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भविष्य के सपनों में रंग भरती कहानियां

एक स्कूल में कहानी की किताब इश्यू करवाते बच्चे
कई साल पहले की एक घटना याद आती है। जिसमें बच्चों ने मुझसे कहानी सुनाने को कहा, लेकिन मैं उनको कोई कहानी नहीं सुना पाया। उनसे एक वादा किया था कि मैं कहानी सुनाना जरूर सीखुंगा। वर्तमान में स्कूल में बच्चों के साथ संवाद और पुस्तकालय के प्रति उनका रुझान विकसित करने में कहानियों से काफी सहायता मिल रही है।
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आज स्कूल में वहां पढ़ाने वाली अध्यापिका के बच्चे मोहित से मेरा मिलना हुआ। उससे मेरी बात भी हुई। उसको मेरे बैग से एक किताब मिली। जिसका नाम फुलवारी है। सचमुच वह किताब फुलवारी सी है। उसने उससे कुछ कहानियां पढ़ीं। इसमें से आसामान गिरा कहानी भी शामिल थी। पांच साल के छोटे से बच्चे से मैनें पूछा कि खरगोश क्यों डरकर भाग रहा था तो उसने बताया कि सेब गिरा था। इसलिए डरकर भाग रहा था। आसमान न गिरने की बात भी उसे समझ में आ रही थी।
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आसमान के लिए उसने एक समानार्थी शब्द खोजने की कोशिश में बादल शब्द का जिक्र किया। जो उसके आसमान के ऊपर होने के विश्वास को बयां कर रहा था। एक बच्चा बड़ी एकाग्रता के साथ किताब में रमा हुआ था। कहानी को बोल-बोल कर पढ़ रहा था। उच्चारण गलत होने की स्थिति में शब्दों को दोहरा रहा था। सावधानी के साथ पढ़ते हुए, वह खेत की मेड़ पर चलने की कोशिश करने वाले बच्चे की तरह लग रहा था। ऐसा लग रहा था मानो संभलकर-संभलकर अपने पांव रखते हुए आगे बढ़ रहा हो।
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उसे ‘फुलवारी’ शीर्षक वाली किताब इतनी पसंद आई कि उसने मुझसे किताब ले जाने की बात कही। उसके विनम्र अनुरोध को तो मानना ही था। मैडम ने बताया कि उसे इस तरह की किताबें इकट्ठी करना और पढ़ना काफी पसंद है। आठवें घंटे में सारे बच्चे स्कूल के बाहर बैठे हुए थे। हमने मिलकर बालगीत किया। उसके बाद उनको एक कहानी सुनायी ताकि “स्कूल के रोचक समापन” पिछली पोस्ट में हुयी बात को सार्थक किया जा सके।
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छुट्टी के पहले सारे बच्चों से बात हो रही थी कि साढ़े चार बजने वाले हैं, घर नहीं जाना है क्या ? तो वे बोले कि कहानी सुनने के बाद हम पांच बजे घर जा सकते हैं। उनका उत्साह देखने लायक था। गुरु जी लोगों को घर जाने की फिक्र है। लेकिन बच्चे तो कहानी सुनने के लिए स्कूल के बाद भी रुकने को तैयार हैं। वे ऐसा कह रहे हैं, यह कहानी और कविताओं के प्रति उनके अपार प्रेम को अभिव्यक्ति दे रहा था। छुट्टी की घंटी के बाद वे सारे उत्साह से घर की ओर निकले।
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मोहित मेरे पास अपना झोला लेकर आया और उससे अपना रजिस्टर देते हुए बोला कि “आप इसमें मेरे लिए कहानी लिखकर लाइए।” मेरे लिए उसका ऐसा बोलना अपने जीवन में कहानी सुनाने के लिए मिलने वाली सबसे बड़ी तारीफ थी। उसका ऐसा बोलना मेरी किस्साग़ोई का अनुमोदन कर रहा था। उस पल मुझे लगा कि जैसे बच्चा कह रहा हो कि आप मेरे लिए कहानी लिख सकते हो। इसलिए आपको मेरे रजिस्टर में कहानी लिखकर लानी चाहिए। उसने मेरे ऊपर जो भरोसा जताया, वही भरोसा हमें बच्चों की क्षमता पर भी होना चाहिेए। बच्चों के लिए लिखने की एक वजह तो मिल गई है। बाकी देखते हैं…………जिंदगी का सफर कहां ले जाता है।
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