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स्कूली शिक्षा पर विमर्शः कब रूकेगी शिक्षकों की आलोचना?

seminar-educationअज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलुरू और अम्बेडकर विश्वविद्यालय के संयुक्त आयोजन में ‘स्कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्य में अध्यापन-कर्म की रूपरेखा’ थीम से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। इस सेमीनार अम्बेडर विश्वविद्यालय, दिल्ली के कैंपस में आयोजित किया गया।

‘सहज बुद्धि और विशेषज्ञता’ का मुद्दा

इस दौरान एक सत्र के दौरान शिक्षाविद रोहित धनकर ने कहा, “अध्यापक शिक्षा का उद्देश्य है कि शिक्षक कक्षा कक्ष में रहते हुए स्वयं समस्याओं का समाधान कर सकें। इसके लिए जरूरी है कि वे स्वयं के अनुभवों को देख सकें। उसकी विवेचना कर सकें। ताकि एक तरीके से दूसरे तरीके पर जा सकें। क्या यह सहज बुद्धि से संभव है या फिर इसके लिए विषय विशेष के ज्ञान की जरूरत है। मुझे लगता है कि इसके लिए विषय विशेष के सामग्री का ज्ञान, शिक्षण विधि (मेथडॉलजी)  और ज्ञान की प्रकृति को समझने की जरूरत है।”

शिक्षकों के पेशेवर विकास का मुद्दा उठाते हुए लोकेश ठाकुर ने कहा, “शिक्षकों के पेशेवर विकास का ढांचा खस्ताहाल है। शिक्षक जिस माहौल में काम कर रहे हैं हमें तो उनकी तारीफ़ करनी चाहिए।” उन्होंने शिक्षकों की तुलना अभिमन्यु के क़िरदार से करते हुए कहा कि हम उनको ‘वीर अभिमन्यु’ की तरह तो देख ही सकते हैं। ऐसे में हमें शिक्षक को शिक्षा की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार बताना रूकना चाहिए।”

उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमें शिक्षक को दोषी ठहराने की बजाय समस्याओं से निकलने के लिए तैयार करने की जरूरत है। लोकेश ने एक महत्वपूर्ण बात कही, “वे शिक्षक, अधिकारी और अभिभावक या समाज के अन्य लोग जो चीज़ों को ‘ब्लैक एण्ड ह्वाइट’ में देखते हैं और विचारों के मामले में काफी रिज़िड या दृढ़ हैं, उनको बदलाव की प्रक्रिया में कैसे शामिल और तैयार किया जाए, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।”

कैसे बदलता है एक शिक्षक?

सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाली एक शिक्षिका भी सेमीनार में शामिल हुईं। उत्तराखंड की एक शिक्षिका ताहिरा ख़ान ने अपना परचा पढ़ते हुए कहा, “बतौर शिक्षक पहले मेरा ध्यान पाठ्यक्रम को समय से पूरा करने और तथ्यों को रटवाने पर होता था। जिसमें किताबें केंद्रीय भूमिका में होती थीं। पर जब मैंने पढ़ाने के अपने तरीके पर ग़ौर किया तो बहुत से बदलाव की जरूरत महसूस हुई।”

tahira-khanउन्होंने बतौर शिक्षक अपने बदलाव की कहानी साझा की। उनके शब्द थे, “मुझे लगा कि पूरी क्लास को एक तरीके से नहीं पढ़ाया जा सकता है। इसलिए मैंने बच्चों को दक्षतानुसार पढ़ाने की योजना बनाई। इसके लिए बच्चों के समूह बनाए। क्लासरूम की प्रक्रिया में बच्चों की भागीदारी को बढ़ावा दिया, इसके लिए कहानी सुनाने, चित्रों पर चर्चा और बच्चों को स्वयं से पढ़ने के लिए प्रेरित करने जैसे प्रयास किये जिसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला। बतौर शिक्षक यह मेरे लिए खुद को बदलने वाला अनुभव रहा।”

शिक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर निरंतर लेखने करने वाली प्रतिभा कटियार ने कहा, “शिक्षकों में भी एक-दूसरे से सीखने की प्रक्रिया काफी तेज़ होती है। एक प्रशिक्षण के दौरान एक शिक्षक की अन्य शिक्षिका के अनुभवों पर बात हुई। इसका उनके ऊपर जादू सा असर हुआ। उन्होंने अपने स्कूल में उन विचारों को मूर्त रूप में लागू किया। इस तरह के प्रशिक्षण सत्र में इस तरह से होने वाली अनौपचारिक बातचीत भी सीखने का एक महत्वपूर्ण जरिया होती है।”

‘नई छवि गढ़ रहे हैं शिक्षक’

उन्होंने कहा, “शिक्षण कर्म विशेषकर प्राथमिक या माध्यमिक स्तर पर मासूम दिलों और ताजा बनते दिमागों के साथ सुरताल मिलाने का काम है। इस दौरान बच्चों के जेहन में, उनके मन में चीज़ों की जैसी छाप पड़ती है, वे वैसे ही नागरिक बनते हैं। एक शिक्षक अपने जीवन काल में सैकड़ों बच्चों से रूबरू होता है, उनके सर पर हाथ फेरता है, उनके साथ को महसूस करता है।”

उन्होंने अपने विद्यालयों में अच्छा काम करने वाले शिक्षकों का उदाहरण देते हुए कहा, “ये शिक्षक अपने कामों से नई छवि गढ़ रहे हैं जो सिर्फ कक्षा या स्कूल तक सीमित नहीं है। भले ही शिक्षण का पेशा उन्होंने किन्हीं अन्य वजहों से चुना हो। लेकिन इस पेशे में आने के बाद इस काम की गरिमा और संतुष्टि का अनुभव हुआ है। उनके लिए किताबें, पाठ्यक्रम सीमा नहीं है। वे पुरानी मान्यताओं, धारणाओं को तोड़ रहे हैं और नई गढ़ रहे हैं। ये शिक्षक कक्षा में जाकर अपनी तमाम उलझनों को भूल जाते हैं। वो बच्चों से संवाद करके तय करते हैं आज बच्चों के मन का मौसम कैसा है यानी आज पढ़ाने की कौन सी तरकीब, कौन सी जुगत लगाई जानी चाहिए। कक्षा का माहौल आनंद लेने वाला बनाना, सीखने की उत्सुकता बच्चों के मन में जगाने का काम ऐसे शिक्षक करते हैं।”

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