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‘तोत्तो-चान’ के स्कूल का माहौल कैसा था?

तितली की तस्वीर, पाबुला, तितली को गरासिया भाषा में पाबुला कहते हैं।इस पोस्ट में पढ़िए ‘तोत्तो-चान’ किताब पर नितेश वर्मा की विस्तृत टिप्पणी का दूसरा हिस्सा। पहले हिस्से में आपने ‘तोत्तो-चान’ की कहानी शीर्षक में इस स्कूल के शिक्षा दर्शन और शिक्षा की प्रणाली के बारे में पढ़ा। इस पोस्ट में पढ़िए कैसा था तोत्तो चान के इस स्कूल का माहौल।

तोमोए स्कूल के दृश्यों की कल्पना करें। बच्चों की स्कूल पहुँचने की उतावली। मन में हर रोज आने वाले अचरजों और नई खुशियों की आतुरता। रेल के डिब्बे में चलती कक्षाएँ और पुस्तकालय। सभागार में फर्श पर बैठे हँसते हुए हेडमास्टर जी के गले लिपटते, कंधों या पीठ पर लदे बच्चे। तोमोए छोड़कर जाते किसी बच्चे का दहाड़ें मारकर रोना, हताशा के आवेश में हेडमास्टर जी के पीठ पर मुक्के बरसाना और रोने से लाल हो चुकीं हेडमास्टर जी की आँखें।

खेलने-कूदने और कपड़े गंदे करने की आजादी। यहां हेडमास्टर जी बच्चों के माता-पिता से बच्चों को स्कूल में सबसे खराब कपड़े पहना कर भेजने को कहते। तरण-ताल में बच्चों को निपट निर्वस्त्र तैरने देना ताकि लड़के-लड़कियों में एक-दूसरे के शारीरिक अंतरों को लेकर किसी तरह की कुत्सित उत्कंठा न रहे। ताकि बच्चे अपने शरीर की कुरूपता या विकलांगता से जुड़ी मन की कुंठाएँ भूल सकें। बच्चों को भी इसमें आनंद आता।

प्रकृति की लय-ताल को तलाशते, सैर-सपाटे करते बच्चे। खेल-खेल में ही बच्चे विज्ञान और इतिहास से रूबरू हो जाते थे। कभी जहाज से गर्म सोते तक की यात्रा, तो कभी स्कूल में तंबू गाड़कर कैंपिंग, कभी जंगल में रसोई, तो कभी भूतों से सामना का खेल और बहादुरी की परीक्षा। रात तंबू में हेडमास्टर जी का देश-विदेश की यात्राओं, वहाँ के बच्चों के बारे में बताना।

‘तोमोए स्कूल बढ़िया है’

खेल दिवस और हेडमास्टर जी के ईजाद किए अलग-अलग खेल। लेखिका के अनुसार खेल दिवस में हेडमास्टर जी ने शायद जानबूझकर ऐसी दौड़ आयोजित की थी कि ताकाहाशी ही प्रथम आए ताकि उसे उस दिन का गर्व और प्रसन्नता याद रहे और बौने होने की हीन-भावना उसमें पनप ही न पाए। इनाम में बच्चों को सब्जियाँ मिली थीं। टिफिन से पहले ‘चबाओ, चबाओ, ठीक से चबाओ’ गीत।

totto-chanखासकर बच्चों का बनाया गीत ‘तोमोए स्कूल बढ़िया है, अंदर से भी, बाहर से भी बढ़िया है‘। संगीत कक्षा में सभागार के फर्श पर चाक से स्वरलिपि लिखना, चित्र बनाना। लिखने के लिए हर बच्चे के पास खूब-खूब जगह, फिर मेहनत से फर्श साफ करना। हेडमास्टर जी का बच्चों को इस्सा कोबायाशी के रचे हाइकू सुनाना। बच्चे प्रकृति और जीवन के बारे में अपने विचार इसी माध्यम से व्यक्त करते। बच्चे भी हाइकू रचते।

एक किसान का बच्चों के लिए खेती-बाड़ी का शिक्षक बनना। हेडमास्टर जी इसके लिए कागजी शैक्षणिक योग्यता को जरूरी नहीं मानते थे। बच्चों का बीज बोना और उससे पौधे को पनपते देखना। सब कुछ बच्चों के लिए अनूठे आनंद के अनुभव थे। हेडमास्टर जी का मानना था कि तोमोए का हर बच्चा प्रतिभाशाली शिक्षक बन सकता है, क्योंकि ये बच्चे अपना बचपन हमेशा याद रखने वाले थे।

लेखक परिचयः इस पोस्ट के लेखक नितेश वर्मा पूर्व पत्रकार हैं और वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्यरत हैं।

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