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शिक्षा विमर्शः शिक्षकों के लिए बने मजबूत ‘सपोर्ट सिस्टम’

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सेमीनार के एक सत्र के दौरान अपना पर्चा पढ़ते हुए प्रतिभागी।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय और अम्बेडकर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित सेमीनार ‘शिक्षा के सरोकार- भाग 1’ में शिक्षक की छवि, शिक्षक की भूमिका, शिक्षक की प्रेरणा, शिक्षक व बच्चे के बीच रिश्ते, शिक्षा के बारे में अभिभावकों के विचार और स्थानीय भाषा में शिक्षा से जुड़े मुद्दों चिंतन व लेखन का मुद्दा चर्चा में रहा।

क्लासरूम में जुड़े मुद्दों पर हो संवाद

पहले सत्र में एक शोधकर्ता ने कहा, “स्कूल में कक्षा से संबंधित कोई बात होती ही नहीं है। शिक्षक क्लासरूम में काम करते समय किस तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे है कोई पूछता नहीं। क्लासरूम से जुड़ी समस्याओं को शिक्षक के व्यक्तिगत मसले की तरह देखा जाता है। ऐसी स्थिति में कोई शिक्षक कैसे अपनी बात साझा कर पाएगा।”

वे निजी स्कूलों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन स्कूलों में शिक्षकों के बीच आपसी सहयोग (कोलैबोरेशन) और समूह में काम करने के लिए ज्यादा अनुकूल माहौल होता है। जिसकी कमी सरकारी स्कूलों में खलती है। इस परिस्थिति को बदलने का प्रयास होना चाहिए ताकि शिक्षकों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम बनाया जा सके। जिसमें शिक्षक क्लासरूम से जुड़ी चुनौतियों पर सामूहिक रूप से विचार-विमर्श कर सकें और एक-दूसरे को समाधान की दिशा में सोचने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद कर सकें।

एकल शिक्षक के सामने बच्चों को चुप कराकर बैठाने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचता। ऐसे माहौल में ही शांत कराकर बैठने की संस्कृति पनपती है। ऐसी स्थिति में बदलाव के लिए जरूरी है कि एक शिक्षक को स्वायत्ता मिले और संसाधनों की जरूरतों को पूरा करने वाली प्रक्रिया में लचीलापन आए ताकि जरूरतों को पूरा होने के लिए सत्र खत्म होने और नए सत्र शुरू होने की राह देखने की जरूरत न पड़े।

समकालीन शैक्षिक परिदृश्य में अध्यापक की भूमिका

seminar-audइसके बाद अपना पर्चा पढ़ते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधकर्ता सोनिका चौहान ने अपनी बात रखते हुए कहा, “वर्तमान समय में एक शिक्षक पढ़ाने के अतिरिक्त बहुतेरे काम करते हैं। क्लासरूम में वे किसी पटकथा को जीवंत करने की कोशिश करते किरदार सरीखे नज़र आते हैं।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहती हैं, “निजी स्कूलों में इस तरह के स्क्रिप्टेड मैटेरियल के उपयोग को बढ़ावा देने वाली संस्थाएं कहती हैं कि ये आपको प्रभावशाली, सशक्त व निपुण शिक्षक बनाने में मदद करेंगी। मगर इस तरह की सामग्री के कारण शिक्षक की आज़ादी छिन जाती है क्योंकि क्लास में क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है, दोनों चीज़ें कोई और तय कर रहा होता है। ऐसे प्रयासों से लगता है कि शिक्षा का एकरूपीकरण हो रहा है और एक जैसे इनपुट से एक जैसा परिणाम हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसी स्थिति बच्चों की वैयक्तित विभिन्नता और अलग-अलग तरीके से सीखने वाली बात को खारिज करती है।”

उपरोक्त परिस्थितियां शिक्षक की स्थिति को दयनीय बना रही हैं और एक स्वतंत्र समझ रखने वाले शिक्षक को महज टेक्नीशियनव में बदला जा रहा है। इसके कारण अध्यापक और छात्रों के बीच बनने वाले परस्पर संबंध धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं और शिक्षण का मानवीय परिप्रेक्ष्य छिन जाता है। इसकी बहाली के जरूरी है कि एक शिक्षक को काम करने की पूरी आज़ादी मिले।

(एजुकेशन मिरर की इस पोस्ट से गुजरने के लिए आपका शुक्रिया। अब आपकी बारी है, आप इस लेख के बारे में दूसरों के साथ क्या साझा करना चाहेंगे, लिखिए अपनी राय कमेंट बॉक्स में अपने नाम के साथ। शिक्षा से जुड़े कोई अन्य सवाल, सुझाव या लेख आपके पास हों तो जरूर साझा करें। हम उनको एजुकेशन मिरर पर प्रकाशित करेंगे ताकि अन्य शिक्षक साथी भी इससे लाभान्वित हो सकें।)

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