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कितना फायदेमंद है ‘अंग्रेजी मीडियम’?

बच्चे की भाषा में हो पढ़ाई, मीडियम और मैसेज की लड़ाई, भारत में प्राथमिक शिक्षाकिसी विषय को पढ़ने-पढ़ाने का तरीका ज्यादा मायने रखता है या फिर वह विषय किस माध्यम (मीडियम) में पढ़ाया जा रहा है यह बात ज्यादा महत्व की है? अगर पॉपुलर आइडिया की बात करें तो लोगों का रुझान मीडियम की तरफ ज्यादा है। क्योंकि उनको लगता है कि अंग्रेजी भाषा में हिंदी, राजस्थानी, मराठी या किसी अन्य प्रदेश की भाषा से रोजगार के ज्यादा अवसर हैं। या रोजगार पाने के लिए अंग्रेजी तो आनी ही चाहिए।

शहरों की यह महत्वाकांक्षा गाँवों में भी दस्तक दे चुकी है, इसकी कीमत गाँव के बच्चे चुका रहे हैं। जो अंग्रेजी की किताबों के सामने लालटेन या लैंप की रौशनी में बैठकर सिर धुनते हैं कि इस सवाल का मतलब क्या है? फलां सवाल का जवाब किसी पैराग्राफ में मिलेगा?

यह स्थिति इसलिए बन रही है क्योंकि अब गाँव में लोग अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। यह तमाम बातें जानते हुए भी कि वहां ढंग के शिक्षक नहीं है। ऐसे स्कूलों की फीस ज्यादा है। बच्चे के लिए उन विषयों को अंग्रेजी भाषा में समझ पाना काफी मुश्किल होता है क्योंकि उनके घर की भाषा हिंदी है।

मीडियम का सवाल

बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की महत्वाकांक्षा के कारण अभिभावकों का झुकाव इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई वाली निजी स्कूलों की तरफ हो रहा है। क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम और पढ़ाई का स्तर दोनों लोगों की बढ़ती अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। इसका ऐसा असर है कि  जिन घरों में ऐसी किताबों को समझने-समझाने वाला कोई नहीं है वहां पर भी बच्चों का प्रवेश इंग्लिश मीडियम वाली कक्षाओं में करवाया जा रहा है, जबकि उस स्कूल में हिंदी मीडियम का विकल्प भी उपलब्ध है।

माध्यम को ज्ञान समझ लेने वाली इस भ्रांति के कारण देश की राजधानी नई दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान समेत कई राज्यों में ऐसी दुविधा की स्थिति अभिभावकों के सामने है। मीडियम का फैसला पूरी तरह से मार्केट के प्रचार और लोगों की राय पर आधारित होता है। अभिभावक कहते हैं, “बच्चा पढ़ते-पढ़ते ही तो सीखेगा।”

जबकि स्कूल के शिक्षक कहते हैं, “हमारे पास सोशल साइंस की पूरी किताब को समझाने का समय क्लास में नहीं होता, इसलिए हम मुख्य हिस्से पर चर्चा करके सवालों के जवाब लिखवाने के ऊपर विशेष ध्यान देते हैं।” ऐसी स्थिति में उन बच्चों की क्या समझ बनेगी जो अंग्रेजी पढ़ना-लिखना सीखने के मामले में बहुत शुरुआती स्तर पर हैं, जबकि उनके विषय की किताब उनसे एडवांस स्तर की मांग करती है। ऐसे में बच्चे का आत्मविश्वास कमज़ोर होता है। उसे लगता है कि वही पढ़ने के मामले में कमज़ोर है, इसलिए उस विषय को नहीं समझ पा रहा है।

समझना है महत्वपूर्ण

इससे जुड़ा एक उदाहरण लेते हैं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक स्कूल में पढ़ने वाला स्टूडेंट गणित के किसी सवाल में उलझा हुआ था। बच्चे के अभिभावक ने अपनी यह परेशानी अपने एक रिलेटिव के सामने रखी जो उनके घर आए हुए थे। बातचीत के बाद पता चला कि बच्चा उस सवाल को समझ नहीं पा रहा था, अगर वही सवाल हिंदी में होता तो उसने उसे आसानी से हल कर दिया होता।

एक शब्द था जिसकी मीनिंग उसे नहीं आती थी। अंग्रेजी भाषा सीखने और उसे बेहतर बनाने में शब्दकोश का बड़ा महत्व है, मगर बहुत से घरों में नियमित रूप से डिक्शनरी इस्तेमाल करने की संस्कृति नहीं है। बहुत से घरों में तो अंग्रेजी-हिंदी की डिक्शनरी भी नहीं है और बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ने के लिए जा रहे हैं।

समाधान का रास्ता क्या है ?

इस मामले में एक स्कूल की प्रिंसिपल कहती हैं, “मैंने तो अपने अनुभव से यही जाना है कि बच्चों को हिंदी मीडियम में पढ़ाना चाहिए। इससे बच्चे को हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का भी ज्ञान हो जाता है। अंग्रेजी मीडियम में पढ़ने वाले बच्चे तो हिंदी के बहुत सारे सामान्य शब्दों के भी अर्थ नहीं जानते। अंग्रेजी के ऊपर ध्यान देने के लिए बच्चे को अतिरिक्त तैयारी में मदद दी जा सकती है ताकि इस भाषा पर उसकी पकड़ बन सके।”

पूरे विमर्श का सार यही है कि बच्चे की पढ़ाई ऐसी भाषा में हो जिसे बच्चा समझता हो। अगर बच्चे की पढ़ाई ऐसी भाषा में हो रही है, जिसमें वह अटक-अटक कर पढ़ रहा है। किसी पाठ को बग़ैर समझे पढ़ रहा है तो जाहिर सी बात है कि वह उस विषय से जुड़ा ज्ञान अर्जित नहीं कर पाएगा। हो सकता है कि वह तथ्यों को रट ले, मगर जब समझ के साथ किसी सवाल का जवाब देने की बात आएगी तो वह बच्चा पीछे रह जाएगा। अंग्रेजी या हिंदी मीडियम का चुनाव भी इसी आधार पर होना चाहिए ताकि वह बच्चे के लिए फायदेमंद हो।

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Amarjeet Singh

जब तक उच्च शिक्षा में पढाई लिखाई का माध्यम भारतीय भाषाएँ नही बनेंगी तब तक भारत में यह पाखंड जारी रहेगा !!

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