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“अध्यापकों को सम्मान देना तो इस विभाग की परंपरा नहीं, क्यों तोड़ रहे हैं आप इस परंपरा को”

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एक विद्यालय में बच्चों से संवाद करती शिक्षिका।

दिल्ली विश्वविद्यालय की एक रिसर्च स्कॉलर अपने एक शोध में में लिखती हैं, “शिक्षा व्यवस्था के प्रशासनिक ढांचे क भूमिका शिक्षक के कार्यों में मदद करने की है, जिसे ‘सपोर्ट सिस्टम’ का नाम दिया जाता है। इसके सुचारू रूप से काम करने पर शिक्षक प्रभावशाली ढंग से अपना काम कर पाते हैं।”

इस सपोर्ट सिस्टम के सही से काम न करने पर शिक्षक के प्रमुख कार्य यानि कक्षा में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया बाधित होती है, जिसका सीधा असर बच्चों के सीखने की प्रक्रिया व उनके अकादमिक प्रदर्शन पड़ता है।”

ऊपर लिखी बातों के संदर्भ में अगर हम विद्यालय में निरीक्षण, अवलोकन व सहयोग के लिए जाने वाले अधिकारियों की भूमिका पर विचार करें तो वह क्या होनी चाहिए? शिक्षकों को अपने सवालों से डरा देना? अपने व्यवहार से उनके परेशान कर देना? उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा करना? उनको कितनी तनख्वाह मिलती है, यह याद दिलाना?

अधिकारियों के बारे में क्या सोचते हैं शिक्षक?

सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों के बारे में लोगों के जो पूर्वाग्रह हैं, उन्हीं का उच्चारण करते हुए सारा दोष शिक्षकों पर लगा देना। अगर कुछ अच्छा भी हो रहा है तो उसका जिक्र न करना ताकि शिक्षक ज्यादा आत्मविश्वास के साथ या बहुत ज्यादा सहज होकर बात न करें, क्योंकि हम तो अधिकारी हैं और अधिकारी का तो अधिकार होता है सामने वाले के आत्मविश्वास को खा जाना, सवालों की झड़ी से सामने वाले को कटघरे में खड़ा कर देना।

culture-of-praisजाहिर सी बात है कि ऊपर लिखी बातों से सिद्धांत के रूप में कोई सहमत नहीं होगा। पर व्यवहार की बात करें तो शिक्षक कहते हैं कि स्कूल में आने वाले अधिकारियों के व्यवहार से वे आहत महूसस करते हैं। वे हमारी परेशानी को समझने की कोशिश नहीं करते। आमतौर पर यह शिकायत किसी ख़ास राज्य की नहीं है, बहुत से राज्यों की बात है।

यह बात किसी गाँव में पढ़ाने वाले शिक्षक के लिए जितनी सच है, उनती ही किसी आदिवासी इलाक़े में पढ़ाने वाले शिक्षक के लिए और शायद मेट्रो में पढ़ाने वाले शिक्षक को भी ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ता होगा। जब शिक्षक कहते हैं, “अधिकारियों के बारे में पहले से कुछ अनुमान लगाना संभव ही नहीं है। वे किस बात पर नाराज हो जाएंगे या कमी गिनाने लग जाएंगे, कहना मुश्किल है।

अधिकारियों के प्रोत्साहन भरे शब्द और समस्याओं के सुनने वाले धैर्य की तारीफ भी करते हैं शिक्षक। ऐसे अधिकारियों के वाक्यों को वे अपने क्लास में टांगकर भी रखते हैं। उस पर अमल भी करते हैं। हमारी बात का असर हो, इसकी पहली शर्त है कि हम सामने वाले के दिल में जगह बना पाएं। उसकी भावनाओं से जुड़ पाएं। उसे अपनेपन का अहसास दे पाएं। अधिकारी अगर इस बात भरोसा शिक्षकों को दिला सकें तो शायद वे समस्याओं से ज्यादा गहराई से रूबरू हो सकेंगे और समाधान की दिशा में शिक्षक साथियों की मदद कर पाएंगे और अपने स्तर पर सपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने वाले विचारों की खोज भी कर पाएंगे।

शिक्षकों के प्रति संवेदनशील बनें अधिकारी

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यही कथन अधिकारियों के संदर्भ में लागू होता है।

यह स्थिति शिक्षकों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच संवाद और भरोसे की कमी को रेखांकित करती है। दुनिया के सबसे विकसित देशों की ख़ास बात है कि वहां शिक्षकों का सम्मान होता है।

किसी आयोजन में आगे की पंक्ति में शिक्षकों के लिए जगह होती है, शिक्षकों के सम्मान के लिए सप्ताह भर तक कार्यक्रम होते हैं, शिक्षक बनना बड़े गर्व की बात मानी जाती है, आम जनमानस के मन में शिक्षक के पेशे के प्रति सम्मान का भाव होता है।

एक शिक्षक बता रहे थे कि उनके यहाँ स्टाफ कम है, इस वजह से 150 बच्चों की क्लास संभालनी पड़ रही है। इतने बच्चों को संभालना काफी मुश्किल है। दिनभर के काम के बाद काफी थकान हो जाती है। किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक की ऐसी परेशानी को हम क्यों नहीं समझ पाते हैं, क्योंकि हम उनके परेशानियों के बारे में उनकी चुनौतियों के बारे में जानते ही नहीं है। हम बस इतना ही जानते हैं कि सरकारी स्कूल में कोई काम नहीं करना होता है औऱ शिक्षकों को वेतन बहुत ज्यादा मिलता है।

शिक्षकों के आत्म-सम्मान का रखें ध्यान

सुनी-सुनाई बातों को सच मानकर व्यवहार करना किसी भी रिश्ते में भरोसे को खत्म कर देता है। एक-दूसरे के प्रति संदेह को बढ़ावा देता है। ऐसे सवाल अगर आपके मन में भी आते हैं तो अपने बच्चों के शिक्षक से स्कूल में जाकर संवाद करें। उनके काम को समझें। उनकी परेशानियों को समझें। कौन सी बातें उनको प्रेरित करती हैं, यह भी जाने क्योंकि एक ख़ुशहाल शिक्षक ही आपके बच्चों को अच्छे से पढ़ा सकते हैं।

बच्चों के साथ सीधे तौर पर शिक्षक का ही जुड़ाव होता है। इसलिए उनके काम को महत्व देना और उनके काम में सहयोग के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम बनाना जरूरी है। इसके साथ ही किसी विद्यालय केअवलोकन, बच्चों के आकलन और शिक्षकों के काम के मूल्यांकन के बारे में नज़रिया बदलने और ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत है ताकि शिक्षक साथी कहने को मजबूर हो जाएं, “”अध्यापकों को सम्मान देना तो इस विभाग की परंपरा नहीं, क्यों तोड़ रहे हैं आप इस परंपरा को”।

शिक्षा विभाग में शिक्षकों के प्रोत्साहन की संस्कृति (Culture of Appreciation) विकसति करने की पहल शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों की तरफ से होना, एक बड़े बदलाव की भूमिका लिख सकता है, जिसके बड़े दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। हमने सालों से आलोचना को आजमाया है, एक शैक्षिक सत्र में प्रोत्साहित करके और सही निर्देश व सहयोग देकर भी देख लेना चाहिए कि शिक्षकों के व्यवहार और सोच में कितना बदलाव होता है।

ऐसी परंपरा को तोड़ने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारी वास्तव में सम्मान के हक़दार हैं। क्योंकि वे अपने शिक्षकों के योगदान के प्रति विनम्र हैं और एक शिक्षक की भूमिका के प्रति सजग भी।

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