Trending

शिक्षा विमर्श: ‘500 में 499…? नहीं, यह ठीक नहीं है।’

मगध विश्वविद्यालय में बतौर एसोसिएट प्रोफ़ेसर काम करने वाले हेमंत कुमार सीबीएसई के जारी परीक्षा परिणाम का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि 500 में 499…? नहीं, यह ठीक नहीं है। आखिर, यह बारहवीं की परीक्षा है। विस्तार से पढ़िए, पूरा विश्लेषण।

संपूर्णता का भ्रम रचते परीक्षा परिणाम

CBSE की बोर्ड परीक्षा में टॉपर के ठीक बाद के कई बच्चों को भी लगभग इतने ही मार्क्स मिलें हैं। संपूर्णता का भ्रम उत्पन्न करते ऐसे परीक्षा परिणाम इस तथ्य को नेपथ्य में डाल देते हैं कि हमारे बच्चों की तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता के विकास पर उचित ध्यान नहीं दिया जा रहा।

इतिहास में शत प्रतिशत, मनोविज्ञान में शत प्रतिशत…। क्या यही इतिहास शिक्षण का तरीका है हमारे स्कूलों का? भाषा और साहित्य के पेपर्स में 99 प्रतिशत। पता नहीं, कितनों को हिंदी, अंग्रेजी में शत प्रतिशत मार्क्स आए हों। 26 मई को जारी सीबीएसई के रिजल्ट ने बहुत सारे ऐसे लोगों को भी इस बिंदु पर सोचने को विवश कर दिया है, जो शिक्षा शास्त्री नहीं हैं।

शत-प्रतिशत नंबर हासिल करने के मायने क्या हैं?

वस्तुनिष्ठता के साथ तार्किकता और विश्लेषणात्मकता का समावेश होना ही चाहिए। लेकिन, हमारी स्कूली शिक्षा इसे हतोत्साहित करती है। सूचना ही अभीष्ट नहीं है, इसका विश्लेषण भी आवश्यक है। हद से ज्यादा वस्तुनिष्ठता ज्ञान को सूचना मात्र में बदल देती है, जबकि सूचनाओं पर तार्किक विचार की जरूरत भी होती है।

परीक्षाओं में अगर ऐसे भी सवाल पूछे जाएं जिनके उत्तर में बच्चों को सोचना पड़े, विचारना पड़े, सूचनाओं को विश्लेषित करना पड़े तो वे एक अधिक सजग नागरिक के रूप में विकसित हो सकते हैं। हां, तब वे इतिहास, अर्थशास्त्र, भाषा, साहित्य आदि विषयों में शत प्रतिशत मार्क्स नहीं ला पाएंगे। लेकिन…तब 85-86 प्रतिशत मार्क्स का भी मान होगा। आज तो हालत यह है कि 90 प्रतिशत मार्क्स लाने वाला मीडियॉकर माना जा रहा।

दरअसल, व्यवस्था की इस प्रवृत्ति को व्यापक संदर्भों में देखने-समझने की जरूरत है। सूचनाओं के विश्लेषण की क्षमता का विकास, उन पर तर्क कर सकने की क्षमता का विकास अंततः व्यवस्था को ही चुनौती देगा। किशोर होते बच्चे और युवा होते किशोर अगर तर्क करने लगें, विश्लेषण करने लगें तो सूचनाओं में अंतर्निहित वे तथ्य भी उधड़ सकते हैं जो व्यवस्था नहीं चाहती। तर्क करता युवा, विश्लेषण करता युवा व्यवस्था, यानी कि सिस्टम के लिये खतरा हो सकता है। हद से ज्यादा वस्तुनिष्ठता इन खतरों को कम करती है।

कुछ जरूरी सवाल

जो शिक्षा और परीक्षा प्रणाली है वह “क्रैश कोर्स” टाइप के हास्यास्पद स्लोगन देने वाले कोचिंग संस्थानों को फलने-फूलने के असीम अवसर देती है, बच्चों को रट्टामार बनने के लिये प्रोत्साहित करती है जबकि…कल्पनाशक्ति सम्पन्न बच्चों को हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

हमारी शिक्षा-परीक्षा प्रणाली व्यवस्था के लिये भले ही अभीष्ट और मुफीद हो, देश, समाज और सभ्यता के लिये ठीक नहीं, भावी पीढ़ियों के व्यक्तित्व निर्माण के व्यापक संदर्भों में ठीक नहीं। यह सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को सामने नहीं आने देती। इस पर सवाल उठने चाहिए।

( हेमन्त कुमार झा मगध विश्वविद्यालय के एम डी कॉलेज, नौबतपुर पटना के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। शिक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर आप निरंतर लिखते रहते हैं।)

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x