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गर्मी की छुट्टियों से पहले ‘चहक’ रहे हैं स्कूल

education mirror, primary education in indiaपरीक्षाओं के बाद स्कूलों का माहौल बदला-बदला सा नज़र आ रहा है। शिक्षक और बच्चों के रिश्तों में जो तनाव आमतौर पर दिखाई देता है, उसमें काफी शिथिलता आ गई है। शिक्षक पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य कामों और कागजी कार्रवाई को पूरा करने में लगें हैं। नये सत्र से रजिस्टर तैयार कर रहे हैं। नये बच्चों के एडमीशन की तैयारी कर रहे हैं।

मस्ती की पाठशाला

वहीं बच्चे स्कूल में खेलने का भरपूर आनंद ले रहे हैं। क्लासरूम में बच्चे बैठकर कैरम खेल रहे हैं। किताबें पढ़ रहे हैं। आपस में बात कर रहे हैं। स्कूल परिसर में घूम रहे हैं। बार-बार पानी पीने के लिए जा रहे हैं। थोड़ा-बहुत शोर भी मचा रहे हैं, मगर इस शोर की आवाज़ परीक्षाओं के पहले होने वाले शोर से थोड़ा अलग है।
क्लासरूम की तरफ से आने वाली यह आवाज़ कर्कश न होकर काफी मधुर है। इस कर्कशता को शब्द देने के लिए मुझे उदयपुर के चिड़ियाघर में क़ैद तोतों की स्मृत्ति आती है। जो अपने बड़े से पिजड़े में हरी मिर्ची, टमाटर, आम और अमरूद जैसे फलों से घिरे होने के बावजूद कर्कश सी आवाज़ में कुछ कह रहे थे।

ध्यान रहे, बच्चे बोर न हों

शायद उसी तरह की घुटन क्लास में लंबे समय तक बैठने के बाद बच्चों को भी महसूस होती है। इसीलिए छोटा-छोटा ब्रेक लेने और कोई ऐसी गतिविधि करने की बात होती है ताकि बच्चे फिर से अपनी लय में लौट सकें। सीखने-समझने वाली मनःस्थिति में लौट सकें। अगर किसी-किसी क्लास में भी ऐसा होता है तो उसका असर बच्चों के सीखने पर साफ़-साफ़ दिखाई देता है।
ख़ासतौर पर भाषा की कक्षा में किसी कविता या पंक्ति को बार-बार पूरे उत्साह के साथ दोहराने से जो आनंद बच्चों को मिलता है, उसका जवाब नहीं है। क्लासरूम में अपने शिक्षक के होने पर वे वही पंक्तियां फिर से दोहराते हैं। ऐसा लगता है मानो वे अपनी शब्दावली में वन्स मोर, वन्स मोर…..कह रहे हों। बच्चों की तरफ से आने वाली ऐसी प्रतिक्रियाओं को संवेदनशील शिक्षक समझते हैं।

बच्चे लें अपने सीखने की जिम्मेदारी

वे लंबी और बोझिल कक्षाओं के बाद कहते हैं कि कक्षाओं का समय एक निर्धारित सीमा से ज्यादा नहीं होना चाहिए। बच्चे परेशान हो जाते हैं। आजकल बच्चों को जैसी आज़ादी मयस्सर है। अगर रोज़ाना ऐसा ही हो और क्लास में बच्चों के बैठने की बाध्यता न हो तो बच्चे किसी भी बोर करने वाले कालांश में एक मिनट नहीं रुकेंगे। जैसे ही उनको लगेगा कि वे परेशान हो रहे हैं। वे तुरंत बाहर आ जायेंगे।
किसी स्कूल के संदर्भ में इस विचार को लागू करना बच्चों को सीखने वाली जिम्मेदारी से लैस करना होगा। शिक्षक को बच्चों को पढ़ाने के लिए पहले से तैयारी करने के लिए मौका देना होगा। शिक्षक और बच्चों के रिश्तों को नये सिरे से परिभाषित करना होगा। शिक्षा में बेहतरी की उम्मीद के लिए ऐसी कोशिशों का जारी रहना बहुत जरूरी है, चाहें वे बड़े स्तर पर हो रही हों या फिर बहुत छोटे (माइक्रो) स्तर पर।
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