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किताबों से मेरी दोस्ती कैसे हुई?

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रचना यादव ‘गांधी फेलोशिप’ में बतौर प्रोग्राम लीडर काम कर रही हैं। बड़ों में पढ़ने की आदत का विकास कैसे हो, इस दिशा में वे प्रयास कर रही हैं।

एजुकेशन मिरर की नियमित पाठक और ब्लॉगर रचना यादव शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रही हैं। पढ़ने की आदत का विकास कैसे हो? इससे जुड़े अनुभवों को वह इस पोस्ट में साझा कर रही हैं।

पढ़ने के प्रति चाव कैसे विकसित करें?

यह पोस्ट पढ़ने के प्रति चाव के बारे में है, किताबों से ज्यादा गहरे लगाव के बारे में है। जो उन लोगों से सीधे संवाद करती है जो पढ़ना जानते हैं पर बहुत से कारणों  किताबों से दूर हैं। शायद ऐसे ही माहौल के बारे में गुलज़ार लिखते हैं, “किताबें झांकती हैं, बंद आलमारी से शीशों से, महीनों अब उनसे मुलाक़ातें नहीं होतीं।”

एक किताब के पन्नों में बिखरे अक्षरों में कितनी ताक़त है? क्या तुम कभी इसकी कल्पना भी कर सकते हो। क्या तुम कभी इस सवाल के बारे में सोचते हो? तुम शायद नहीं सोच पाओगे ! अरे, ऐसा क्यों ? शायद किसी किताब से तुम्हारा पाला ही नहीं पड़ा! किसी ऐसी कहानी तक तुम्हारी पहुंच बनी ही नहीं, जो तुम्हारी आत्मा को छू ले और तुम्हारी सूखी हुई पथराई आँखों को जल से भर दे, और तुम्हें एक झटके में समझा दे कि जीवन वही है जिसमें तुम मरते दम तक अपनी भावनाओं को बचा पाओ।

ऐसी कविता से पाला पड़ा है, जो नींद उड़ा दे?

love-for-reading-booksतुम शायद नहीं सोच पाओगे किताबों के महत्व के बारे में क्योंकि कभी तुम्हारा पाला ही नहीं पड़ा किसी कविता से ! एक ऐसी कविता जो तुम्हारी नींदे उड़ा दे और तुम्हारे संसार को आश्चर्य से भर दे कि अहा ! जीवन का ऐसा सुंदर रूप मैं पहले क्यों नहीं देख पाया।

ऐसी कविता जो तुमको प्रेम समझाए कि क्यों ऐसा होता है कि कोई प्रेम में पड़कर एक ही इंसान को हजारों -हजार तरीके से समझता है और इंसान को समझते-समझते वो एक दिन ख़ुद को समझ जाता है। तब उसे समझ आता है कि प्रेम इसलिए है कि ईश्वर चाहता है तुम स्वयं को जानो और तब तुम इच्छा करो कि मेरा जीवन कविता बन जाए या मैं किसी के जीवन का कवि !!

किताबों का वह जादू जो सपने बोता है

book-readingतुम्हें भी अपने पसंद की किताबें खोजनी चाहिए। क्या पता किसी उपन्यास में तुम्हारा ही जीवन दर्ज़ हो। उसका कोई पात्र तुम्हारे जैसा ही हो। तब शायद तुम्हें उस हैरानी का अहसास हो सके कि कैसे लिखने वाले ने मुझसे मिले बग़ैर ही मेरे मन की हालत का बयान कर दिया है। मैं कहती हूँ कि तुम्हें मिलना ही चाहिए किताबों के उस जादू से जो सपनें बोती हैं। मन की भावनाओं को संवेदनशील बनाती हैं। दिलों पर जमी धूल को साफ़ करती हैं, मन के आईने को चमकाती हैं और इंसान बनाती हैं।

अब तुम्हीं बताओ, क्या इंसान एक आलीशान घर है? क्या इंसान होना सिर्फ दो वक़्त की रोटी तक सिमटने वाली बात है?क्या इंसान सिर्फ़ रुपयों का जोड़ है? गहना है ? जमीन है ?……….आख़िर  क्या है इंसान होना? शायद इंसान होना, ये सब नहीं है। ये सब तो साधन मात्र हैं ,जीवन को सफल बनाने  में सहायक हैं। पर जीवन इनमें नहीं बसता  है।  इंसान तो धड़कते हुए दिल है , बहती हुई भावनाएं हैं। इसलिए एक इंसान के लिए जरूरी है कि वो ख़ुद को समझने की यात्रा में है, इसलिए नहीं कि वो घरों को समझे , पत्थरों को समझे , गहनों को समझे।

हम अपनी आत्मा के लिए क्या जुटा रहे हैं?

हमने पेट के लिए खाना जुटा  लिया। तन के लिए कपड़े जुटा लिए। पर आत्मा के लिए हम क्या जुटा रहे हैं, क्या हमारी आत्मा को भी भोजन की जरूरत लगती है? आत्मा का भोजन है विचार …. चिन्तन …. मंथन और इन सबको रचती और बनाती है एक किताब !!!

(रचना की यह पोस्ट आपको कैसी लगी? लिखिए कमेंट बॉक्स में अपनी टिप्पणी। किताबों से आपकी दोस्ती कैसे हुई? इस बारे में आप अपने भी विचार कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं।)

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5 Comments on किताबों से मेरी दोस्ती कैसे हुई?

  1. Rakesh Kumar yadav // October 24, 2017 at 9:17 am //

    nice.

    bus hame thoda sant dimag se padne wqet sochne ki jarurat hai

    apka lekhne ka style acha hai

    …….yadav

  2. shivali // July 19, 2017 at 4:26 pm //

    ‘ achchhi kavitaye ‘ ya ‘aisa lekh’ jo insan ke ”’bhatakte man”’ ko kabu kare aur us insan ke liye prerna ka marg dikaye to us se badkar to jiwan me koi cheez hi nahi h. kuchh insan to sath chhod dete hai par kitabe hamara sath kabhi nahin chhodti hai yehi hamari sachchi dost hoti hai .kuchh lekh aise hote hai jo jiwan ka maksad bta dete hai ki insan dunia me kyu aya h .iss lekh ko padkar aisa lga ki jaise ye vo hi sawal hai jo mere man me ate rahte hai mujhe bhi kitabo se bahut prem hai. jab bhi mai preshan hoti hu to mai apni kitabo me jo koi motivational kavita hoti hai ushi ko padkar phir se josh me aa jati hu ‘ i like very much this article’

  3. शुक्रिया शिवानी अपने विचार साझा करने के लिए। रचना की बात बिल्कुल सही है। बचपन के अनुभवों को याद करते हुए कभी लिखा था।

    “बालमन की तमाम जिज्ञासाओं को
    उड़ने के लिए आसमान बख़्शा था
    उन तमाम किताबों नें जिनका पढ़ना
    घर के लोगों की नजरों में भटकाने वाला था
    समय और संसाधन की बरबादी थी
    भाषा सिखाने में इन किताबों की
    भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है।”

    इन किताबों में कॉमिक्स, चंपक, नंदन, सुमन-सौरभ और लोटपोट जैसी पत्रिकाओं के नाम आते हैं। बड़े होने पर तो किताबों का दायरा धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता से शुरू होती है फिर कसप (मनोहर श्याम जोशी) से होते हुए प्रेम न बाड़ी ऊपजै (नामवर सिंह) से आगे बढ़ जाती है। इसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ आजतक जारी है। आवारा मसीहा, पीली छतरी वाली लड़की, बच्चों की भाषा और अध्यापक, एक अध्यापक की डायरी, गोदान, उसने कहा था जैसी किताबों से शुरू होकर आज भी जारी है। निरंतर पढ़ने और लिखने का वक्त निकाल ही लेते हैं। क्योंकि इसे फ़ायदे बहुत है।

  4. रचना जी , पूरी तरह सहमत हूँ आपसे। मुझे भी किताबो से प्रेम है इन्ही वजहों से।
    शिवानी यादव
    शिक्षक प्रशिक्षक

  5. Anonymous // July 9, 2017 at 11:40 am //

    ह्रदय स्पर्शी …..लेख साधुवाद…

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