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स्कूल में बच्चे की भाषा के लिए कितनी जगह है?

भारत के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे।

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे अपना लिखा हुआ दिखाते हुए।

चकमक पत्रिका के संपादक सुशील शुक्ल अपने एक लेख में कहते हैं, “बच्चों को स्कूल पहुंचकर निराशा हाथ लगती है। उनके तमाम अनुभव स्कूल में किसी काम नहीं आते। स्कूल इन तमाम अनुभवों को नज़रअंदाज कर, पोंछकर पढ़ाई शुरू करता नज़र आता है।”

वे कहते हैं, “अपने जीवन में भाषा से अच्छा खासा काम चला रहे बच्चों को अ से पढ़ना शुरू करना होता है। एक तरह से स्कूल उसके जीवन के चार-पाँच सालों को ही नज़रअंदाज कर देता है। और फिर स्कूल में बच्चों का पुनर्जन्म होता है। एक-एक बच्चे का दुहरा जीवन शुरू होता है- स्कूल का जीवन और स्कूल के बाहर का जीवन। इन दोनों जीवनों में कोई संवाद नहीं होता।”

बच्चे की भाषा बनाम स्कूली भाषा

अपने लेख में सुशील आगे लिखते हैं, “फिर शुरू होती है स्कूली जीवन के सबसे दुखदाई और कठिन काम की शुरूआत। पढ़ना सीखने की शुरूआत। स्कूल में रोज़-रोज़ एक जीवन शुरू होता है जिसमें बच्चे को हर पल इस बात का अहसास दिलाया जाता है कि उसे क्या-क्या नहीं आता।”

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इस किताब के लेखक चकमक के संपादक सुशील शुक्ल जी हैं। यह किताब बच्चों को काफी पसंद है।

इसके आगे का अंश है, “बच्चे शायद कहना चाहते हैं कि उन्हें हाथी पढ़ना नहीं आता पर वे हाथी के बारे में सुनी एक पूरी कहानी सुना सकते हैं। पर स्कूल के बोर्ड पर लिखा हाथी कहानी के हाथी  को पहचानने से इनकार कर देता है। धीरे-धीरे जीवन के तमाम  अनुभव, समझ, तर्क सब स्कूल में आते ही सूख जाते हैं। स्कूली पढ़ाई अब बच्चों के अनुभवों को झंकृत नहीं करती बल्कि वह एक जानकारी की तरह याद आने लगती है। और पढ़ने का काम व्यर्थ लगने लगता है।”

बच्चों को पढ़ना सिखाने का काम आसान भले ही न हो पर उसे रोमांचक, रुचिकर बनाया जा सकता है। सबसे पहली शर्त तो बच्चे के पूर्व ज्ञान, उसके अनुभव, उसकी भाषा को मान्यता देने की है। यह मान्यता ही वह एकमात्र बिंदु हो सकती है जहाँ से चलकर पढ़ना सीखने की तरफ कोई रास्ता जाता है।

पढ़ना सिखाने की शुरूआत किस्से-कहानियां सुनाने से हो तो बेहतर है। क्योंकि तब बच्चे अपने तमाम अनुभव के साथ आपकी बात सुनने तथा अपनी सुनाने के लिए प्रस्तुत हो सकेंगे। यह दुतरफा मामला बच्चों में शुरूआती आत्मविश्वास पैदा करेगा। इस विश्वास पर पाँव रखकर ही बच्चे उन अनजानी, अमूर्त आकृतियों से जूझने चले आएंगे जो पढ़ना सीखने के रास्ते में आएंगी। यही विश्वास उन्हें अन्दाज़ा, अनुमान लगाने की हिम्मत देगा जो पढ़ना सीखने में आगे एक प्रमुख औज़ार साबित हो सकता है।

कैसे सुनाएं कहानी?

किस्से कहानियां किताबों से सुनाने की पहल हो सकती है। इसके लिए साहित्य के चुनाव में थोड़ी-बहुत सावधानी रखने की ज़रूरत होगी। एक शिक्षक जो बच्चों से किस्से-कहानियां सुन चुका होगा, उन्हें किस्से-कहानियां सुना चुका होगा, उसे इस बात का अन्दाजा लगाने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी कि बच्चों को किस किस्म का साहित्य आकर्षित करेगा। फिर भी शुरूआती तौर पर साहित्य ऐसा हो जिसमें बच्चों के द्वन्द, अनुभव, कल्पना आदि शामिल हों। बाल पात्रों से बच्चे खुद को ज्यादा जोड़ पाते हैं इसलिए शुरूआत में इस बात का ध्यान रखना शायद कारगर साबित होगा। पर किस्से-कहानियों के बच्चे सक्रिय होने चाहिए– कहानी में पेश घटना में सक्रिय रूप से शामिल।

(सुशील शुक्ल द्वारा लिखित आलेख संदर्भ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। यह लेख भाषा शिक्षण के लिए काफी उपयोगी है। वर्तमान में चकमक पत्रिका के संपादक हैं। उनकी लिखी किताब ‘बोलो एक सांस में’ बच्चों को काफी पसंद है। शिक्षा के क्षेत्र में अनुवाद के माध्यम से भी उन्होंने काफी सक्रिय योगदान दिया है।)

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