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रविवार, 18 अक्टूबर 2026

किताबों के प्रति इतनी उदासीनता क्यों है?

भारत में पुस्तक संस्कृत के विकास की बाधाएं और रास्ते क्या हैं, पढ़िए इस पोस्ट में।

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किसी स्कूल में किताबों को भेजने की तैयारी हो रही थी। इस तैयारी से और स्कूलों में किताबों की मौजूदगी से जिस व्यक्ति का कोई लेना-देना भी नहीं था, उनकी तरफ से एक अनायास सी टिप्पणी आयी कि स्कूलों में इतनी किताबें भेजकर क्या फ़ायदा है? बच्चे तो किताब पढ़ते ही नहीं हैं।

ऐसी ही टिप्पणी हमें आमतौर पर स्कूलों में पुस्तकालय कालांश के लिए होने वाली चर्चा और आलमारी में बंद किताबों को बच्चों को देने की गुजारिश के दौरान भी सुनने को मिलती है। इस अनायास सी टिप्पणी के मूल में क्या है?

किताबों से जुड़ाव के रास्ते क्या हों?

इस सवाल के उत्तर की अभिलाषा में सहज ही उठती है, क्योंकि मैं भी इसी तरह के सवालों से दो-चार हो रहा हूँ कि किताबों के प्रति लोगों का ध्यान कैसे खींचा जाए? किताबों का बच्चों के लिए सतत इस्तेमाल करने के लिए उनको कैसे प्रेरित किया जाये?

ऐसे सवाल हमें कभी पाठ्यपुस्तकों की तरफ खींचकर ले जाते हैं। तो कभी समाज की उस मनोवृत्ति की तरफ जहाँ हर काम प्रत्यक्ष लाभ की आकांक्षा से करने की वक़ालत निरंतर होती रहती है। मिशाल के तौर पर पाठ्यपुस्तकें पढञने से पास-फेल का हिसाब होता है। बोर्ड परीक्षा में नंबर मिलते हैं। ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या हासिल जो न तो नंबर दिलाती हैं और न ही जिनसे जुड़े सवाल परीक्षा में पूछे जाते हैं। बच्चों के लिए इस महत्व का निर्धारण शिक्षकों व अभिभावकों द्वारा अनायास ही होता रहता है, उनके सवाल और उनके प्रोत्साहन में लाइब्रेरी के किताबों की प्राथमिकता से बहुत कुछ तय होता है।

इसीलिए लाइब्रेरी की किताबों को बच्चों के हाथों में पहुंचने का मौका मिले, इसके लिए सायास प्रयास करने की जरूरत है ताकि ऐसी अनायास टिप्पणी वाली जड़ मानसिकता में थोड़ा लचीलापन लाया जा सके।

आख़िर में एक सबसे ग़ौर करने वाली बात के साथ हम इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं कि बच्चों में किताबों से जुड़ाव की सहज अभिलाषा है। लेकिन उनको ऐसे अवसर और माहौल देने की जरूरत है जहाँ वे किताबों के साथ एक जुड़ाव का भाव विकसित कर सकें। उनके साथ समय बिताने को एक जरूरी और महत्वपूर्ण आदत के रूप में देख और महसूस कर सकें। ऐसे ही माहौल से किताबों के प्रति उदासीनता वाले माहौल में बदलाव की थोड़ी सी उम्मीद नज़र आती है। इस मुद्दे पर आपके विचार क्या हैं? लिखिए इस पोस्ट में टिप्पणी के तौर पर ताकि अन्य साथी भी उससे जुड़ सकें और आपके सवाल का जवाब दे सकें।

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Dr.manju sharma
Dr.manju sharma
8 years ago

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में केवल पाठ्यपुस्तकें पढ़ने पर जोर दिया जाता है चूँकि वह परीक्षा में उतीर्ण होने का आधार है | इससे बालकों में भी केवल रटंत पद्धति का विकास ही होता है | विद्यार्थियों में बचपन से ही किताबें पढ़ने की ललक जगानी चाहिए क्योंकि पुस्तकें सच्ची मित्र होती हैं इसमें कोई संदेह नहीं | किताबों से जीवन की समझ बढ़ती है | समस्याओं के समाधान खोजने में मदद मिलती है | दुर्भाग्य है कि शिक्षक को केवल पाठ्यक्रम पूरा करवाना है तथा छात्र को परीक्षा पास करनी है | ऐसे में जीवन मूल्य से वंचित हो जाते हैं | आए दिन अप्रिय घटनाएं सुनने एवं देखने को मिलती हैं| क्या यह धर्य, सहिष्णुता, आत्मीयता का खोना नहीं है ? किताबें पढ़ने से देश, समाज के प्रति नई सोच विकसित होती है ,पाठक का आत्मबल बढ़ता है | विद्यालयों में किताबें पढ़ने की प्रवृति को बढ़ाने से ही बच्चा उसका आस्वादन कर पाएगा | अभिभावकों को भी चाहिए कि उपहार स्वरूप महँगे स्मार्ट फोन … आदि न देकर पुस्तकें भेंट करें तभी बच्चा उसका महत्व जान पाएगा | किताबों से भाषा के प्रति रुझान बढ़ता है | अत: छात्रों में किताबें पढ़ने की ललक जगानी जरुरी है |

लेखक

वृजेश सिंह

संस्थापक-संपादक, एजुकेशन मिरर

Founder of EducationMirror.org and education leader with 10+ years of experience driving impactful FLN and system-level reforms, combining field insights and program expertise from organizations like Piramal Foundation, STIR Education, Tata Trusts, Room to Read, BBC Hindi, and Azim Premji Foundation.

Through EducationMirror.org, I aim to bridge the gap between classroom realities and scalable solutions by curating practitioner-driven insights, strengthening foundational literacy and numeracy (FLN), and amplifying voices from the field to influence practice and policy.

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