
शिक्षा का अधिकार क़ानून-2009 के अनुच्छेद-16 का एक खण्ड के रूप में नो डिटेंशन पॉलिसी को शामिल किया गया है। यह कहता है, “स्कूल में प्रवेश लेने वाले किसी भी बच्चे को किसी क्लास में फिर से नहीं रोका जाएगा या प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाएगा।”
नो डिटेंशन पॉलिसी का असर
असली समस्या तो बहाने बनाने की है
क्लास में पढ़ाने से किसने रोका है
आखिर में दो बातें
‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ पर मेरी राय है कि केवल एक पॉलिसी बदलने से बात नहीं बनेगी। स्कूलों में कम उम्र के बच्चों का प्रवेश धड़ल्ले से हो रहा है। ऐसे बच्चों के लिए कक्षा के अनुरूप स्तर हासिल करना काफी कठिन होता है। इसे ध्यान रखते हुए पॉलिसी में सुधार करना चाहिए। बच्चों को फेल नहीं करना है, इसका जो अर्थ लिया गया कि बच्चों को पढ़ाना नहीं है। इसके कारण भी शिक्षा के स्तर में गिरावट हुई है। सारा दोष बच्चों का नहीं है। कुछ जिम्मेदारी शिक्षक समुदाय भी बनती है।
यह बात विशेष महत्व की है कि हर बच्चा सीखता है। वे सीखना चाहते हैं। बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं। मगर शिक्षक समुदाय में से कुछ लोगों ने शोर मचा दिया कि बच्चे सीखना ही नहीं चाहते। वे तो परीक्षाओं का डर न होने से पढ़ना ही नहीं चाहते। ऐसे में जरूरी है कि शिक्षकों की तरफ से भी शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश हो। इसके साथ ही छात्र-शिक्षक अनुपात का भी मुद्दा काफी अहम है।
देश के बहुत से स्कूल ‘सिंगल टीचर स्कूल’ हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई कैसी होगी? क्या वे कक्षा के अनुरूप पठन व गणितीय कौशलों का विकास कर पाएंगे? यह सवाल काफी अहम है। बहुत से स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। दो-तीन शिक्षकों के भरोसे आठवीं तक की स्कूलें चल रही हैं, जहाँ 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं, ऐसी नीतियां तो मजदूर ही बनाने के लिए हैं। ऐसी शिक्षा से निकले बच्चे अपने आप फेल हो जाएंगे, उनके लिए अलग से कोई पॉलिसी बनाने की जरूरत नहीं है।









