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प्राथमिक शिक्षा के उजाले और अंधेरे..

प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों की वास्तविक देखने के बाद लगा कि अंधेरा तो बहुत है। मगर रोशनी डालने वाला संवाद का अभाव है। कोई घोर आलोचना कर रहा है, तो कोई तारीफों के नीचे अंधेरों को दबाने की कोशिश कर रहा है। इस क्षेत्र में काम करने वाली तमाम संस्थाओं के अथक प्रयासों के बाद भी बिगड़ती स्थिति एक अलग कहानी कहती है। जिसको अगर एक मुहावरे में समेटें तो कहा जा सकता है कि “ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता गया।”
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जबसे शिक्षा का आधिकार कानून आया है, तब से तो नीम-हकीमों की बाढ़ सी आ गई है, शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए….। अगर लोगों के इरादों और मंशूबों पर कोई शक न किया जाय। तो ईलाज के तरीकों पर तो जरूर सवाल उठता है कि आखिर गड़बड़ कहां पर है ? हो सकता है कि हम तथाकथित मरीज को बिना मर्ज जानें, गलत दवा दे रहे हैं। या फिर घावों पर मरहम न लगाकर, ठीक हिस्से पर दवा रगड़ रहे हैं, दवाई लगाने के अंतराल, उसमें आए खर्चों और प्रभाव का आंकड़ा पेश करके “असर” दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन असली मकसद को छिपा रहे हैं कि प्रायवेटाइजेशन के ऐजेण्डे को बढ़ावा देना है, लाभ कमाना है , पैसे की प्रवाह इधर है, इसलिए हमारा भी ध्यान इधर है, या फिर कोई और विचार है ? जो हमारी पकड़ से बाहर है।
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जिन अध्यापकों से मेरी अब तक प्रत्यक्ष बात हुई है उनका साफ तौर पर कहना है कि नेता और सरकार नहीं चाहती कि शिक्षा का स्तर ऊपर उठे। स्तर उठाना तो दूर की बात है, हम तो स्कूल में समाज के असल मुद्दों की चर्चा तक नहीं कर सकते, यह सारी बातचीत हमारे बीच में तो हो सकती है, लेकिन बच्चों के बीच हम वास्तविक समाज के मुद्दों पर कोई बहस-परिचर्चा कराएंगे तो लोग हमारे खिलाफ हो जाएंगे। हमारा स्थानांतरण हो जाएगा। सच बोलने वाले को लिए तो स्पेश और भी कम है। वे इस बात को भी स्वीकारने से पीछे नहीं हटते कि उनके स्तर पर काफी कोशिंशें हो सकती हैं। लेकिन औपचारिकताओं की बाढ़ के कारण स्कूल “डेटा कलेक्शन एजेंसीं” में बदल गए हैं। शिक्षक को सरकार विश्वसनीय एजेंण्ट के तौर पर देखती है जो सही सर्वे करके ठीक-ठीक आंकड़े सरकार को मुहैया करवाएंगे।
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अगर शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कैलेण्डर देखें तो कायदे से उनको अपने कार्यदिवस का पचास फीसदी से ज्यादा समय फील्ड में देना चाहिए। लेकिन वे भी कागजी कार्यवाही में उलझे होने के कारण और अन्य व्यस्तताओं के कारण….अपनी संख्या कम होने के कारण पर्याप्त ध्यान स्कूलों पर नहीं दे पाते। केवल गंभीर शिकायत वाली स्थितियों पर ही वे त्वरित प्रतिक्रिया होती है। बाकी तो सब चलता रहता है। उनको भी पता है कि सोर्स-सिफारिश वालों पर तो अपना कोई जोर चलता नहीं। इसलिए बाकियों पर अपना चाबुक चलाकर काम चलाओ। सड़क के पास वाली स्कूल में बच्चे कम हैं, लेकिन शिक्षक ज्यादा हैं। वहीं अंदर की स्कूल में बच्चे ज्यादा हैं, लेकिन पढ़ाने के लिए शिक्षकों का अभाव है।
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शिक्षा के अधिकार कानून के तहत सरकार एक किलोमीटर के भीतर स्कूल खोलकर शिक्षा देने का अधिकार देता है।लेकिन अगर वहां पर शिक्षकों का टोटा है, तो जिम्मेदारी किसकी है ? उन स्कलों में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य की जवाबदारी कौन लेगा ? स्थानीय जनप्रतिनिधि और नेता स्थितियों के लिए स्थानीय लोगों को ही दोषी ठहराते हैं। और पढ़े लिखे लोग तो निरक्षर लोगों को जिम्मेदार बताकर अपनी जिम्मेदारी से क्यों पल्ला झाड़ लेते हैं? अगर इसके लिए लोग शिक्षकों को दोषी मानते हैं तो यह बात किस हद तक सही है ? वास्तविक रूप से जिम्मेदार लोग तो मुखौटों के पीछे से अपना खेल खेल रहे हैं। हमको जो सामने दिख रहा है। हम उसी को दोषी मानकर अपनी भड़ास निकालकर चलते बनते हैं कि ज्यादा जहमत कौन ले ? ऐसे व्यवहार से तो बदलाव की उम्मीद कम, यथास्थिति के बहाल रहने की उम्मीद ज्यादा जगती है।
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इसी बात की तकलीफ होती है।

Amrita Tanmay

यही तो हो रहा है..

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