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‘ब्रेन बेस्ड लर्निंग’ को स्कूल में कैसे लागू करें?

भाषाओं का आपसी रिश्ता

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‘ब्रेन बेस्ड लर्निंग’ की रणनीतियों को स्कूल की परिस्थिति के अनुसार लागू किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर पहली पोस्ट में खेल व अन्य शारीरिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की बात कही गयी थी। क्योंकि इससे हमारे दिमाग में नये न्युरॉन के बनने में मदद मिलती है, जो याददाश्त के साथ-साथ ध्यान केंद्रित करने और सीखने के लिहाज से काफी उपयोगी होता है।

इस पोस्ट में हम ‘ब्रेन बेस्ड लर्निंग’ की अन्य रणनीतियों को समझते हुए स्कूल में उसका इस्तेमाल कैसे करें, इस पहलू से रूबरू होंगे।

सामाजिक अनुभवों का महत्व

सामाजिक स्थितियां हमारे मस्तिष्क को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करती हैं। इंसानी दिमाग पर होने वाले शोधों में यह बात सामने आई है। स्कूल में बच्चों को होने वाले अनुभव एक गहन सामाजिक अनुभव हैं, जो बच्चों के मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर स्कूल में बच्चों को मिलने वाले पुरस्कार, शिक्षक से अच्छे काम के लिए मिलने वाला अनुमोदन। किसी तरह की परेशानी या आनंद इत्यादि ऐसे ही अनुभव हैं।

स्कूल की परिस्थितियों व क्लास में सामंजस्य बैठाना और बाकी साथियों के साथ दोस्ती वाला रिश्ता विकसित करना भी एक सामाजिक अनुभव ही है। जो उनके भावी जीवन में काम आता है। इस समझ का इस्तेमाल स्कूल में करने के नजरिये से विशेषज्ञों की राय है, “स्कूल में एक दिन के कुल समय के 10-20 फीसदी से ज्यादा समय तक मनचाहे ढंग से सामाजिक समूह बनाने की अनुमति न दें।”

किसी ख़ास लक्ष्य के साथ सुनियोजित व विविधता आधारित समूहों के निर्माण को प्रोत्साहित करें। स्कूल में अनुकूल वातावरण को बेहतर बनाने के लिए काम करें। शिक्षक का बच्चों के साथ रिश्ता तो मायने रखता ही है। इसके साथ-साथ छात्रों का बाकी छात्रों के साथ रिश्ता भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही शिक्षकों का अन्य साथी शिक्षकों के साथ अच्छा रिश्ता हो। सब एक टीम की तरह काम करें। इस पहलू से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रधानाध्यापक की तरफ से मिलने वाला अच्छा नेतृत्व पूरे स्कूल को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने में मदद कर सकता है।

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