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लाइब्रेरी कैंपेनः ‘पधारो म्हारे पुस्तकालय’ अभियान का एक ज़मीनी अनुभव

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विद्यालय में बच्चों के साथ फेलो अन्नू झा।

राजस्थान के झुंझनू जिले में स्थित अलसीसर ब्लॉक के आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय रामपुरा में पिरामल फाउण्डेशन की फेलो अन्नू झा लाइब्रेरी की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही हैं। इस पोस्ट में उन्होंने विद्यालय में काम करने का अपना अनुभव एजुकेशन मिरर के साथ शेयर किया है। लाइब्रेरी कैंपेन के तहत झुंझनू और अलसीसर ब्लॉक के 60 स्कूलों का चुनाव किया गया है, जिसमें शुरुआती चरण में 10 स्कूलों को मॉडल स्कूल के रूप में तैयार किया जा रहा है। लाइब्रेरी कैंपेन के तहत फेलोज़ ने मिलकर क्राउड फंडिंग के जरिये लाइब्रेरी में किताबों और प्रिंट समृद्ध वातावरण बनाने के लिए पैसे जुटा रहे हैं। उनकी इस मुहिम को समुदाय व विद्यालयों की तरफ से अच्छा समर्थन मिल रहा है।

‘प्रिंट समृद्ध वातावरण और फंक्शनल लाइब्रेरी’ का लक्ष्य

इस अभियान के तहत विद्यालयों में प्रिंट समृद्ध वातावरण और लाइब्रेरी को फंक्शनल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले 19 महीनों से हमने शिक्षकों की क्षमतावर्धन, आनंददायी अधिगम, शिक्षकों की प्रोफेशनल लर्निंग कम्युनिटी बनाने, नो बैग डे के सक्रिय संचालन और वर्तमान में लाइब्रेरी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए अलसीसर ब्लॉक के 34 आदर्श/राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में काम कर रही हूँ। आदर्श विद्यालयों के प्रधानाध्यापक वर्तमान में पंचायत प्राथमिक शिक्षा अधिकारी (पीईईओ) के रूप में भी काम कर रहे हैं।

20180613_1205421555977954.jpgलाइब्रेरी कैंपेन (पधारो म्हारे विद्यालय) के सिलसिले में प्रधानाध्यापक महेन्द्र सिंह और शिक्षक होशियार सिंह ने काफी सहयोग किया। हमारे सामूहिक प्रयास और टीम भावना के साथ मिलकर किया गया प्रयास रंग ला रहा है। इस विद्यालय में जहाँ रंग-बिरंगे चित्र पुस्तकालय की दीवारों की सुंदरता बढ़ा रहे हैं,  वहीं पुस्तकालय के दरवाजे पर राजस्थानी अंदाज में “पधारो म्हारे पुस्तकालय” पाठक को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। इस आकर्षण को जिनकी मौजूदगी से सार्थकता मिलनी है, वे हैं इस विद्यालय के ऊर्जावान और सक्रिय बच्चे। हमने उनके साथ बातचीत के बाद इस अभियान को आगे बढ़ाने और मिलकर लाइब्रेरी को व्यवस्थित करने और नियमित किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का काम किया। मैंने बच्चों से पूछा, “आपको पता है आप यहाँ क्यों बैठे हो?” किसी ने ‘नहीं’ में उत्तर दिया, किसी ने बताया कि पुस्तकायलय में रखी किताबों को सही तरीके से रखना है।

बच्चों ने बताया पुस्तकालय का महत्व

मैंने पूछा “अच्छा बच्चों आपको क्या लगता है पुस्तकालय क्यों ज़रूरी है?” कुछ देर की चुप्पी के बाद ढेर सारे जवाब आए| किसी ने कहा की “पुस्तकालय से हमे हर विषय का ज्ञान मिलता है”, “ पुस्तकों में बड़ी प्रेरणादायक कहानियां होती हैं जो हमारी मार्गदर्शक के तरह काम करती हैं” और भी बहुत सारे जवाब बच्चों की तरफ से मिले। पर इन जवाबों के बीच एक जवाब ऐसा भी जिसकी मैंने तो कल्पना नहीं की थी वो था, “पुस्तकालय हमारे पढ़ने के कौशल को बढ़ता है।” है न बड़ा ही रोचक जवाब?

WhatsApp Image 2019-01-24 at 22.35.30मैं और आप स्कूल के बच्चों से ऐसे उत्तर की शायद ही अपेक्षा करें। आमतौर पर ऐसे जवाब शिक्षक प्रशिक्षण में शिक्षकों व शिक्षक प्रशिक्षकों की तरफ से लाइब्रेरी पर होने वाली चर्चा में मुखर होकर सामने आता है। बच्चों के साथ लगभग 45 मिनट की बातचीत के बाद हम पुस्तकालय में गये, वहाँ जाते ही लगभग २००० से ज्यादा पाठ्यपुस्तकों पर हमारी नज़र पड़ी, थोड़ी आशंका हुई कि इन सबको व्यवस्थित करने का काम कैसे होगा? पर होनहार बच्चों बिना तनिक भी देर न किये फटाफट हमारे साथ एक योजना बनाई कि हम काम को कक्षा के स्तर से बाँट लेते हैं, जैसे की कक्षा 9, 10, 11, और 12 किताबों को कक्षा के अनुसार छांट कर कक्षा 5, 6, 7, 8 के बच्चों को देंगे और वे कक्षा के अनुसार किताबों के बंडल तैयार करेंगे।

ऐसे हुई ‘लाइब्रेरी रूम’ की सफाई

अपनी अपनी किताबों के लिए लाइन बना कर “कक्षा 1 कक्षा 1 , कक्षा 5 कक्षा 5” बोल बोल कर बच्चे अपने जिम्मे आई किताबों को इकठ्ठा कर रहे थे| सच में ये दृश्य बड़ा रोचक था, जहाँ किताबों पर सालों की धूल जमी थी और उन किताबों को बच्चे इतने रोचक अंदाज में छांट रहे थे। सच में ऐसे नीरस काम में भी बच्चों ने मुस्कान की छटा बिखेर कर ये तो साबित कर दिया था की इनका बचपन खुल कर सांसे ले रहा है।

धीरे- धीरे कर सभी ने टीम वर्क की मिशाल पेश करते हुए पूरे पुस्तकालय के रद्दी अख़बार, किताबों, धूलों का मानो सफाया ही कर दिया हो। दो घंटे लगातार काम करते रहे, किसी ने मेज़ और आलमारी की सफाई कर उसमे क्रमवार तरीके से किताबें सजा दीं तो किसी ने वर्षों से पड़े हारमोनियम को साफ़ कर उसकी धुन भी बजाना शुरू किया।

देखते ही देखते पुस्तकालय का कमरा और निखर उठा था, कुल मिलाकर एक मजेदार दिन था। स्कूल की छुट्टी तो हो गई थी पर बच्चे मिशन पर तैनात थे, इसी बीच उनके काम को सराहना देते हुए वहां की अध्यापिका ने बच्चों PARLE –G बिस्कुट खिलाया, हाँ वही G for GENIUS वाली बिस्कुट। आज मैं प्रत्यक्षदर्शी रही: बच्चों की टीम भावना , मैनेजमेंट, समूह में काम करने की क्षमता, सकारात्मकता और साथ ही साथ कभी न ख़त्म होने वाली असीमित उर्जा की| सच ये बच्चों के भीतर ही देखना संभव है , जरुरत है इनकी उर्जा को सही दिशा देने और साथ मिलकर प्रोत्साहित करने की।

अगली पोस्ट में मैं आपको लाइब्रेरी को व्यवस्थित करने और उसे जीवंत बनाने के अनुभवों को साझा करूँगी। इस पोस्ट के बारे में आपकी क्या राय है, जरूर साझा करें।

(अन्नू झा वर्तमान में पिरामल फाउण्डेशन में फेलो के रूप में राजस्थान के झुंझनू जिले में काम कर रही हैं। आपने पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद शिक्षा के क्षेत्र में ज़मीनी बदलाव के लिए प्रयासरत हैं।)

 

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