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उत्तर प्रदेश: राजकीय इंटर कॉलेजों को किस तरह के सपोर्ट की जरूरत है?

तकरीबन 10-15 साल पहले उत्तर प्रदेश के राजकीय इंटर कॉलेजों और हाईस्कूल में प्रवेश के लिए सिफारिशें लगती थीं। मेरिट लिस्ट की प्रतीक्षा सूची में आने वाले छात्र-छात्राओं को लंबा इंतज़ार करना पड़ता था। वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थी बड़े गर्व से बताते थे कि हम उस राजकीय इंटर कॉलेज या राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में पढ़ते हैं। उन दिनों की याद दिलाती हुई जर्जर बिल्डिंग, किसी कोने में खड़ी विद्यालय की अपनी बस, लैब की खस्ताहाल स्थिति, लायब्रेरी में जमाने से बंद किताबें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि इन विद्यालयों  को सपोर्ट की जरूरत है।

सिर्फ़ नकल विहीन परीक्षा नहीं, अच्छी पढ़ाई भी जरूरी

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैइसके साथ ही यह सपोर्ट अल्पकालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक होना चाहिए। राजकीय विद्यालयों की यह स्थिति अचानक से नहीं आई है, कई सालों से नियुक्तियों का न होना, लैब और लायब्रेरी के लिए पर्याप्त धन का न मिलना, पढ़ाई से ज्यादा बोर्ड की परीक्षाओं पर फोकस होना, शिक्षक प्रशिक्षण के महत्व को एकदम से खारिज कर देने वाली सोच ने पूरी परिस्थिति के निर्माण में अलग-अलग योगदान दिया है।  इसमें बदलाव के लिए विभिन्न आयामों पर ध्यान देने और सुधार के रास्ते में आने वाली चुनौतियों को हल करने की जरूरत है।

आजकल विभिन्न इंटर कॉलेजों में सीसीटीवी कैमरे लग रहे हैं ताकि रोज़मर्रा की पढ़ाई की निगरानी संभव हो सके। इसके साथ ही परीक्षाओं को नकल विहीन बनाया जा सके। ताकि पढ़ने वाले छात्रों को मेरिट में आने का मौका मिले और बोर्ढ की विश्वसनीयता को भी कायम किया जा सके। पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण को फिर से मजबूत करने की जरूरत है। उन शिक्षकों को बतौर रिसोर्स पर्सन राज्य स्तर पर प्रशिक्षित करने की जरूरत है जो अपने-अपने ज़िलों को विभिन्न विषयों में सपोर्ट प्रदान कर सकें। ऐसी संभावनाओं को तलाशने और उनको क्रियान्वित करने की जरूरत है। वर्तमान सत्र में परीक्षाओं की तिथि घोषित हो जाने के बाद तो विद्यालयों में पाठ्यक्रम को समय से पूरा करने पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है।

अच्छी पढ़ाई हो और कॉलेज में दाख़िले के लिए टेस्ट अनिवार्य बने

छात्रों की संख्या और विद्यालय की छवि के बीच सीधा संबंध होता है। यह बात राजकीय विद्यालयों के संदर्भ में लागू होती है। अगर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की गुणवत्ता में सुधार होगा और प्रतियोगी परीक्षाओं में उनके सफलता के उदाहरण सामने आएंगे तो निश्चित तौर पर छात्रों के नामांकन में बढ़ोत्तरी होगी। नकल की संभावना वाले विद्यालयों में नामांकन बढ़ने का कारण, ज्यादा नंबर पाने और मेरिट में अव्वल रहने की ललक ही थी। अगर राज्य स्तर पर विभिन्न नौकरियों और कॉलेज व यूनिवर्सिटी में दाख़िले के लिए मेरिट की जगह टेस्ट को वरीयता मिले तो राजकीय विद्यालयों के प्रति नज़रिये में बदलाव संभव है।

शिक्षकों की संख्या में संतुलन जरूरी

जिले के विभिन्न राजकीय विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था सबसे जरूरी क़दम है। ख़ासतौर पर उन इंटर कॉलेजों में जहाँ पर 10-12 से कम शिक्षक हैं और बच्चे ज्यादा हैं। इसके बाद उन हाईस्कूल पर ध्यान देने की जरूरत है जो केवल 2-3 शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। इन विद्यालयों में पढ़ाई के लिए स्टाफ का अभाव लोगों के बीच राजकीय विद्यालयों के बारे में छवि को विपरीत ढंग से प्रभावित करता है, अतः ऐसे विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था जरूरी है। इसके लिए दो पाली में चलने वाले विद्यालयों में एक पाली में भी संचालित करने का विकल्प अपनाया जा सकता है जहाँ छात्रों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है।

प्रिंसिपल का होना है जरूरी

माध्यमिक स्तर पर विद्यालय को प्रशासनिक और शैक्षिक नेतृत्व देने की जिम्मेदारी विद्यालय के प्रधानाचार्य या प्रधानाचार्या की होती है। ऐसी स्थिति में विद्यालय का संचालन ज्यादा बेहतर ढंग से हो पाता है। इससे विभिन्न विषयों को पढ़ाने की जिम्मेदारी का बँटवारा अच्छे से हो पाता है और स्टाफ के बीच विभिन्न जिम्मेदारियों का बँटवारा सही तरीके से हो पाता है। विद्यालय स्तर से विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श जरूरी है ताकि सभी विद्यालयों की सामूहिक जरूरतों को प्राथमिकता और महत्व के आधार पर हल किया जा सके।

 

 

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