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मोरों का स्कूल..भाग-1

जंगल में एक मोर नाचा किसने देखा..किसने देखा। इस गीत की पंक्तियां अचानक याद आ गयीं, जब मैं राजस्थान के एक गांव में स्कूल से जुड़े अनुभवों पर फिर से नज़र दौड़ा रहा था। अचानक मेरे दिमाग में मोरों के स्कूल का एक आइडिया कौंधा। उस समय आसमान में काले बादल छा रहे थे , लेकिन मोरों के बोलने की आवाज़ नहीं आ रही थी। ऐसे में मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई। अरे क्या हुआ ? आज इतनी ख़ामोशी क्युं है मोरों की महफिल में ?

आमतौर पर आसमान में काले बादल छाने और बिजली कड़कने की आवाज सुनकर मोर बहुत खुश होते हैं। ऐसे में वे जोर-जोर से पीऊ-पीऊ की आवाज निकालते हैं। मैं भविष्य में बहुत आगे चला गया और सोचने लगा। अगर तीस-चालीस साल बाद युवा मोर बोलने और नाचने की प्रकृति प्रदत्त कला से वंचित हो जाते हैं। यह कला सिखाने के लिए मोर भी हमारे जैसी क्लास रूम पद्धति अपना लें तो कैसी तस्वीर हमारे सामने होगी.

मोरों का स्कूल खुलेगा। उनके अलग-अलग नाम होगा। मोरों के किसी स्कूल में चलने वाली कक्षा में छोटे-छोटे मोर के बच्चे बैठे होंगे । उनको कोई बड़ा मोर अपनी बोली में समझा रहा होगा कि बादल छाने और आसमान में बिजली कड़कने पर हमें नाचना चाहिए। पीऊ-पीऊ की आवाज निकालनी चाहिए। यही हमारा प्राकृतिक व्यवहार है।

इसके बाद वे बच्चों को डेमो दें कि मेरे पीछे बोलो… पीऊ-पीऊ। इसके बाद बच्चे एक साथ पीऊ-पीऊ बोलने का अभ्यास करें। अचानक बड़ा मोर उनको संबोधित करके कहे कि देखो तुम जिस तरीके से पीऊ-पीऊ बोल रहे हो वैसी आवाज़ तो हम शिकार के समय निकालते हैं। इसलिए उसमें सुधार की जरूरत है। फिर से सुनो बारिश के दौरान हम कैसी आवाज़ निकालते हैं और मोर के बच्चे अपने शिक्षक के पीछे-पीछे पीऊ-पीऊ की ख़ास आवाज़ दोहराने का अभ्यास करेंगे।

स्कूल में छुट्टी के बाद जब मोर के बच्चे घर वापस आकर बिना बादल के क्लास में सीखे गए गाने और नृत्य को जिज्ञासावश करें, तो बड़े मोर उनका मजाक उड़ाएंगे, “ये बच्चे मोरों के फलां स्कूल में जाकर नाचना, गाना और तरह-तरह की आवाज़ें निकालना सीख रहे हैं। हमारे जमाने में तो मोरों को इस फन में महारत हासिल थी। नई पीढ़ी को तो पुरानी चीज़ों के बारे में कुछ पता ही नहीं है।”

तो कोई बुजुर्ग मोर टिप्पणी करेगा, “अरे!! हमारे जमाने में तो सारे मोर अपने आप नाचना-गाना और तरह-तरह की आवाज़ें निकालना सीख लेते थे। आजकल तो मोरों में भी आदमी के बच्चों की तरह स्कूल में जाकर यह सब सीखने का नया फैशन चल पड़ा है।

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वृजेश सिंह
वृजेश सिंह
14 years ago

कल्पना को यर्थाथ से जोड़कर देखने का सेतु तलाश रहा हूं। ताकि अनुभवों को वर्तमान परिस्थियों में लागू करने का रास्ता निकल सके। आपके निरंतर प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

वृजेश सिंह
वृजेश सिंह
14 years ago

कल्पना को यर्थाथ से जोड़कर देखने का सेतु तलाश रहा हूं। ताकि अनुभवों को वर्तमान परिस्थियों में लागू करने का रास्ता निकल सके। आपके निरंतर प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

वृजेश सिंह
वृजेश सिंह
14 years ago

bahut-bahut shukriya sangeeta ji.

संगीता स्वरुप ( गीत )
14 years ago

:):) सुंदर कल्पना

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