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भविष्य के शिक्षकों के सवाल क्या हैं?

सीखने की प्रक्रिया, बच्चों से बातचीत, शिक्षा में बातचीत की भूमिका, भारत में प्राथमिक शिक्षा, एजुकेशन मिररसरकारी स्कूलों में 12वीं के बाद एसटीसी का कोर्स करने वाले छात्र अभी एजुकेशन इंटर्नशिप कर रहे हैं। इसी तरीके से ग्रेजुएशन के बाद बीएड का कोर्स करने वाले छात्र भी एजुकेशन इंटर्नशिप के लिए अपने ज़िले के विभिन्न सरकारी स्कूलों में 4 महीने तक काम करने का अनुभव प्राप्त करेंगे। इनके आने से बहुत से स्कूलों को फौरी तौर पर सपोर्ट मिल रहा है जो सिंगल टीचर स्कूल जैसी स्थिति में हैं या फिर जहां बच्चों के नामांकन के हिसाब से काफी कम स्टाफ है। सरकारी स्कूलों में विभिन्न विज़िट्स के दौरान ऐसे नए छात्रों से मिलने का मौका मिल रहा है।

“इनमें सीखने की ललक है। उनके पास सही सवाल है। वे स्थितियों को स्वीकार करने की बजाय उनमें बदलाव करना चाहते हैं। उनको बच्चों से लगाव है। वे अपने प्रशिक्षण से मिले अनुभवों को अपने तरीकों से बच्चों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। वे बच्चों से बात कर रहे हैं। उनसे पूछ रहे हैं कि उन्होंने जो बात बतायी, वह बच्चों की समझ में आ रही है या नहीं। बतौर युवा उनमें काफी ऊर्जा है क्योंकि अभी उनकी पढ़ाई चल रही है। स्कूल उनके लिए नए-नए हैं। वे चीज़ों को बहुत ही नए परिप्रेक्ष्य से देख रहे हैं। इसके साथ ही अपने आसपास होने वाली चीज़ों का सूक्ष्मता से निरीक्षण (आब्जर्बेशन) कर रहे हैं।”

भावी शिक्षकों के सवाल क्या हैं?

बच्चे पढ़ना कैसे सीखते हैं, पठन कौशल, पढ़ना है समझनाबच्चा छठीं क्लास में कैसे पहुंच गया? इसके तो अक्षर पहचानना भी नहीं आ रहा है। छठीं क्लास को अंग्रेजी कैसे पढ़ाएं, बच्चों को तो एबीसीडी पहचानने में भी दिक्कत हो रही है। ये बच्चे तो जवाब ही नहीं देते। दूसरी कक्षा के बच्चे किताब पढ़ रहे हैं, मगर सातवीं-आठवीं के बच्चे किताब नहीं पढ़ पा रहे हैं। यह शायद सरकार की आठवीं तक पास करने वाली नीति (नो डिटेंशन पॉलिसी) के कारण हो रहा है। ऐसी नीतियां क्यों बनाई जाती हैं।”

उनके सवाल होते हैं, “हम बच्चों को बुनियाद मजबूत करने का मौका क्यों नहीं देते? बिना तैयारी के आगे जाने वाला बच्चा तो हमेशा के लिए पीछे रह जाएगा। जब पढ़ना-लिखना सिखाने का अवसर तीसरी कक्षा तक ही होता है, तो फिर शुरुआती कक्षाओं पर ज्यादा ध्यान क्यों नहीं दिया जाता। बाद में हम जो चिंता करते हैं, उससे बचा जा सकता है अगर हम छोटी कक्षाओं पर शुरू से ध्यान दें।”

इन छात्रों में से एक को उत्पादक और उपभोक्ता जैसी चीज़ समझाने में भी काफी परेशानी हो रही थी। बच्चे इस शब्द से ही परिचित नहीं थे। क्योंकि उनके परिवेश में अलग आदिवासी भाषा बोली जाती है। एक पुराने शिक्षक के अनुसार,  “कुछ बच्चे कहते हैं कि हमें तो हिंदी आती नहीं है, और जाननी भी नहीं।” यानि बच्चे कुछ नया सीखने से पीछे हट रहे हैं। आठवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा है, इसलिए उनको सवालों के जवाब रटवाए जा रहे हैं। बाकी कक्षाओं में अन्य मूलभूत चीज़ों पर ध्यान देने की कोशिश हो रही है।

भविष्य के शिक्षकों की जिम्मेदारी

पठन कौशल, पढ़ने की आदत, रीडिंग स्किल, रीडिंग हैबिट, रीडिंग रिसर्च,

एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

बहुत से स्कूलों में गणित और अंग्रेजी जैसे विषय इंटर्नशिप के छात्रों को दे दिए गए हैं। ऐसा शायद यह सोचकर किया गया होगा कि उनके पास यह विषय है तो वे ज्यादा अच्छा पढ़ा पाएंगे। कुछ स्कूलों में तो बाकायदा उनका टाइम टेबल बना दिया गया है। हर किसी का कालांश फिक्स है ताकि उनको कक्षाओं में जाने और बच्चों को पढ़ाने व्यावहारिक अनुभव और अवसर मिले। नए छात्रों की कोशिशों में जो ऊर्जा दिखायी देती है। उसी का शिक्षा व्यवस्था में घोर अभाव दिखायी देता है।

एक युवा शिक्षक जो परमानेंट होने के बाद पढ़ाना बंद कर देता है, जिसे अगले 15-20 सालों तक स्कूली व्यवस्था में काम करना है। किस तरह का योगदान करेगा? यह एक बेहद गंभीर सवाल है। नए छात्र जो भविष्य के शिक्षक भी हैं पूछ रहे हैं, “शिक्षकों को बच्चों के सीखने की परवाह क्यों नहीं है। उनका बच्चो से लगाव भी दिखायी नहीं देता। वे स्कूल में समय क्यों बिताना चाहते हैं? अगर स्कूल में हैं तो फिर पढ़ाना ही चाहिए।”

इनका कहना है कि स्कूल में मनोविज्ञान की जो पढ़ाई होती है, उसमें बताया जाता है कि बच्चा ऐसा होता है। वह किस तरीके से व्यवहार करता है। आदि-आदि। वहां सारी चीज़ें ऐसा होता है, वैसा होता है, ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए के रूप में पढ़ाई जाती हैं। जबकि रियल स्कूल में सारी चीज़ें लाइव होती हैं। वहां एक साथ सैकड़ों चीज़ें हो रही होती हैं। हमें प्राथमिकता तय करनी होती है कि किन चीज़ों के ऊपर ध्यान दें। ताकि बच्चों का ध्यान पढ़ने के लिए आकर्षित किया जा सके। इन छात्रों में से कुछ स्कूल की लायब्रेरी देखकर दंग थे। वे खुशी-खुशी बच्चों को किताबें दे रहे थे। उनके साथ किताबों के ऊपर बात करने की कोशिश कर रहे थे।

असली आनंद तो उनको अभी आना बाकी है, जब वे बच्चों को कहानी सुना रहे होंगे। भविष्य के शिक्षकों के लिए यह इंटर्नशिप स्कूल की वास्तविक परिस्थितियों से रूबरू होने का अच्छा मौका है। उनके सवाल बहुत कीमती हैं क्योंकि वे किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है। वे अभी चीज़ों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुभवों को स्पेश मिलना चाहिए ताकि वे अपने प्रशिक्षण के अनुभवों को साझा कर सकें। उनके ऊपर विचार-विमर्श करने कर सकें।

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