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शिक्षा का लक्ष्यः क्या कहता है एनसीएफ-2005?

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैभारत में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ) का निर्माण करने की जिम्मेदारी एनसीईआरटी की है। यह संस्था समय-समय पर इसकी समीक्षा भी करती है। एनसीएफ-2005 के बनने का कार्य एनसीईआरटी के तत्कालीन निदेशक प्रो. कृष्ण कुमार के नेतृत्व में संपन्न हुआ।

इसमें शिक्षा को बाल केंद्रित बनाने, रटंत प्रणाली से निजात पाने, परीक्षा में सुधार करने और जेंडर, जाति, धर्म आदि आधारों पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने की बात कही गई है। शोध आधारित दस्तावेज़ तैयार करने के लिए 21 राष्ट्रीय फोकस समूह बने जो विभिन्न विषयों पर केंद्रित थे। इसके नेतृत्व की जिम्मेदारी संबंधित क्षेत्र के विषय विशेषज्ञों को दी गई।

शिक्षा के लक्ष्य

1.एनसीएफ-2005 के अनुसार शिक्षा का लक्ष्य किसी बच्चे के स्कूली जीवन को उसके घर, आस-पड़ोस के जीवन से जोड़ना है। इसके लिए बच्चों को स्कूल में अपने वाह्य अनुभवों के बारे में बात करने का मौका देना चाहिए। उसे सुना जाना चाहिए। ताकि बच्चे को लगे कि शिक्षक उसकी बात को तवज्जो दे रहे हैं।

2. शिक्षा का दूसरा प्रमुख लक्ष्य है आत्म-ज्ञान (Self-Knowledge)। यानि शिक्षा खुद को खोजने, खुद की सच्चाई को जानने की एक निरंतर प्रक्रिया बने। इसके लिए बच्चों को विभिन्न तरह के अनुभवों का अवसर देकर इस प्रक्रिया को सुगम बनाने की बात एनसीएफ में कही गई है।

3. शिक्षा के तीसरे लक्ष्य के रूप में साध्य और साधन दोनों के सही होने वाले मुद्दे पर चर्चा की गई है। इसमें कहा गया कि मूल्य शिक्षा अलग से न होकर पूरी शिक्षा की पूरी प्रक्रिया में शामिल होनी चाहिए। तभी हम बच्चों के सामने सही उदाहरण पेश कर पाएंगे।

4. सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने और जीवन जीने के अन्य तरीकों के प्रति भी सम्मान का भाव विकसित करने की बात करता है।

5. वैयक्तिक अंतर के महत्व को स्वीकार करने की बात करता है। इसमें कहा गया है कि हर बच्चे की अपनी क्षमताएं और कौशल होते हैं। इसे स्कूल में व्यक्त करने का मौका देना चाहिए जैसे संगीत, कला, नाट्य, चित्रकला, साहित्य (किस्से कहानियां कहना), नृत्य एवं प्रकृति के प्रति अनुराग इत्यादि।

6. ज्ञान के वस्तुनिष्ठ तरीके के साथ-साथ साहित्यिक एवं कलात्मक रचनात्मकता को भी मनुष्य के ज्ञानात्मक उपक्रम का एक हिस्सा माना गया है। यहां पर तर्क (वैज्ञानिक अन्वेषण) के साथ-साथ भावना (साहित्य) वाले पहलू को भी महत्व देने की बात कही गई है।

7. इसमें कहा गया है, “शिक्षा को मुक्त करने वाली प्रक्रिया (Liberating process) के रूप में देखा जाना चाहिए अन्यथा अबतक जो कुछ भी कहा गया है वह अर्थहीन हो जाएगा। शिक्षा की प्रक्रिया को सभी तरह के शोषण और अन्याय  गरीबी, लिंग भेद, जाति तथा सांप्रदायिक झुकाव) से मुक्त होना पड़ेगा जो हमारे बच्चों को इस प्रक्रिया से वंचित करते हैं।

8. आठवीं बिंदु स्कूल में पढ़ने-पढ़ाने के काम के लिए अच्छा माहौल बनाने की बात करता है। साथ ही ऐसा माहौल बनाने में बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने की भी बात करता है। यानि शिक्षक खुद आगे न आकर बच्चों को नेतृत्व करने का मौका दें।

9. नौवां बिंदु अपने देश के ऊपर गर्व की भावना विकसित करने की बात करता है। ताकि बच्चे देश से हरा जुड़ाव महसूस कर सकें। इसके साथ ही कहा गया है, “बच्चों में अपने राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना संपूर्ण मानवता की महान उपलब्धियों के प्रति गौरव को पीछे न कर दे।”

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12 Comments on शिक्षा का लक्ष्यः क्या कहता है एनसीएफ-2005?

  1. Mukesh nagar // October 11, 2017 at 3:53 pm //

    Nice matter of ncf 2005
    Thanks

  2. Mughe notes bhegiye

  3. समावेशी शिक्षा के सन्द्रभ में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005
    कृपया इस विषय में कोई मुझे अधिक् जानकारी उपलब्ध करवा सकता है
    हिंदी में

  4. sir please send your email

  5. नमस्कार विनय जी, आपने बड़े विश्लेषण के साथ अपनी बात लिखी है। पढ़कर मन को खुशी हुई। इस बात को व्यवस्थित ढंग से अपने गाँव की तस्वीर के साथ भेज दीजिए। इसे एजुकेशन मिरर पर आपके नाम और परिचय के साथ प्रकाशित करते हैं।

  6. Badey bhaiya ka yathochit abhivadan bhai sahab jaisa ki RTE me sabhi ko saman gudvattapooorn shiksha dilaya jana ullikhit hai toa kya aap ya sarkar mujhey batayegi ki sarkar ne kis prant ke kish school me aisa niyam lagu kiya hai jahan sabhi ko saman siksha mil rahi ho merey dimag se shayad koi bhi aisa 1 school poore Bharat varsh me nahi hoga mere gram panchayat ki kul aabadi jab 3 prathamik vidyalay bane 1566 thi jo ki aaj 1700 ke aashpas hogi me koi bhi school poorn manak par nahi bana hai mere gram panchayat ke sabhi purvo ki vrattakar parimap me trijya 700 meeter ke aaspas hogi me 3 vidyalay banwaye gaye hain ye kis niyam ke antargat kiya gaya bhai sahab ye sab kewal Bsa Nprc Brc jaisai choron dalalo ke kargujariyon ka hi parinam hai sarkar shiksha kya khak dena chahati hai 4 tarah ki shiksha vyavastha neta sahab babu wa mazdur banane ke karkhane hai jise sale angrej bana gaye the vahi padhati aaj bhi lagu hai…. kyun rahi me aapne vidyalay ke liye kya kar raha hau to shayad aap ya sarkar ka koi numainda aakar meri gram panchayat ke kisi bhi vyakti se ye jankari prapt kar sakta hai. mere vidyalay me 34 bachche va 2 adhyapak hain. jisame eak mahoday sarkari kagjaton ke bojh se to madam apne samajik gatividhiyon ke karan bachchon ko poore satr me eak bhi din 4 ghante yadi imandari se padhai ho to bahut badi bat hai…….
    Rahi bat meri to 15 march ke baad se khunnas khakar me vartman me pune maharastr aa gaya huan va dainik gatividhion ka nirikshan me yahan se bhi kar raha hua aaj bhi hamare principal sahab school time se kam se kam 30 se 60 minute tak deri se aatey hain ……… Sir bataiye poore varsh mah july se 15 march tak koi saptah aisa nahi gaya jisme meney apna kam se kam saptah me 3 se 4 din vidyalay ko na diya ho uss par yadi kaksha 5 ka koi eak bhi bachcha kamal phool hai ya phal ka antar na samjhey kisaki galti hai please give me solution ……

  7. Deepak Sharma // March 22, 2017 at 11:49 am //

    Myself Deepak Sharma . I am a student of B.ed second year , i think that teachers ko apni responsibility ko samjhna chiye ki … they r the makers of leading India , Bharatvarsh ko bha- rat bnane me unka yogdaan bhut important hai. Or government ko bhi is subject ko dhyan me rkhte hue ache teachers ko mauka Dena chiye , tabhi hum primary education ko ek shi aakar de skte hai ….

  8. नमस्कार विनय जी, आपके शब्दों में विनम्रता होती तो और अच्छी बात होती। खैर, आम बोलचाल की भाषा में ऐसी ही शब्दावली का उपयोग होता है जिस पर संवाद करने की जरूरत है ताकि एक अच्छी आमराय बनाई जा सके, जो पूर्वाग्रह से मुक्त हो।

    आप विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हैं। इस भूमिका में आपके अपने अनुभव होंगे। मगर शिक्षकों के बारे में ऐसी राय से हमारे समाज का अहित ही होने वाला है। हमारे बच्चों का नुकसान ही होगा। यथास्थिति में बदलाव के लिए शिक्षक साथियों के साथ संवाद करने की जरूरत है। उनको भरोसा दिलाने की जरूरत है कि आप काम करिए काम में जहां दिक्कत आती है मेरी मदद लीजिए। हम सदैव आपके साथ हैं। इस तरह के भरोसे वाले माहौल में ज्यादा अच्छा काम हो पाएगा।

    आपके सामने क्या चुनौतियां रहीं, अगर आप इसे भी साझा करें और स्कूल की स्थिति के बारे में भी बताएं तो शायद स्थिति को ज्यादा बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। एक अनुरोध आखिर में रहेगा कि ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल न करें जो शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ हो और उनकी भूमिका को कमतर करके आँकता हों।

  9. vinay srivastava // January 30, 2017 at 9:11 pm //

    doston me vinay srivastava adhyaksha vidyalay prabandhan samiti chakalodi pur rahi raebareli up doston lagta hai sarkar ne prathamik shiksha ko haram khoron aur haram khori ka adda bana diya hai..

  10. अनुज जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपके विचारों के लिए। एनसीएफ की रूपरेखा को पढ़ने के दौरान लगता है कि इससे हम प्राथमिक शिक्षा को ज्यादा बेहतर बना सकते हैं। बच्चों को समस्याओं का सामना करने और समाधान करने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। मगर मूल समस्या ऐसे दस्तावेज़ के सहज अनुवाद की है।

    इसका भावानुवाद भी किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोग भी इसे आसानी से समझ पाएं और इसकी मूल भावना समझकर बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने में उसका उपयोग कर सकें। इसकी भाषा ऐसी होनी चाहिए ताकि लोग इसे पढ़ने का हौसला जुटा सकें। अंग्रेजी भाषा में प्रवाह वाला पहलू है, मगर हिंदी के कुछ दस्तावेज़ों में यह बाद नदारत है।

    एजुकेशन मिरर की कोशिश होगी कि ऐसी बातों को कैसे सहज तरीके से सामने रखकर संवाद हो सके। ताकि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले शिक्षकों, शिक्षक प्रशिक्षकों व सामान्य अभिभावकों को इसका लाभ मिल सके।

  11. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के अनुरूप अगर शिक्षण हो तो हम देश ही वरन विश्व की हर समस्या का समाधान निकाल सकते है. लेकिन दुखद बात या है की यह रूप-रेखा बड़े-बड़े लोगों ने इतने बड़े एवं भारीभरकम शब्दों में लिखा है की ये अभी भी किताबों में दबकर ही रह गया है…और इसकी मुलभुत उद्देश्य जिसके लिए शायद इसकी रचना की गयी थी वो स्कूलों तक भी नहीं पहुच पायी और जहाँ पहुंची भी तो पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रही है.

    अभी जरुरत है इसके मूल-तत्वों को सरल शब्दों में ढालने की ताकि कम से कम हर माता-पिता, शिक्षक एवं देश के युवा इनको समझ सके, समझा सके और सबसे जरुरी बात इनको आत्मसात कर सके.

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