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उत्तर प्रदेशः कब खत्म होगा नई किताबों का इंतज़ार?

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैउत्तर प्रदेश में एक अप्रैल से शुरु हुए नए सत्र में सरकार की तरफ से मिलने वाली मुफ्त किताबें अभी तक स्कूलों में नहीं पहुंची हैं। इस वजह से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। तकरीबन 6 महीने बाद भी किताबें न पहुंचना वहां की शिक्षा व्यवस्था के प्रति सरकारी उपेक्षा वाले रवैये को साफ़-साफ़ दर्शाता है।

इस आशय की ख़बरें वहां के स्थानीय मीडिया में काफी लंबे समय से प्रकाशित हो रही है। मगर संबंधित अधिकारियों की तरफ से किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस पहल नहीं हो रही है। सिर्फ़ कोरे आश्वासन मिल रहे हैं।

स्कूल खुले, पर नहीं पहुंची किताबें

उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की स्थिति क्या है? इस सवाल का जवाब किताबों के वितरण में देरी वाली कहानी से समझा जा सकता है। यह कहानी हर साल दोहराई जाती है।

अखबार वाले लिखते हैं कि सत्र शुरू होने में पांच दिन बाकी नहीं पहुंची किताबें। एक महीने बीते, नहीं पहुंची किताबें। तीन महीने बीते, नहीं पहुंची। आखिर में वे भी हार मान लेते हैं कि किसी दिन पहुंचेंगी किताबें। बच्चों के साथ-साथ उन शिक्षकों को भी समस्या होती है जो समय पर अपना पाठ्यक्रम पूरा करना चाहते हैं।

इस साल कहीं 50 फीसदी किताबें पहुंची हैं। तो कही कुछ कक्षाओं की किताबें आ गई हैं, मगर आठवीं कक्षा के बच्चों को किताबें नहीं मिली हैं। इस बारे में बताते हुए एक शिक्षक कहते हैं, “अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। शिक्षण सत्र के पांच महीने हो गए हैं, मगर अभी भी स्कूल में किताबें नहीं पहुंची हैं।”

आमतौर पर शिक्षा से जुड़े अधिकारियों को नियमित अंतराल पर स्कूलों की विज़िट करनी चाहिए और शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने के लिए स्कूलों को सुझाव व सहयोग देना चाहिए। मगर सुझाव व सहयोग तो दूर की बात है। स्कूलों में किताबों का वितरण भी सुनिश्ति नहीं हो सका है। इसके कारण आठवीं कक्षा के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। किताबों के लिए उनका इंतज़ार लंबा हो रहा है। इसका असर हज़ारों बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।

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