बालमन की खिड़की से झाँकती ‘सुर्की और तिर्की’

प्रदीप ढेकळे, ग्रंथपाल, डॉ. इरावती कर्वे ग्रंथालय, फलटण में बच्चों को कहानी सुनाते हुए।
‘सुर्की और तिर्की’पुस्तक का प्रकट वाचन करते समय ग्रंथपाल प्रदीप ढेकळे सर ने बच्चों से लगातार संवाद करते हुए उनमें कहानी के प्रति जिज्ञासा जगाई। प्रश्नोत्तर से बच्चों की उत्स्फूर्त प्रतिक्रियाएँ सामने आईं और उसी से कहानी का आशय बच्चों के मन से जुड़ गया। इस संवादात्मक प्रक्रिया से बच्चों ने नए शब्द समझे, जैसे धसमुसळी, चिड़की, जुड़वा, आगावू आदि।
बच्चों ने पात्रों के गुण भी पहचाने –जैसे आगावू, चिड़चिड़ करने वाली, शांत, नीटनेटकी – और उन्हें अपने अनुभवों से जोड़कर देखा। आगे चलकर बालशिक्षिका ने कक्षा में बच्चों से कहानी के आशय पर चर्चा की और उन्हें चित्र बनाकर अपनी कहानी स्वयं की लिपि में लिखने के लिए प्रेरित किया। चित्र बनाने के बाद बच्चों ने अपने चित्र के आधार पर स्वलिपि में कहानी लिखी। उन्होंने कहानी बालशिक्षिका को सुनाई। बालशिक्षिका ने वह कहानी लिखकर ली।
इससे बच्चों की भाषिक अभिव्यक्ति के साथ–साथ उनकी राय, निरीक्षणशक्ति और कल्पनाशक्ति को बढ़ावा मिला। इस प्रक्रिया में पठन, संवाद, चित्र और स्वलिपि लेखन का संगम कर बच्चों को बालशिक्षण की दृष्टि से एक समृद्ध और आनंददायक सीखने का अनुभव प्राप्त हुआ। ग्रंथालय की कक्षा में ३ से ४ वर्ष और ४ से ५ वर्ष के बच्चों यानी शिशुगट और मध्यम गट के बच्चों के साथ अलग–अलग समय पर माधुरी पुरंदरे लिखित ‘सुर्की और तिर्की’ इस पुस्तक का प्रकट वाचन किया गया। इस उपक्रम का उद्देश्य बच्चों को पुस्तकों से परिचित कराना, कहानी समझाना तथा भाषिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास साधना था।
शिशुगट (३–४ वर्ष आयु वर्ग) के छोटे बच्चों ने चित्रों के आधार पर कहानी समझी, पात्रों के नाम पहचाने और प्रसंगों पर अपनी भाषा में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पुस्तक के अवयवों (मुखपृष्ठ, मलपृष्ठ, कणा) को पहचानकर बताया। साथ ही प्रश्न – “आपके मित्र कौन हैं? उनके साथ क्या खेलना अच्छा लगता है?” पर भी उत्स्फूर्त उत्तर दिए। इस स्तर पर उनकी शब्दसंपदा बढ़ी, सामाजिक सहभागिता और पुस्तक संभालने की कौशलता नज़र आई।
मुख्य पृष्ठ और किताब पर चर्चा के अनुभव

मध्यम गट (४–५ वर्ष आयु वर्ग) इस समूह के साथ ‘सुर्की और तिर्की’का वाचन किया गया। सबसे पहले सर ने पुस्तक के अवयवों की ओळख कराते हुए मुखपृष्ठ, पिछला पृष्ठ और कणा दिखाकर पूछा – “यह क्या है?” बच्चों ने उत्तर दिए –
मुखपृष्ठ पर क्या–क्या होता है?
आरुष – लेखक का नाम
वेदांश – चित्रकार का नाम
शिवांजली – कहानी का नाम
उन्होंने बताया कि इस पुस्तक पर सिर्फ माधुरी पुरंदरे का नाम है, यानी माधुरी ताई ने ही कहानी लिखी और चित्र भी बनाए हैं। पुस्तक का नाम पढ़कर सर ने पूछा – “सुर्की और तिर्की नाम किसके होंगे?” कुछ बच्चों ने कहा – लड़कियों के होंगे, तो कुछ ने कहा –लड़कों के नाम होंगे। इसके बाद पुस्तक पढ़ी गई।
वाचन के समय नए शब्दों की ओळख कराई गई। जैसे – धसमुसळी का क्या मतलब? चिड़की क्या करती है? जुड़वा का क्या अर्थ? मायर ने जवाब दिया कि इसका मतलब है दो बहनें। वेदांश ने जवाब दिया दो सहेलियाँ। “तीळं” का क्या मतलब? मायर – तीन। कहानी पढ़ने के बाद सर ने पूछा – “सुर्की और तिर्की कैसी सहेलियाँ थीं? और तुम्हारे दोस्त कौन हैं? उनके साथ क्या करते हो?” सभी बच्चों ने अपने मित्रों के नाम बताए और कहा – “हम उनके साथ खेलते हैं।”
कक्षा में किताब पर होने वाली चर्चा के प्रमुख बिन्दु
इसके बाद बालशिक्षिका ने पुस्तक पर खुली चर्चा की।
ताई – सुर्की कैसी थी?
सिद्धी – आगावू थी।
शिवांश – चिड़चिड़ करती थी।
श्रीशा – सामान ठीक से नहीं रखती थी।
अन्वी – बैड गर्ल थी।
ताई – तिर्की कैसी थी?
शिवांजली – शांत।
अनिरुद्ध – नीटनेटकी।
ताई – सुर्की को किस बात पर गुस्सा आता था?
बच्चे – तिर्की हमेशा परी के साथ खेलती थी, सुर्की के साथ जोड़ी नहीं बनाती थी, इसलिए सुर्की को गुस्सा आता था।
आख़िर में बच्चों से पूछा गया – “सुर्की और तिर्की की गट्टी हुई क्या?”

- बालशिक्षिका ने बच्चों से पूछा कि कहानी में उन्हें क्या पसंद आया और क्या पसंद नहीं आया। इसके साथ ही साथ उसका चित्र बनाने तथा कहानी को अपने शब्दों में लिखने को कहा। बच्चों ने सुंदर चित्र बनाए और स्वलिपि में अपनी कहानी भी लिखी।
(लेखक परिचयः इस रोचक पुस्तक चर्चा को अपने शब्द दिए हैं निशिगंधा झेंडे और आसमा मणेर ने। आप दोनों वर्तमान में प्रगत शिक्षण संस्था, फलटण में मध्यम गट की बाल शिक्षिका के रूप में काम कर रही हैं।)
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