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फ्लैशबैकः ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड से सीसीई तक का सफर

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैएक सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक बताते हैं कि उन्होंने 1979 जब पहली बार स्कूल ज्वाइन किया तो वह स्कूल एक पेड़ के नीचे चलता था। बड़ी मुश्किल से अनाज के बदले काम योजना के दौरान कमरे बने। उसे बाद उसमें दरवाज़े लगे। एक लंबी अवधि के बाद स्कूल भवन जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में आई। मगर शिक्षा देने का काम इससे पहले भी अस्तित्व में था।

उन्होंने बताया कि रिटायरमेंट के आख़िरी सौ दिनों से पहले वे अपने बीते दिनों को शिद्दत से याद कर रहे हैं। ढेर सारी छुट्टियां बची हैं, मगर घर पर बैठकर क्या करेंगे? उनको स्कूल के साथ-साथ विभिन्न प्रशिक्षणों में हिस्सा लेना अच्छा लगता है। उनके स्कूल में सुबह की असेंबली बहुत अच्छे से होती है। वे कोशिश करते हैं कि सारे स्टाफ को साथ लेकर चलें।

बच्चों को किताबें मिलनी चाहिए

सरकारी स्कूलों में पहली-दूसरी कक्षा की उपेक्षा के सवाल पर उन्होंने कहा, “ऐसा होना ग़लत है। ऐसा नहीं होना चाहिए। मगर ऐसा होता है। उन्होंने कहा कि लायब्रेरी की किताबेें बच्चों की हैं। वे इसे फाड़ दें। उसको रंग दें। उसे घर पर रख लें। कोई बात नहीं। मगर उनको किताबें मिलनी चाहिए। किताबों को चूहे कुतरें, उससे बेहतर है कि वे बच्चों के हाथों से फटें। उनके इस्तेमाल के दौरान उनका रंगे उड़े।”

उन्होंने बताया, “दसवीं-बारहवीं में बोर्ड परीक्षाओं के कारण विशेष ध्यान दिया जाता है। पर पहली-दूसरी में बच्चा अगर पढ़ना-लिखना नहीं सीख पाता तो उसके लिए प्राथमिक शिक्षा बेमानी हो जाती है। उसके लिए दसवीं-बारहवीं बोर्ड की परीक्षाएं भी बेमानी हो जाती हैं, क्योंकि पढ़ना-लिखना न जानने वाला बच्चा तो वहां तक पहुंच ही नहीं पाएगा। ऐसे में सबसे जरूरी बात है कि छोटे बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने की राह में आने वाले मुश्किलों को आसान करें। इसके लिए हमें जो भी संभव हो जरूर करना चाहिए।”

वे आगे कहते हैं, “इसी सिलसिले में किताबों के साथ बच्चों का रिश्ता जोड़ना भी बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है। मगर हम मान लेते हैं कि पहली-दूसरी क्लास के बच्चे क्या किताब पढ़ेंगे। हम शायद भूल जाते हैं कि अपनी ज़िंदगी में पहली बार किताबों से रिश्ता जोड़ रहे हैं, ऐसे में एक सकारात्मक और प्रोत्साहित करने वाला माहौल देने की जिम्मेदारी हमारी ही है।”

सफलता शिक्षकों पर निर्भर

अपने बीते दिनों की यात्रा को याद करते हुए कहते हैं, “35 सालों के लंबे सफ़र में तमाम योजनाओं के आने और इतिहास बन जाने की कहानी से रूबरू होने का मौका मिला। इसमें ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड का नाम भी शामिल है और जाते-जाते मूल्यांकन की एक नई पद्धति सीसीई से भी रूबरू हो रहा हूँ।”

सबसे सफल योजना के सवाल पर वे बताते हैं, “कोई भी योजना सफल हो सकती है, बशर्ते कि शिक्षक उसे मन से लागू करना चाहें। शिक्षक बनने के पहले जो तैयारी करने का जुनून और जज्बा होता व व्यवस्था का हिस्सा बनने के बाद कहीं खो सा जाता है। क्योंकि वे अपने आसपास देखते हैं कि काम न करने वाले और काम करने वाले व्यक्ति के वेतन और प्रमोशन जैसी सुविधाओं में कोई अंतर नहीं है। ऐसे में शिक्षक काम करने की बजाय उदासीनता वाली प्रवृत्ति के शिकार होते चले जाते हैं। वे बस उतना ही काम करते हैं कि काम चल जाये।”

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