आज़ादी के 75 साल: ‘नामांकन की प्रगति को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से सफल बनाने की है जरूरत’

हम इस साल अपने देश के स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ को ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के रूप में मना रहे हैं। देश की आज़ादी का दिन हम सभी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह दिन भारत की आज़ादी के संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों शहीदों को याद करने का है। उनके प्रति हृदय की गहराइयों से कृतज्ञता ज्ञापित करने का है। इसके साथ ही साथ भारत के भविष्य की दिशा और दशा तय करने और एक लोकतांत्रिक देश के रूप में इसकी नींव को मजबूत करने वाले सिद्धांतकारों को भी स्मरण करने का दिन है।

इन 75 वर्षों में भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में काफी उन्नति की है। देश के विभिन्न हिस्सों तक विकास की रौशनी पहुंचाने और शिक्षा के माध्यम से लोगों के जीवन में सामाजिक गतिशीलता लाने के प्रयासों को गति देने के प्रयास हो रहे हैं। एक स्वस्थ परंपरा विकसित करते हुए, अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य की भी चर्चा हो रही है। विकास के मॉडल की भी बात हो रही है, लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि भारत आबादी के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इस मानवीय संसाधन का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए ज्ञान व कौशल विकास के क्षेत्र में भारी निवेश करने की जरूरत आज भी है। इसके साथ ही साथ शिक्षा को लाभ का व्यवसाय बनने की बजाय एक विज़न से संचालित करने की जरूरत है ताकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मात्र कुछ संस्थाओं और केंद्रीकृत सुविधा वाले स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का एकाधिकार बनकर न रह जाए। क्योंकि ऐसी स्थिति में हम स्थानीय और वैश्विक बाज़ार में सस्ते श्रम का केंद्र बनकर रह जाएंगे। अपने नागरिकों के लिए उन अवसरों तक पहुंच को सीमित कर देंगे जो ज्यादा देश-विदेश के अवसरों में ज्यादा बड़ी भागीदारी के माध्यम से भारत के पक्ष में आर्थिक हितों को मजबूत बनाने की असीम संभावनाओं को साकार कर सकती है।

भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए विदेश का कोई भी मॉडल यहाँ पर पूरे तरीके से फिट नहीं होगा, ऐसे में जरूरत है कि हम भारत के बारे में भारतीय व दक्षिण एशिया के परिदृश्य को ध्यान में रखकर सोचने व समाधान विकसित करने की कोशिशों पर ज्यादा ध्यान दें। भारत के छात्र-छात्राओं की प्रतिस्पर्धा वैश्विक बाज़ार में चीन, अमेरिका व अन्य देशों के छात्र-छात्राओं के साथ भी है, इसे ध्यान में रखते हुए दीर्घकाल की योजना पर काम करने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया को चार वर्षीय पाठ्यक्रम के माध्यम से सुगम बनाने जा रही है। इसके साथ ही साथ विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भी भारत में उच्च शिक्षा में मौजूद अपार संभावनाओं का रास्ता खोलने की दिशा में प्रयासरत है। लेकिन इसके साथ ही साथ हमें अपने देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों व राज्य सरकारों द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों को सीधे प्रतिस्पर्धा के लिए छोड़ देने और स्व-वित्त पोषित कोर्सेज़ के माध्यम से अपना खर्चा चलाने व आत्मनिर्भरता के अत्यधिक बोझ से दबने वाली स्थिति से ‘सुरक्षित माहौल’ देने की जरूरत है। देश के नागरिकों में निवेश देश के भविष्य में निवेश है। लोन के माध्यम से ‘उच्च शिक्षा’ का जो सिलसिला चला है वह दूर तक जायेगा, इसके कुछ अच्छे परिणाम हैं तो छात्र-छात्राओं के ऊपर इस लोन को चुकाने का एक दबाव भी होता है। इस प्रक्रिया को सुगम बनाने और उच्च शिक्षा वाले लोन पर ब्याज दर को भी न्यूनतम रखने की जरूरत है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारत की प्राथमिक शिक्षा को मजबूती देने के लिए वर्षों के इंतज़ार के बाद पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को विद्यालय पूर्व तैयारी से जोड़ने की सक्रिय कोशिश हो रही है। राजस्थान जैसे राज्य में वर्ष 2011 के आसपास आँगनबाड़ी हेतु शिक्षकों की नियुक्ति इस दिशा में होने वाले छोटे-छोटे लेकिन बेहद जरूरी प्रयासों का एक उदाहरण है। भविष्य में नर्सरी ट्रेनिंग कोर्सेज़ करने वाले अभ्यर्थियों को मौका देने की जरूरत है ताकि रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो। ऐसे अवसर स्थायी नियुक्ति के स्वरूप में मिलने चाहिए न कि ऐसे रूप में जो शिक्षकों की मौजूदा स्थिति को कमज़ोर बनाने वाले हों। पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में ‘प्रोफ़ेशनव डेवेलपमेंट’ को मिशन मोड में संचालित करने और विभिन्न विषयों में उच्च स्तर के क्षमतावर्धन और स्थानीय समस्याओं का समाधान करने के लिए एक्शन रिसर्च की संस्कृति विकसित करने की जरूरत है। इसके माध्यम से स्थानीय स्तर की चुनौतियों को पहचानने और उनका समाधान खोजने की दिशा में होने वाले प्रयासों को गति मिलेगी।

आदिवासी अंचल में शिक्षा के लिए स्थानीय भाषा को आधार बनाने और शिक्षा के माध्यम (हिन्दी, अंग्रेजी व अन्य) की भाषा में बच्चों को पारंगत बनाने के लिए होने वाले प्रयासों को मूर्त रूप देने की जरूरत है। भारत एक बहुभाषी देश हैं, ऐसे में बहुभाषिकता को एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करने के साथ-साथ शिक्षा तक बच्चों की पहुंच को सुगम बनाने के लिए व्यावहारिक उपायों की जरूरत है। विभिन्न भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव और कक्षा-कक्ष में उनकी सशक्त मौजूदगी के सजग प्रयास जरूरी है। इसके अभाव में हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी बच्चे इंग्लिश मीडियम में मिलने वाले निर्देश के अनुवाद से सामंजस्य बैठाने में अपनी ऊर्जा लगाते रहेंगे। ऐसी स्थिति का बच्चों के समझ निर्माण की क्षमता पर विपरीत असर पड़ता है और उनके अनुभव प्रमुखता व महत्व के साथ कक्षा-कक्षा में नहीं आ पाते हैं। ऐसी स्थिति में स्कूली जीवन और बच्चों के वास्तविक जीवन में एक कटाव बना रहा है, जबकि दोनों के बीच पुल बनाने की चर्चा एनसीएफ-2005 के आने के बाद से सतत जारी है।

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