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स्कूल और कॉलेज में किताबों की जगह गाइड्स क्यों ले रही हैं?

शिक्षा के विमर्श में बाजार भी है। पर वह केंद्र और परिधि के बीच घूमता रहता है। वह एक सवाल होकर भी सवालों से बचा रहता है। क्योंकि वह कई ब्रैंड का विकल्प देकर भी हमें विकल्पहीन बनाने के जुगाड़ में सतत लगा रहता है। उसके असर को समझना, उसके दुष्प्रभाव को रेखांकित करने और वर्तमान व भविष्य के सवालों पर निगाहें टिका कर रखना जरूरी है। जैसे पासबुक और गाइड्स का सवाल परिधि का प्रश्न है। पर वह इतना ताकतवर हो चुका है कि पाठ्यपुस्तक की जगह ले चुका है।

तीसरी से एमए तक की पढ़ाई गाइड्स भरोसे

स्कूल और कॉलेज में किताब के बिना भी केवल गाइड्स से काम चल सकता है और चल भी रहा है। शिक्षक व बच्चे दोनों सवालों के जवाब के लिए इन पर निर्भर हैं, या हो रहे हैं। अधिकांश को इस परिस्थिति से कोई शिकायत नहीं है। हाँ कुछ लोग इस माहौल में विकल्प खोजने की छटपटाहट के साथ संघर्ष कर रहे हैं। तीसरी कक्षा से बीए और एमए तक कि पढ़ाई जिस देश मे गाइड्स के भरोसे हो रही हो, वहां नवाचार और उच्च स्तर के चिंतन की क्षमता की बजाय जुगाड़ ही सिरमौर होगा।

हमारे देश में पासबुक उद्योग करोड़ों का है। इसके विज्ञापन अखबार के पूरे पेज पर छपते हैं। यह स्थिति एक संकेत है पढ़ने की संस्कृति के संकट का, पढ़कर समझने की बजाय रट्टा मारने में आसानी महसूस करने वाली पीढ़ी के निर्माण का और स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक में शिक्षक व प्रोफेसर से परीक्षा के सवाल का जुगाड़ करने की मनोवृत्ति का। बाकी का मैनेजमेंट इंटरनल परीक्षा के नम्बर कम होने के डर से सवाल न पूछने वाली स्थिति कर देती है।

जहाँ हर बच्चे की पसंदीदा मिठाई रसगुल्ला है

यह हाल गाँव के कॉलेज से लेकर नामचीन यूनिवर्सिटी तक पसरी है। ऐसे माहौल में भी पाठ्यक्रम पूरा करने वाले और सवालों के जवाब तक जाने की तैयारी में भरोसा पैदा करने वाले शिक्षक उम्मीद की रौशनी की तरह जगमगाते हैं। और गाइड्स का बाजार एक ऐसी स्थिति पैदा कर रहा है जहाँ कक्षा के हर बच्चे की पसंदीदा मिठाई पासबुक में लिखी रसगुल्ला होती है। यह स्थिति हमारे सोचने की क्षमता को सीमित करने और उसे विकल्पहीन बना देने की तैयारी भर है। हम एक ऐसे माहौल के लिए तैयार किये जा रहे हैं, जहाँ हमारा काम केवल निर्देशों का पालन करना भर होगा। सोचने का काम और आदेश देने का काम कोई और करने वाला है।

शिक्षा का एक मूल उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन की योग्यता और क्षमता का विकास है। उपरोक्त परिस्थिति इस राह में एक बड़े रोड़े के रूप में खड़ी नज़र आती है। जिसे राह से खिसकाने की जरूरत किसी को महसूस नहीं हो रही है। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में रट्टा मार-मार कर टैंकर फुल करने वाली स्थिति रटी हुई चीज़ों को ज्यों का त्यों दोहराने की क्षमता को बढ़ावा दे रही है। यह छात्र-छात्राओं के भीतर नंबर वन बनने की दौड़ में बहुत सारी जरूरी चीज़ों पर ग़ौर करने की जरूरत को ग़ैर-जरूरी बना रही है।

केवल गाइड्स के ऊपर निर्भर होना हमें समाज का एक ऐसा नागरिक बना रहा है, जिसने चीजें रटी भर हैं। जिसे समझने का मौका ही नहीं मिला। ऐसा नागरिक समझने के लिए संचार के अन्य साधनों पर निर्भर होगा और जब वे साधन किसी अन्य के एजेंडे पर संचालित हो रहे हैं तो हम दूसरों के एजेंडे पर चलने वाले खिलौने बनकर रह जाएंगे। ऐसे माहौल में स्व-विवेक की गुंजाइश बहुत सीमित हो जाती है। इसलिए जरूरत है कि हम सोचने, समझने, विचार-विमर्श करके खुद से सवालों का जवाब खोजने की परेशानी उठाएं, वर्ना हम हर लिखित सामग्री को समझने के लिए दूसरों के ऊपर निर्भर रहेंगे। शब्दों के फन में माहिर लोग आपकी इस कमज़ोरी का फायदा उठाएंगे और आपको ठगने के नए-नए तरीके ईजाद करेंगे।

इस बारे में आप क्या सोचते हैं, साझा करिए एजुकेशन मिरर के साथ।

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