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सब बच्चों के हाथ में किताबें हों, यह सपना सच हो गया!!

teacher educator

प्रकृति के बीच होने वाले लम्हों का आनंद भी जरूरी है। यह नए विचारों के प्रति सजग होने और उनको हक़ीक़त में तब्दील करने के लिए प्रेरित करता है।

कल एक दोस्त से एक स्कूल के बारे में बात हो रही थी। इस बातचीत में उस स्कूल में लायब्रेरी की स्थिति को बेहतर बनाने को लेकर चर्चा हो रही थी। मैंने कहा, “मैं सारे बच्चों के हाथ में किताबें हों, ऐसे लम्हों की तस्वीर कैमरे में क़ैद करना चाहता हूँ।”

संयोग की बात है कि आज ही यह सपना सच हो गया। इस लम्हे की कोई तस्वीर तो नहीं है। मगर एक वीडियो है, जिसमें सारे बच्चों के हाथ में किताबें हैं और वे अपनी-अपनी किताबों के नाम बता रहे हैं। उनके चेहरे पर खुशी के भाव हैं। सारे शिक्षक हैरानी से बच्चों की तरफ देख रहे हैं।

इस लम्हे की अनुभूति के बारे में सिर्फ इतना कहना है कि ऐसे पल आपको सालों तक याद आते हैं। बहुत सारी निगेटिव चीज़ों के बीच में किसी ऐसी सकारात्मक चीज़ की शक्तिशाली मौजूदगी बहुत सारी चीज़ों को बदलकर चली जाती है। बच्चों का किताबों के साथ और आपस में रिश्ता ‘दोस्ती’ पर होने वाले संवाद के बाद एक नए मुकाम पर पहुंचेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

देखते हैं कि आने वाले दिनों में क्या होता है? मगर जिस तरह के सकारात्मक माहौल की दरकार इस स्कूल में मुझे अपने काम को जारी रखने के लिए थी, उसके निर्माण में मैंने काफी हद तक कामयाबी पायी है। मगर सफर अभी जारी है। बहुत सारे सपने सच होने की राह देख रहे हैं।

बदलाव की हर कोशिश है ख़ास

किसी सरकारी स्कूल में बदलाव की छोटी-छोटी कोशिशें भी बहुत मायने रखती हैं। क्योंकि आपकी कोशिशों का परिणाम अंततः शिक्षकों के सेल्फ-मोटीवेशन पर निर्भर करता है। अगर वे किसी काम को अपनी समझकर पूरी जिम्मेदारी के साथ करते हैं तो उसके अच्छे परिणाम आते हैं। विपरीत परिस्थिति में प्रतिकूल परिणाम भी  देखने को मिलते हैं। बीते दिनों के अनुभवों से एक बात साफ हुई कि स्कूल में लायब्रेरी के पक्ष में माहौल बनाना और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना आसान सा काम है। मगर इसके लिए आपको उस शब्दावली में बात करनी होगी जिसे बच्चे समझते हों।

flowerइसके साथ ही शिक्षकों को भी इस बात का अहसास दिलाना होता है कि आप एक बहुत शानदार काम कर रहे हैं। जो बच्चों को खुशी देता है। इससे उनकी ज़िंदगी में खुशी का एक और बहाना जुड़ता है, इसलिए उनको लायब्रेरी की किताबों से दूर मत करिए। उनको किताबों के साथ दोस्ती करने और उनके साथ बात करने का मौका दीजिए।

बच्चों के साथ संवाद के सिलसिले में सफ़दर हाशमी की कविता ‘किताबें’ की पंक्तियां किताबें करती हैं बातें और गुलज़ार की कविता ‘किताबें’ की पंक्तियां “किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से ताकती हैं महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होती” का जिक्र हो आया।

इस पूरी बात का दूसरा पहलू भी है जो बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने वाले काम से जुड़ा है। इसके बारे में एक मुकम्मल राय यह बन रही है कि ऐसे किसी भी काम को करने के लिए स्वतंत्रता के साथ काम करने और नए विचारों के प्रति खुलापन काफी जरूरी है। इस काम को यांत्रिक ढंग से और तात्कालिता वाले मोड में नहीं किया जा सकता है। स्कूल में पढ़ने-लिखने का पूरा माहौल बनने में वक्त लगता है। बहुत ज्यादा यांत्रिक होने से अर्थ निर्माण और समझ वाले पहलू पर ज्यादा फोकस नहीं हो पाता है। इसलिए इस पहलू पर काम करना बहुत ज्यादा रचनात्मकता और वैचारिक स्वतंत्रता की मांग करता है ताकि आप बच्चों का पठन-लेखन के क्षेत्र में बहुआयामी विकास हो सके।

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