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बच्चों को हिंदी पढ़ना कैसे सिखाएं?

अर्ली लिट्रेसी, एजुकेशन मिरर, सरकारी बनाम निजी स्कूल, पठन कौशल का विकास, पढ़ना कैसे सिखाएंशिक्षक साथियों में हिंदी भाषा शिक्षण को लेकर तमाम तरह के विरोधाभाष घर कर गए हैं। मसलन बच्चों को किस तरीके से पढ़ाएं? कोई कहता है कि कहानी सुनाओ। फिर उससे शब्द निकालो। फिर शब्दों से अक्षर निकालो। शब्दों के साथ चित्र भी दिखाओ। पर ऐसी स्थिति में बच्चा टमाटर के चित्र के साथ कुछ भी लिखा हो उसे टमाटर ही पढ़ता है। यानि वह अनुमान की ग़लत कंडीशनिंग में फंस जाता है।

हम कौन से तरीके अपनाएं

ऐसा भी कहा जाता है कि बच्चों को रटाना नहीं है। इसलिए हम उसे अक्षर नहीं सिखाते। क्योंकि यह तरीका तो रटंत पद्धति पर आधारित है। वहीं मात्रा शिक्षण के बारे में धारणा है कि बच्चा उसे भी सीधे शब्द की तरह अपने आप पढ़ना सीख लेगा। मगर कैसे? इस सवाल का किसी के पास कोई जवाब नहीं है। इसी संदर्भ में असेसमेंट की बात हो रही थी कि हम जिन पैमानों पर बच्चों का असेसमेंट करते हैं जैसे अक्षर, शब्द, वाक्यांश और पैराग्राफ वह चीज़ें हमें बच्चों को भी सिखानी चाहिए।
अंततः बात बग़ैर किसी निष्कर्ष के जारी रही। कुछ शिक्षक साथियों ने कहा कि तीसरी कक्षा के बच्चों को उन्होंने बारह खड़ी की मदद से पढ़ना सिखाया क्योंकि उनको सिखाने के लिए हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। मगर एक बात पर सारे लोग सहमत थे कि पहली-दूसरी को हिंदी पढ़ना सिखाने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए। उनके साथ नियमित काम होना चाहिए। इसके साथ ही सिखाने का तरीका ऐसा होना चाहिए कि बच्चों को उससे सीखने में आसानी हो और हमें भी ऐसा न लगे कि हम पर चीज़ें थोपी जा रही है। शिक्षकों का प्वाइंट काफी दमदार लगा मुझे।
उनकी उलझन में एक उम्मीद दिखी मुझे कि वे चीज़ों को समझना चाहते हैं। कुछ ऐसा करना चाहते हैं ताकि अभिभावकों को बता सकें कि उनके बच्चे सिर्फ अच्छा चित्र नहीं बनाते। बल्कि वे पढ़ना भी जानते हैं।
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