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पढ़ने की ख़ुशी कहाँ खो गई?

भाषा का कालांशपढ़ने का ख़ुशी के साथ गहरा रिश्ता है। पढ़ना हमें अपने विचारों को व्यवस्थित करने। किसी मुद्दे पर व्यवस्थित ढंग से सोचने। अपने पुराने अनुभवों को फिर से याद करने। नए शोधों व विचारों से उनको पुख्ता करने। पहले से स्थापित मान्यताओं में बदलाव करने का अवसर हमें पढ़ने से मिलता है।

मगर यह तभी संभव है जब हम बग़ैर किसी दबाव के अपनी मर्जी से पढ़ रहे हों। हमारे हाथों में अपने पसंद की कोई किताब हो। उस किताब को पढ़ने का कोई साफ़-साफ़ उद्देश्य हमारे मन में हो।

परीक्षा और पढ़ाई

प्रतियोगी परीक्षाओं और पढ़ाई के दौरान होने वाली परीक्षाओं के कारण पढ़ने का सीधा-सीधा रिश्ता पाठ्यपुस्तकों और गाइडबुक्स के साथ जुड़ गया है। जबकि पढ़ने का क्षेत्र काफी व्यापक है। पढ़ने का मतलब किसी लिखित (या छपी हुई) सामग्री को समझ के साथ पढ़ना है।

उस लिखित सामग्री में कौन सी बात सबसे ग़ौर करने लायक है। कौन सी बात भरोसा करने योग्य हैं। कौन सी बात चौंकाने वाली है। कौन सी बात हमारे आसपास के परिवेश से जुड़ी है। कौन सी बातें हमारे मन के मनोविज्ञान से जुड़ी हैं, ऐसी तमाम चीज़ों की समझ हमें पढ़ने के दौरान होती है।

पढ़ने के दौरान क्या होता है?

हम पढ़ने के दौरान तमाम चीज़ों के बीच संबंध स्थापित करते हैं। उनके बीच के रिश्ते को समझ पाते हैं। वे कैसे बदल रहे हैं, इस बात को देख पाते हैं। मगर आज के दौर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का जमाना है। ऐसे में हमारा पढ़ना काफी कम हुआ है। बच्चों के लिए भी कहानी की किताबों के समानांतर कार्टून के विभिन्न चैनलों का विकल्प खुला है। बच्चों को कहानी सुनाने के लिए पैरेंट्स के पास वक्त का अभाव है। ऐसे में किताबों के साथ बच्चों का वह रिश्ता विकसित नहीं हो पाता, जो उन्हें किताबों के साथ पढ़ने की ख़ुशी वाले अहसास के साथ जोड़े। ताकि किताब उनके लिए सिर्फ परीक्षाओं में अच्छा नंबर लाने का जरिया भर न रहे।

रीडिंग रिसर्च की दुनिया

इन्ही सारे सवालों की पड़ताल रीडिंग रिसर्च की विधा में होती है। क्लासरूम के बाद बच्चे किताब क्यों नहीं पढ़ता चाहते? वर्तमान में हम शायद बच्चों को किताबों के साथ ख़ुशी वाला रिश्ता विकसित करने का मौका नहीं दे पा रहे हैं। होगा। बच्चों को स्वतंत्र रूप से पढ़ने का मौका देकर हम उनको पढ़ने की खोई हुई ख़ुशी को फिर से ढूंढने में मदद कर सकते हैं।

रीडिंग रिसर्च की दुनिया बेहद रोचक है। पढ़ने के दौरान हम कौन-कौन सी चीज़ें कर रहे होते हैं। कहाँ पढ़ने के दौरान मायने पकड़ में आते हैं, कहां चूक जाते हैं। पढ़ने के दौरान समझने का सिलसिला भी साथ-साथ चलता रहे, इसके लिए समझने की कौन-कौन सी रणनीतियां काम में ली जाएं।

अच्छे पाठक पढ़ते समय खुद को ग़ौर से देख पाते हैं कि वे कौन सी बात समझ रहे हैं, कहाँ पर उनको समझने में दिक्कत हो रही है। कहाँ वे चीज़ों को अपने सदर्भ से जोड़ पा रहे हैं, ये सारी बातें बच्चों को समझ के साथ पढ़ने में मदद करती हैं। समझ के साथ पढ़ने के दौरान अर्थ ग्रहण करने की ख़ुशी भी बच्चों के चेहरे पर साफृ-साफ़ दिखाई देती है, जब वे पढ़ने के दौरान हैरान होते हैं, हंसते हैं और अपने दोस्तों को किताब का वह हिस्सा पढ़ने या किसी चित्र को देखने के लिए कहते हैं।

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