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भाषा शिक्षणः अंग्रेजी भाषा सिखाने की चुनौतियों को आसान बनाने के लिए मैंने क्या किया?

shashi-kala-nनमस्कार, सबसे पहले मैं आप सब को अपना परिचय देना चाहूंगी। मैं शशि कला यादव, सहायक अध्यापिका, पूर्व माध्यमिक विद्यालय करमैनी, ब्लॉक पिपराइच गोरखपुर। बेसिक शिक्षा विभाग में मेरी नियुक्ति 2009 में हुई थी। तब से ले कर अब तक मैं बच्चों को अंग्रेज़ी विषय ही पढ़ाती आ रही हूँ। क्योंकि मेरी पूरी पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम से ही हुई है तो मेरी पोस्टिंग जिस भी स्कूल में होती है मैं वहाँ अंग्रेज़ी विषय को प्राथमिकता देती हूँ। हालांकि क्योंकि हमारे बच्चे गावों से संबंधित होते हैं तो अंग्रेज़ी विषय उनके लिए काफ़ी कठिन होता है। बच्चे चाहते तो हैं कि उनको पढ़ना आए मगर क्योंकि अंग्रेज़ी उनकी अपनी भाषा नही है तो इस विषय पर बच्चों की पकड़ बना पाना मेरे लिए काफ़ी कठिन हो जाता है।

तीन लोगों की मेहनत का फॉर्मूला

मैं वर्तमान में पूर्व माध्यमिक विद्यालय में पढ़ाती हूँ तो मेरे पास कक्षा 6 में जब बच्चे आते हैं तो उनमें से लगभग 50 प्रतिशत बच्चो का अंग्रेज़ी विषय से संबंधित ज्ञान संतोषजनक नही होता है। वैसे जहाँ तक मेरा अनुभव है एक बच्चे की पढ़ाई के के लिए तीन लोगों की मेहनत होना अनिवार्य है। उन तीन लोगों में शिक्षक, बच्चा और बच्चे के अभिभावक आते हैं। ये तीन कड़ी आपस मे हमेशा जुड़ी रहनी चाहिए। अगर एक भी कड़ी टूटी तो इसका असर सीधा बच्चे की पढ़ाई पर आता है। जब शिक्षक विद्यालय में बच्चे को पढ़ता है उस वक़्त वह बच्चे शिक्षक की ज़िम्मेदारी होता है। जैसे ही वह बच्चा घर जाता है उसकी पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी उसकी खुद की व उसके अभिभावक की होती है।

अभिभावक की भूमिका है महत्वपूर्ण

मैं यह मानती हूं कि हमारे गाँव के अभिभावक इतने पढ़े लिखे नही होते की वह अपने बच्चे को अंग्रेज़ी पढ़ा पाए। फिर भी मेरे विद्यालय में हर महीने जब शिक्षक अभिभावक की मीटिंग होती है तो मैं हमेशा अभिभावकों को यही बोलती हूँ कि आप स्वयं बच्चे के पास शाम को कम से कम एक घंटा बैठा करिए। भले ही आपको कुछ पढ़ाना ना आए मगर फिर भी आप उसके पास बैठिए। वह क्या कर रहा है उस पर ध्यान दीजिए। उससे पूछिये आज विद्यालय में क्या काम दिया गया है।

pic-3उसके बाद जब बच्चा विद्यालय आएगा तब तो वह शिक्षक की ही ज़िम्मेदारी होगा। मगर जब तक वह घर मे है तब तक तो आपको की देखना होगा उसकी पढ़ाई लिखाई। यहाँ मैं अपना अनुभव साँझा करना चाहूंगी। मैं अपने ही बच्चों की बात ले लूँ तो जब वो स्कूल से पढ़ के आते हैं तो मुझे भी शाम को उनको समय देना पड़ता है उनकी पढ़ाई के लिए। मैने यह अनुभव किया है कि अगर मैं अपने बच्चों को रोज़ घर पर ना पढ़ाऊँ तो वह भी पढ़ाई में काफी पिछड़ जाते हैं। इसलिए मैं अभिभावकों से हमेशा यह कहती हूँ कि शिक्षक-बच्चा-अभिभावक इनमें से कोई कड़ी नही टूटनी चाहिए।

अंग्रेजी शिक्षण के लिए मेरी कोशिश

वैसे जहाँ हमारे बेसिक के बच्चों की बात आती है उनकी पढ़ाई को लेकर एक शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। कारण मैं बता ही चुकी हूँ कि उनके अभिभावक इतने पढ़े लिखे नही होते और न कि उनके पास इतने पैसे होते है कि सभी अपने बच्चों को ट्यूशन भेज सकें। इसलिए यहाँ हम शिक्षकों की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ जाती है और यह हमारे लिए एक चुनौती की तरह होता है। मैं जब विद्यालय पहुचती हूँ तो मेरी कोशिश यही होती है कि अंग्रेज़ी के शब्दों का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तमाल करूँ। ताकि बच्चों के शब्द भण्डार में बढ़ोत्तरी हो और वे समझ के साथ उन शब्दों का स्वयं से इस्तेमाल करना सीख सकें।

इसके लिए सुबह अंग्रेज़ी की एक प्रार्थना भी ज़रूर करवाती हूँ। और यह प्रार्थना बच्चों द्वारा ही करवाई जाती है। जिसमे मेरी कोशिश होती है कि कक्षा 6, 7 व 8 तीनो कक्षाओं में से एक एक बच्चा मिल कर साथ मे प्रार्थना करवाए। विद्यालय समय मे बच्चों के सामने ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल करती हूं ताकि बच्चे उन शब्दों को हमेशा सुनते रहें। बार बार वही शब्द सुनते रहने से बच्चों को वह शब्द याद भी हो जाते हैं। यह काफी कारगर तरीका होता है बच्चों का शब्द भण्डार बढ़ाने का।

दीवार का इस्तेमाल और टीएलम बनाना

इसके साथ ही मेरी जो क्लासरूम होती हैं वो काफी सुसज्जित होती हैं। बच्चों द्वारा अंग्रेज़ी विषय से संबंधित चार्ट पेपर्स बनवा कर कक्षा की दीवारों पर लगाया जाता है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा शब्द बच्चों की आंखों के सामने रहें। वो उन्हें बार बार देखें। इसके साथ ही बच्चों के लिए मुझे शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM) बनाना काफी अच्छा लगता है। मेरी कोशिश होती है कि मैं अपने टीएलएम हमेशा रंगीन ही बनाऊ जिससे बच्चों का ध्यान आकर्षित हो। बच्चे वो टीएलएम बना कर अपनी कॉपियों में भी चिपकाते हैं। और यकीन मानिए उनको यह सब करना बहोत अच्छा भी लगता है।

children-1इन सब चीज़ों के द्वारा बच्चों का प्राप्त किया हुआ ज्ञान स्थाई भी हो जाता है। यहाँ पर मैं अपना एक अनुभव जोड़ना चाहूंगी। एक बार मैंने बच्चों को एक टॉपिक कक्षा 7 में पढ़ाया था टीएलएस इस्तमाल कर के। जब वही बच्चे कक्षा 8 में पहुँचे तो एक बार किताब पढ़ाते पढ़ाते वही टॉपिक फिर सामने आ गया। मुझे भी कुछ सेकण्ड्स लगे उस टॉपिक को याद करने में तभी तपाक से एक बच्ची ने उस टॉपिक को अपने शब्दों में बता दिया। मेरे कुछ बोलने से पहले ही। यकीन मानिए वह मेरे लिए काफी खुशी की बात थी। मैं काफी खुश हुई कि अभी मैं सोच भी नही पाई थी उस टॉपिक के बारे में और बच्ची ने तपाक से उसका जवाब भी दे दिया।

वह टॉपिक था “Interjection”… Interjection पर ही मैंने एक टीएलएम बनाया था जिसे उस बच्ची ने अपनी पिछली कक्षा में उस टीएलएम को इस्तमाल कर के पूरी कक्षा को समझाया था। उस दिन मुझे समझ आया कि पढ़ाई में टीएलएम का कितना महत्व है। बच्चा जब कोई चीज़ खुद कर के सीखता है तो उसका ज्ञान स्थाई हो जाता है। मेरी आदत है मैं हमेशा teaching learning materials बनाती रहती हूँ और कोशिश यह होती है कि बच्चों के साथ ही बनाऊ। बच्चे भी काफी interest ले कर बनाते हैं। मगर फिर भी अभी हम सबको बहुत मेहनत करने की ज़रूरत है। 50 प्रतिशत को 100 प्रतिशत बनाना बेहद कठिन कार्य है। इसके लिए तीनो कड़ियों का आपस मे जुड़ा होना बहुत ज़रूरी है साथ ही साथ तीनो कड़ियों का मेहनत करना भी बहुत ज़रूरी है।

(परिचयः शशि कला यादव पूर्व माध्यमिक विद्यालय करमैनी ब्लॉक पिपराइच गोरखपुर में सहायक अध्यापिका हैं। आप 2009 से शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। यह अनुभव आपने अंग्रेजी भाषा के शिक्षण को ध्यान में रखते हुए लिखा है। यह आपका एजुकेशन मिरर के लिए आपका पहला लेख है।)

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Jai Shekhar

बहुत सुंदर, बच्चे सीख पा रहे हैं, यही शिक्षण की सफलता है, और ऐसी कहानियों का सामने आना ही दूसरों को भी हौंसला देता है।

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