उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की ‘पेयरिंग’ को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है?

उत्तर प्रदेश में सरकारी ‘स्कूलों की पेयरिंग’ को लेकर पूरे देश में चर्चा हो रही है। लोग इसके बारे में जानना चाहते हैं कि ‘स्कूलों की पेयरिंग‘ और ‘स्कूलों के विलय‘ में क्या कोई अंतर है या दोनों बातें एक ही हैं। क्या स्कूलों की पेयरिंग से सरकारी स्कूल बंद हो सकते हैं और इससे बड़ी संख्या में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और कंपोजिट स्कूल बंद हो जाएंगे। इन सरकारी स्कूलों के बंद होने का असर बच्चों के ऊपर और शिक्षकों के समायोजन की स्थिति पर कैसे पड़ेगा? इसको समझने की कोशिश इस विश्लेषण में की गई है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से ‘स्कूल पेयरिंग’ करने की योजना को क्रियान्वित करने का निर्णय किया है। इसके तहत राज्य के लगभग 5,000 ऐसे सरकारी स्कूल, जिनमें छात्रों की संख्या 50 से कम है, उन्हें पास के बेहतर संसाधनों से युक्त स्कूलों के साथ पेयर /मिलाया जाएगा। इस नीति का उद्देश्य छात्र–शिक्षक अनुपात को संतुलित करना, स्कूलों की अधोसंरचना का समुचित उपयोग करना, नामांकन दर बढ़ाना और विशेष रूप से ड्रॉपआउट को कम करना है।
जो तथ्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं उनका सहारा लेकर हम तथ्यात्मक ढंग से ‘स्कूल पेयरिंग’ के आइडिया को समझने की कोशिश करेंगे।
‘स्कूलों की पेयरिंग‘ के मायने
‘स्कूलों की पेयरिंग‘ से एक स्कूल को दूसरे नजदीकी स्कूल में मिला दिया जायेगा जहाँ पर नामांकन और बुनियादी संसाधन तुलनात्मक रूप से ज्यादा होगा। उदाहरण के तौर पर अगर किसी प्राथमिक विद्यालय में 51 बच्चों का नामांकन है और पास के किसी अन्य प्राथमिक विद्यालय में 20 बच्चों का नामांकन है तो 20 बच्चों वाले विद्यालय की पेयरिंग 50 बच्चों वाले स्कूल के साथ कर दी जायेगी।
यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि स्कूलों की पेयरिंग के लिए जारी गाइडलाइन में कहीं भी शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 के तहत निर्धारित दूरी वाली बात का उल्लेख नहीं किया गया है। जो एक किलोमीटर के भीतर प्राथमिक विद्यालय और तीन किलोमीटर के भीतर उच्च प्राथमिक विद्यालय की बच्चों तक पहुंच को सुनिश्चित करने की बात करती है।
‘स्कूलों की पेयरिंग‘ का प्रभाव
पेयरिंग के असर को आसान भाषा में एक उदाहरण से समझते हैं। उत्तर प्रदेश के अलग–अलग जिलों में पेयरिंग वाले विद्यालयों की संख्या अलग–अलग होगी। उदाहरण के लिए अगर किसी जिले में 1200 प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और कंपोजिट विद्यालय हैं। अगर यहाँ पर 200 विद्यालयों की पेयरिंग हो जाती है तो संबंधित जिले में विद्यालयों की कुल संख्या घटकर 1000 हो जायेगी। राज्य स्तर के असर को समझने के लिए आप इस अनुमानित आँकड़े को जिलों की कुल संख्या 75 से गुणा करके समझ सकते हैं। यानि अगर प्रत्येक जिले में 100 स्कूलों की पेयरिंग होती है तो राज्य स्तर पर यह संख्या 7,500 और 50 स्कूलों की पेयरिंग होने पर यह संख्या कम से 3,750 स्कूलों के आसपास होगी। (नोट यह आँकड़े सिर्फ एक अनुमान हैं और स्थितियों को आसान भाषा में डेटा के माध्यम से समझने के लिए हैं। पेयरिंग वाले स्कूलों की वास्तविक संख्या का डेटा इससे भी बहुत कम या ज्यादा हो सकता है।)
पेयरिंग के पक्ष में एक तर्क यह भी है कि विद्यालयों की संख्या घटने के कारण विद्यालयों की बेहतर मॉनिटरिंग हो सकेगी और 200 विद्यालयों की कमी से बचे संसाधनों को अन्य विद्यालयों में इस्तेमाल किया जा सकेगा इसमें शिक्षकों के रूप में मानवीय संसाधन भी शामिल है। यानि किसी विद्यालय में जहाँ पास के स्कूल से बच्चों की पेयरिंग होगी शिक्षकों की संख्या बढ़ेगी, इससे आदर्श स्थिति में सभी कक्षाओं के लिए एक शिक्षक उपलब्ध होंगे और एकल विद्यालयों की समस्या का काफी हद तक समाधान हो सकेगा।

‘स्कूलों की पेयरिंग‘ का बच्चों पर असर
अगर पेयरिंग के बच्चों पर होने वाले असर को समझना हो तो एक उदाहरण ले सकते हैं। मान लीजिए किसी जिले में 100 विद्यालयों की पेयरिंग होती है। इन विद्यालयों में छात्रों का औसत नामांकन 28 है जो प्रभावित होने वाले कुल बच्चों की संख्या लगभग 2,800 होगी। अगर केवल 50 विद्यालयों की पेयरिंग होती है तो यह डेटा लगभग 1400 बच्चों के आसपास होगा। (ध्यान रखें कि यह डेटा केवल स्थिति की गंभीरता को बयान करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। वास्तविक संख्या सभी जिलों से डेटा सार्वजनिक होने के बाद ही पता चलेगी, क्योंकि इस आशय की प्रक्रिया अभी भी गतिमान है।) प्रत्येक विद्यालय के अनुसार बच्चों की संख्या निश्चित रूप से कहीं पर कम या कहीं पर ज्यादा होगी। अगर किसी विद्यालय में केवल 5 बच्चे हैं तो वहाँ पर असर तुलनात्मक रूप से कम होगा और कहीं पर बच्चों का नामांकन 40 या 48 है तो वहाँ पर इसका असर ज्यादा होगा।
उपरोक्त स्थिति के अनुसार भी समुदाय के स्तर पर अभिभावकों, विद्यालय प्रबंधन समित और समुदाय के लोगों के साथ स्पष्ट संवाद, जरूरी सहयोग और पेयरिंग होने वाली स्थिति में बच्चे अपने वर्तमान विद्यालय से नवीन विद्यालय में कैसे जाएंगे, इसको लेकर भी रणनीति बनाने और व्यावहारिक समस्याओं व चुनौतियों को ध्यान में रखकर संवेदनशीलता के साथ फैसला लेने की जरूरत है। यह पहलू महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा का अधिकार कानून विद्यालय को बच्चों की पहुंच में होने की बात करता है।
‘स्कूलों की पेयरिंग‘ का प्रमुख आधार है ‘कम नामांकन‘
एक गौर करने वाली बात है कि ‘स्कूलों की पेयरिंग’ की आवश्यकता को विद्यालयों में कम नामांकन से सीधे–सीधे जोड़कर देखा जा रहा है। यानि अगर नामांकन कम है तो ऐसे स्कूलों में नामांकन फिर से बढ़ सकता है, इस उम्मीद पर भरोसे की कमी दिखाई देती है।
शिक्षकों की यह राय भी हो सकती है कि उनको विद्यालय में नामांकन बढ़ाने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। यहाँ एक गौर करने वाली बात है कि ‘कम नामांकन होने को, कम जिम्मेदारी‘ के रूप में देखने–समझने वाले आइडिया के दिन अब बीत चुके हैं। इस नजरिये और सोच’ में अब बदलाव करना होगा तभी 21वीं सदी की जरूरतों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच सरकारी स्कूल अपने अस्तित्व को बचा पाएंगे।
यानि अगर विद्यालय में बच्चों का पर्याप्त नामांकन है तभी ऐसे विद्यालयों का भविष्य और वहाँ पर बेहतर सुविधाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विभाग की तरफ से प्रतिबद्धता और सहयोग मिलेगा। विद्यालयों में बच्चों के नामांकन और कक्षा स्तर के अनुसार उनके अधिगम की उपेक्षा करने वाले दिन, अब अतीत की बात हो जाएंगे। यानि बच्चों के कक्षा–अनुरूप अधिगम स्तर हासिल करने और सीखने वाली बात स्कूल पेयरिंग का आधार नहीं है। अभी सिर्फ नामांकन की वर्तमान स्थिति और यूडाइस–प्लस पर अपडेट किये गए डेटा को इसका आधार बनाया जा रहा है। यानि नामांकन के साथ–साथ अधिगम को आगामी अपेक्षित लक्ष्य के रूप में देखा जा रहा है।
‘स्कूलों की पेयरिंग‘ का क्रियान्वयन है जटिल
आखिर में इसके क्रियान्वयन को लेकर कुछ प्रमुख बिन्दुओं का उल्लेख करते हैं जिनका ध्यान ‘स्कूलों की पेयरिंग’ की प्रक्रिया में रखा जाना चाहिए
1. प्रत्येक बच्चे पर शिक्षा का वार्षिक अनुमानित खर्च लगभग 45,000 रुपए है। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा एक सोशल गुड है, यह कोई बिजनेस नहीं है जहाँ पर लागत–लाभ विश्लेषण या लाभ–हानि को मानवीय संवेदनशीलता और बच्चों तक सुगम पहुंच के ऊपर रखा जाए। अगर एक बच्चा भी प्रभावित होता है, तो यह मुद्दा बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार से सीधे जुड़े होने के कारण संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की अपेक्षा रखता है।
2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार कक्षा 1 से 5 तक के लिए स्कूल अधिकतम 1 किलोमीटर के भीतर और कक्षा 6 से 8 के लिए अधिकतम 3 किलोमीटर की दूरी पर होना चाहिए। स्कूलों की पेयरिंग की प्रक्रिया में ग्रामीण और दूर–दराज के बच्चों के प्रति संवेदनशीलता और शिक्षा के मौलिक अधिकार की दृष्टि से इन मानकों का ध्यान रखा जाना चाहिए। क्योंकि इनकी उपेक्षा करने से बच्चों की विद्यालय में उपस्थिति घट सकती है या उनकी पढ़ाई छूट सकती है। बालिकाओं की शिक्षा पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
3. ‘स्कूलों की पेयरिंग’ के समय दोनों स्कूलों के भौतिक संसाधनों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी है ताकि कोई स्कूल अच्छी भौतिक स्थिति वाले बिल्डिंग से किसी खराब भौतिक अधोसंरचना वाली स्थिति में न शिफ्ट हो। ऐसा होने की स्थिति में जमीनी स्तर के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। इस आशय की खबरें भी मीडिया में प्रकाशित हो रही हैं। लेकिन ऐसी स्थिति का आना दर्शाता है कि पहलू पर ज्यादा गौर करने की जरूरत है।
4. प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र में कुछ स्कूल तुलनात्मक रूप से समान संसाधनों में बेहतर प्रदर्शन कर रहे होते हैं। कई बार ऐसे विद्यालयों और वहाँ काम करने वाले शिक्षकों की परिस्थितियां भी बेहद विपरीत होती हैं। लेकिन वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने संघर्ष से विद्यालय को कम नामांकन और कम सुविधाओं से बाहर निकालकर बेहतर स्थिति में ले आते हैं। एक वास्तविक घटना का उदाहरण लेते हैं जहाँ एक विद्यालय में केवल 3 का स्टाफ था। शिक्षिका ने अपने विद्यालय में भवन के लिए सहयोग माँगा और भवन बनने के बाद वहाँ बच्चों का कुल नामांकन 350 के आसपास पहुंच गया। लेकिन अन्य विद्यालयों से लगे स्टाफ के वापस जाने से वहाँ का नामांकन वापस घटकर 100 पर पहुंच गया है।
इस उदाहरण को रखने का उद्देश्य है कि ऐसे विद्यालय जो मॉडल बन सकते हैं, बच्चों की शिक्षा को लेकर अच्छी लीडरशिप दे सकते हैं। उनके बारे में केवल यूडाइस–प्लस के डेटा के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। स्कूलों की पेयरिंग के लिए ऐसे अच्छे विद्यालयों को शामिल करना जो बेहतर कर सकते हैं, एक ऐसा उदाहरण बन सकता है, जो इस स्कूल पेयरिंग का मूल उद्देश्य नहीं है।
(स्कूलों की पेयरिंग को लेकर आपके क्या विचार और जमीनी अनुभव हैं, आप टिप्पणी के रूप में लिख सकते हैं।)
संदर्भ (References):
1. Right to Education Act, 2009 – Ministry of Education, Government of India
2. National Education Policy, 2020 – https://www.education.gov.in
3. National Curriculum Framework for Foundational Stage, 2022 – NCERT
4. “School Consolidation and its Impact on Access and Equity in Rajasthan” – RTE Forum Report
5. “Uttar Pradesh Government School Pairing Model News Reports” – Hindustan Times, The Hindu, Dainik Jagran (2025)
