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‘भूतकाल के ग़म के लिए वर्तमान की ख़ुशी कुर्बान न करें’ – लेखिका मालती जोशी

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मालती जोशी जी के साथ इंटरव्यु करने की भी एक रोचक कहानी है। भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई के दिनों में पत्रकारिता विभाग के स्टूडेंट्स द्वारा ‘विकल्प’ नाम से एक अख़बार निकाला जाता था। इसके लिए हर किसी को अपने-अपने तरीके से योगदान करने की छूट थी।

इसी सिलसिले में मुझे भोपाल की लेखिका मालती जोशी जी के बारे में पता चला। उनकी कहानियों की सहजता और रिश्तों को बारीकी से समझने और अभिव्यक्ति करने का अंदाज़ स्वाभाविक सा लगा। इस तरह से उनके इंटरव्यु की तैयारी हुई। समय लेकर भोपाल स्थित उनके आवास पर मालती जोशी जी से लंबी बातचीत हुई। इसका एक अंश उस लैब जर्नल में प्रकाशित हुआ। शेष हिस्सा मेरे साथ भोपाल, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश में मेरी यात्रा के साथ घूमता रहा। वर्ष 2011 में मालती जोशी जी से हुई पूरी बातचीत विस्तार से पढ़िए।

वृजेश सिंहः मालती जोशी जी, आपने लिखना कबसे प्रारंभ किया?

मालती जोशीः मैंने छात्र जीवन से ही लिखना शुरू कर दिया था। लेकिन मेरे लेखन का प्रकाशन काफी बाद में जाकर हुआ। मैंने अपने लेखन की शुरूआत कविताओं से की थी।

वृजेश सिंहः आपकी पहचान तो मूलतः एक कहानीकार के रूप में है। कविताओं की यात्रा के बारे में भी बताएं।

मालती जोशीः हाँ, अब ज्यादातर कहानियाँ ही लिखती हूँ। रही बात कविताओं की तो वे अनायास ही लेखन की यात्रा में पीछे छूट गईं।

वृजेश सिंहः उपन्यास की बजाय कहानियों को आपने लेखन के लिए क्यों उपयुक्त माना?

मालती जोशीः उपन्यास लिखना जीवट का काम है। उपन्यास लेखन बड़ा धैर्य माँगता है। लेखन का कैनवास बहुत बड़ा हो जाता है और पात्र बढ़ जाते हैं। घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। इस सारी चीज़ों को एक मुकाम तक पहुंचानाा समय माँगता है। जबकि कहानी एक घटना विशेष पर केंद्रित होती है और आसानी से पूरी हो जाती है।

वृजेश सिंहः आपने अपनी कहानियों में किन-किन विषयों को प्रमुखता से शामिल किया है?

मालती जोशीः परिवार जीवन की धुरी है। मेरी प्राथमिकता में भी परिवार आता है, इसलिए इसे ही अपने लेखन का प्रमुख विषय बनाया है। लेखन हमेशा मेरे लिए दूसरे स्थान पर रहा। परिवार से जुड़े मसले स्वतः मेरी कहानियों में आते चले गये। मध्यवयी उम्र की नारी माँ, बहन, भाभी विभिन्न भूमिकाएं निभाती है। मैंने इन महिलाओं को ध्यान में रखकर कहानियां लिखी हैं, क्योंकि मेरे कहानी लेखन की शुरूआत भी उम्र के इसी पड़ाव से हुई। युवाओं के रोमांस और बुजुर्गों की समस्याओं पर तो काफी कुछ लिखा गया है। इसलिए इस उम्र की महिलाओं की ज़िंदगी को मैंने अपने लेखन का विषय बनाया।

वृजेश सिंहः अपनी कहानियों में तलाक वाले मुद्दे को आपने बड़ी संजीदगी से उठाया है?

मालती जोशीः पति-पत्नी में तलाक से सबसे ज्यादा कष्ट बच्चों को होता है। एक पिता का महत्व बच्चे के लिए बहुत मायने रखता है। पिता के चले जाने के बाद बच्चे अनाथ महसूस करते हैं। उनमें असुरक्षा की भावना आ जाती है। इसलिए मेरी एक कहानी में पत्नी अपने पति से कहती है, “मुझे छोड़ दो, लेकिन मेरे बच्चों को मत छोड़ना।” हमारा समाज भी तलाकशुदा महिलाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखता है। ‘कवच’ कहानी में एक विधवा की लड़की अपनी दोबारा शादी से केवल इस नाते इनकार कर देती है क्योंकि लड़के के परिवार वाले उसकी माँ की उपेक्षा करते हैं।

वृजेश सिंहः महिला लेखकों पर अक्सर ये आरोप लगाया जाता है के वे सीमित विषयों पर लिखती हैं? आप क्या कहेंगी?

मालती जोशीः मेरे ऊपर तो यह आरोप सबसे ज्यादा लगता है। कोई लेखक क्या लिखेगा, यह उसका अपना निर्णय होता है। मैंने भी अपने अनुभव संसार पर लिखा है। मैं, उधार के अनुभवों पर लेखन नहीं करती। अगर मेरा अनुभव संसार उतना विस्तृत नहीं है, तो मैं क्या करूं।

वृजेश सिंहः आपकी कहानियों के शीर्षक में कविताओं की झलक मिलती है, इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?

मालती जोशीः हाँ, कविताओं से मेरा जो प्रेम है वो कहानियों के शीर्षकों में उतर आता है। संवेनदनशीलता का गद्य में अवतरण उसको जीवंत बनाता है। इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक है। मेरा कविताओं के प्रति लगाव बना हुआ है। जैसे ‘साँझ की बेला, पंक्षी अकेला’, ‘अमावस का चाँद’ जैसे शीर्षक इसके कुछ उदाहरण हैं।

वृजेश सिंहः ‘गतांक से आगे’ कहानी के बारे में कुछ बताएं।

मालती जोशीः यह कहानी यही बताती है कि भूतकाल के ग़म के लिए आज की ख़ुशी को कुर्बान नहीं करना चाहिए। वर्तमान ज्यादा महत्वपूर्ण है। भूतकाल के लिए अपने वर्तमान को धूमिल नहीं करना चाहिए।

वृजेश सिंहः आपने किन-किन लोगों को विशेषतौर पर पढ़ा है?

मालती जोशीः मैंने बचपन में पूरा शरत साहित्य घोंट डाला था। आशापूर्ण देवी, मन्नू भंडारी, इस्मत चुगतई, उपेन्द्रनाथ अश्क, रेणु को पढ़ा है। उम्र के हर पड़ाव पर अलग-अलग लेखकों को पढ़ा। सुर्यबाला, चित्रा मुद्गल और शिवानी को विशेष रूप से पढ़ा और पढ़ती रहती हूँ।

वृजेश सिंहः आपने अपनी एक किताब शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ जी को समर्पित की है। उनसे जुड़ी कोई ख़ास बात जो आपको अबतक याद हो।

मालती जोशीः मेरी पढ़ाई इंदौर के होल्कर कॉलेज से हुई, जो उस समय आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध था। मैं इंग्लिश, हिन्दी, इतिहास से बी.ए. करने के बाद इंग्लिश से एम.ए. करना चाहती थी। लेकिन उसी समय इंग्लिश पढ़ाने वाले सर का स्थानांतरण उज्जैन में हो गया। इसी दौरान शिलमंगल सिंह सुमन जी मेरे कॉलेज में हिन्दी पढ़ाने के लिए आए, उनसे पढ़ने की ललक में मैंने हिन्दी से एम.ए. किया। इसे मैं अपने जीवन का एक निर्णायक मोड़ मानती हूँ। उस समय की एक बात मुझे याद आ रही है कि शिव मंगल सिंह सुमन जी की पत्नी यानि गुरूमाता पाँव छूने पर बड़ी नाराज़ होतीं और कहतीं कि लड़की होकर पाँव छूती है, मुझे पाप की भागी बनाएगी।

शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ जी के पढ़ाने की शैली इतनी अच्छी थी कि वो जिस भी लेखक को पढ़ाते थे, ऐसा लगता था कि दुनिया का सबसे अच्छा लेखक और कवि वही है। उन्होंने हमें सूरदास को बहुत अच्छे से पढ़ाया। ऐसा लगता था कि उनके कंठ में साक्षात सरस्वती विराजमान थीं। महाकाल की नगरी उज्जैन में शिवमंगल जी ने मेरे कविता संग्रह का भी विमोचन किया, वो पल मेरी ज़िंदगी के ख़ास लम्हों में से एक है। उस किताब को मैं अपनी सबसे ख़ुशकिश्मत किताब मानती हूँ।

वृजेश सिंहः अगर आप साहित्यकार नहीं होतीं, तो क्या होतीं?

मालती जोशीः मैं, यक़ीनन एक गायक होती। मैंने रेडियो पर भी गायन किया है। संगीत साधना रियाज़ मांगती है, पर लेखन इससे ज्यादा सहज लगता है मुझे।

वृजेश सिंह: कहानी लेखन के संदर्भ में अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं?

मालती जोशीः कोई घटना मन में उमड़ती-घुमड़ती हुई कहानी का शक्ल अख़्तियार करती है, जब वो पूरी तरह तैयार हो जाती है तो उसे रफ़ कॉपी पर उतार लेती हूँ। जब घर में कोई नहीं होता है तो उसमें सुधार करती हूँ। फिर से फेयर करती हूँ। कई बार ऐसा होता है कि एक कहानी कई दिनों तक चलती रहती है। कभी किसी कहानी का शीर्षक पसन्द नहीं आता, तो कभी उसका अंत अच्छा नहीं लगता। इस तरह से मेरी लेखन की प्रक्रिया संपन्न होती है।

वृजेश सिंहः साहित्य के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है? इस बारे में आप क्या सोचती हैं?

मालती जोशीः जीवनशैली में परिवर्तन के कारण लोगों की साहित्य में रुचि घट रही है। अब लोगों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब कोई भी पत्र भी नहीं लिखता। मैं, पहले सालभर के पत्रों को इकट्ठा करके उनको अलग-अलग छांटती थी कि कौन से परिवार वालों के हैं। कौन से रिश्तेदारों के और कौन से प्रशंसकों के। अब रिश्तेदारों के पत्र तो लगभग शून्य हो गये हैं। फोन पर ही बात हो जाती है, चिट्ठी का आनंद अब समाप्त हो गया है।

साक्षात्कार के आख़िर में मालती जोशी जी ने कहा, “मेरी कोशिश होती है कि सकारात्मक लेखन करूँ ताकि पढ़ने वाले को ख़ुशी मिले। भाषा का स्तर भी सामान्य रखती हूँ। मुझे पाठकों की प्रतिक्रियाओं से बड़ा सहारा मिलता है। आजक लोग भीड़ में अकेले हैं। वो अकेलापन जो लिखने के लिए जरूरी है, वो कम होता जा रहा है। इसे नगरीय जीवन शैली का एक दुष्प्रभाव भी कहा जा सकता है।”

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Durga thakre

“जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियों को, स्मरणीय क्षणों को मैं अपनी कहानियों में पिरोती रही हूं। ये अनुभूतियां कभी मेरी अपनी होती हैं कभी मेरे अपनों की। और इन मेरे अपनों की संख्या और परिधि बहुत विस्तृत है। वैसे भी लेखक के लिए आप पर भाव तो रहता ही नहीं है। अपने आसपास बिखरे जगत का सुख-दु:ख उसी का सुख-दु:ख हो जाता है। और शायद इसीलिये मेरी अधिकांश कहानियां “मैं” के साथ शुरू होती हैं।”

मालती जोशी का सम्पूर्ण जीवन साहित्य को समर्पित रहा । साहित्य जगत की महान हस्ती के अनुभवों को साँझा करने के लिए धन्यवाद सर ।🙏🙏

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