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क्या करें कि 5वीं के बच्चे 8वीं कक्षा की किताब पढ़ लें?

लायब्रेरी में अपने साथ के बच्चों को किताबें इश्यू करते छात्र।

राजस्थान में अपने सहपाठियों को किताब देती करती एक सरकारी स्कूल की छात्रा।

स्कूल में बच्चों का जब किताबों से लगाव विकसित होता है तो वे किताबों के पन्ने पलटना चाहते हैं और उनमें छपे चित्रों को देखना चाहते हैं। ऐसे ही अनुभवों से सरकारी स्कूलों में काम करने के दौरान गुजरना हुआ। पहली कक्षा के बच्चे, जो पहली बार स्कूल आ रहे हैं उनको किताबों में छपे आसपास के चित्रों को देखकर बहुत अच्छा लगा। वे मुझे किताबें लाकर दिखा रहे थे कि ये देखो ऑटो, हमारे गाँव में ऑटो चलती है।

लायब्रेरी में किताबों के लेन-देन का बहुत ज्यादा होना, एक अच्छा संकेत होता है कि बच्चों में पढ़ने की आदत की बुनियाद बन रही है। यह आदत बच्चों को पढ़ना सीखने के सफ़र की तरफ भी ले जाती है। किताबों को पढ़ने की शुरूआत चित्रों के पढ़ने से होती है। चित्रों की भी डिकोडिंग और समझना होता है। जिन चित्रों को बच्चे अपने परिवेश से जोड़कर देख पाते हैं, वे उनको समझ पाते हैं। जिन चित्रों को उन्होंने नहीं देखा होता है, उसके बारे में सिर्फ देखते हैं और हैरान होकर पूछते हैं कि ये क्या है?

पुस्तकालय में बच्चे अपनी पसंद को महत्व देना भी सीखते हैं

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भाषा शिक्षण के लिए दीवारों पर बना एक चित्र।

अगर विद्यालय के पुस्तकालय में किताबों की संख्या पर्याप्त हो तो बच्चे अपनी रूचि और पसंद के अनुरूप किताबों को चुनते हैं। वे उनको घर ले जाना चाहते हैं। अगर उनको आज़ादी मिले तो तो वे दो-तीन किताबें भी ले जाना चाहते हैं और ले भी जाती है। मगर इसके लिए हमें बच्चों को आज़ादी देनी पड़ती है। किताबों के चुनाव की उनकी क्षमता को विकसित करने का अवसर देना होता है। इस क्षमता के विकास का रिश्ता बच्चों के जीवन के अन्य पहलुओं से भी है। जो बच्चे अपने पसंद की किताबें चुन रहे हैं। कल को वे अपने पसंद के कपड़े भी चुनेंगे। पसंद का काम भी चुनेंगे। पसंद के निर्धारण में अपनी भूमिका को रेखांकित करके देखेंगे, इसलिए किताबों के चुनाव जैसी छोटी-छोटी बातों के महत्व को कम करके नहीं देखना चाहिए।

लायब्रेरी से बच्चों को अपने पठन कौशल के इस्तेमाल का अवसर मिलता है। वे पढ़ते-पढ़ते अपने अनुमान लगाने के कौशल को और पुख्ता बनाते हैं। एक समय ऐसा भी आता है, जब वे बहुत सी मात्राओं व अक्षरों को पढ़ना ख़ुद से सीख जाते हैं। बच्चों के लिए लायब्रेरी, भाषा के लैब की तरह होती है। बतौर शिक्षक हमें ध्यान रखना चाहिए कि भाषा की इस प्रयोगशाला यानि पुस्कालय की किताबों पर धूल न जमी हो। किताबें आलमारी में क़ैद न हों। किताबों के लेन-देन वाला रजिस्टर कई महीनों से बग़ैर इंट्री के न पड़ा हो। किसी अधिकारी के पूछने पर यह न कहना पड़े कि छोटे बच्चे किताब संभाल नहीं पाते हैं। उनसे किताबें फट जागी, इस कारण से हम उनको किताबें नहीं देते। बच्चों के हाथ में किताबें हों और चेहरे पर ख़ुशी हो, यह सपना हर शिक्षण के विद्यालय में साकार हो तो भारत में ज़मीनी स्थिति का कायापलट हो सकता है। ऐसे में स्थिति में सुधार का स्तर यह भी हो सकता है कि पाँचवी का बच्चा आठवीं कक्षा की किताब पढ़ रहा हो। मगर ऐसी उपलब्धियों का रास्ता लंबी तैयारी से होकर जाता है।

बड़ी उपलब्धि चाहते हैं तो बड़े सपने देखें

techer-dressहमारे सपने बड़े होने चाहिए, तभी तो हमारी उपलब्धियां बड़ी होंगी। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे सपनों की दरकार है। हमारे पास कोई सपना ही नहीं है, ऐसा लगता है कभी-कभी। हम हमेशा न्यूनतम की बात करते हैं कि बच्चों का अधिगम स्तर न्यूनतम तो इतना होना चाहिए। मगर असली सवाल तो यह होना चाहिए कि अधिगम कितना हो सकता है और उसको हासिल करने के लिए हमें और क्या करने की जरूरत है।

यह पोस्ट इसी उम्मीद से लिखी गई है कि हम शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव का स्वप्न देखने वाले साथियों को बड़े सपने भी देखने चाहिए ताकि हम प्रतिबद्धता के साथ बड़े लक्ष्यों को हासिल करने का सपना साकार कर पाएं। उन्हीं सपनों में से एक सपना है कि ऐसी कोई रिपोर्ट पढ़ने को मिले कि पाँचवीं के बच्चे पढ़ते हैं आठवीं कक्षा की किताब। दूसरी कक्षा के बच्चों को मैंने खुद पाँचवीं की किताब पढ़ते देखा है, एक सरकारी स्कूल में इसलिए मेरा तो ऐसे सपनों और ऐसी सकारात्मक सोच में पूरा भरोसा है। क्या आप भी इस भरोसे को साझा करते हैं? अगर हाँ तो हमारे साथ आप भी साझा करिए, अपने उन ‘बड़े सपनों’ को जो आप शिक्षा के क्षेत्र में सच होते हुए देखना चाहते हैं।

 

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