच को विभिन्न माध्यमों से अभिव्यक्त होने का जरिया देना।

अनारको के आठ दिनः दूसरे दिन की कहानी पढ़िए

इस पुस्तक का एक अंश, “अनारको सोचने लगी पापा का प्रमोशन तो कभी न कभी हो ही जायेगा, भैया की नौकरी भी लग ही जायेगी, रतनमल की इतवारे में दुकान भी खुल जाएगी। सब लोग जो चाहते हैं, वह हो जाएगा। सिर्फ वह जो चाहती है वह नहीं होगा। फिर सोचने लगी नौकरी, प्रमोशन, दुकान……यह भी कोई चाहना हुआ, सब आलतू-फालतू बातें। कोई अफ्रीका जाना क्यों नहीं चाहता, जैसाकि वह खूब-खूब चाह रही थी। फिर उसने भूगोल की किताब उठाई, स्कूल वाली नहीं दूसरी किताब। किताब खोली और सोचने लगी अच्छा अफ्रीका में कबीले के लोग क्या चाहते होंगे?”

राजकमल द्वारा प्रकाशित यह किताब एकलव्य संस्था के पिटारा से भी मंगाई जा सकती है। इस किताब की कीमत 60 रुपए है। यह किताब उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए एक उपयोगी संकलन है।

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