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वर्तमान संदर्भ में शिक्षक बनने या होने के मायने क्या हैं?

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एक प्रतीकात्मक तस्वीर। बच्चों के साथ संवाद करते हुए शिक्षक।

नितेश वर्मा शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार चिंतन करने और सोचने वाले युवा लेखकों में से एक हैं। इस लेख में उन्होंने शिक्षक होने का अर्थ क्या है, इस सवाल को केंद्र में रखते हुए अपने विचार व्यक्त किए हैं। पढ़िए यह पोस्ट और साझा करिए अपनी राय।

क्या है एक शिक्षक होना? एक शिक्षक होने का मतलब क्या है? कहने को तो कोई परीक्षा पास कर किसी स्कूल में नियुक्ति पा जाने भर से व्यक्ति शिक्षक हो जाता है। लेकिन यह तो शिक्षक बनने की ओर बढ़ा पहला कदम भर है। तो फिर एक शिक्षक बनने या होने का आशय क्या है? विचार करें, तो लगता है कि शिक्षक होना कोई मंज़िल नहीं, जिस स्थिति में आकर कहा जा सके कि मैं शिक्षक हो गया या बन गया। शिक्षक होना तो सतत बहने वाली धारा की तरह है।

इसे विस्तार से समझें तो एक शिक्षक के लिए किसी तरह की जड़ता ठीक स्थिति नहीं है। यानी एक शिक्षक को निरंतर खुद सीखने की प्रक्रिया में होना पड़ेगा। स्वयं के सीखने की ज़िम्मेदारी महसूस करनी होगी। और इस सीखने का उद्देश्य उन बच्चों के सीखने में मदद करना होगा, जिनकी ज़िम्मेदारी उनके ऊपर है। अगर इस उद्देश्य से शिक्षक खुद सीखने की प्रक्रिया में संलग्न है, तो अच्छा है। लेकिन बेहतर स्थिति तब होगी, जब हमेशा कुछ नया सीखते रहना, इसके लिए प्रयास करते रहना उसका आनंद और संतोष होगा, ठीक से कहें तो स्वभाव होगा। ऐसी स्थिति में सीखना उसके व्यक्तित्व विकास में तो सहायक होगा ही, उसके शिक्षण कार्य से भी जुड़ा होगा।

कहाँ से आती है सीखने की ललक?

एक महत्वपूर्ण सवाल कि सीखने की ऐसी ललक हममें आती कैसे है? क्या है जो एक शिक्षक को लगातार सीखने के लिए प्रेरित कर सकता है? कुछ शिक्षक ऐसे हो सकते हैं, जिनका स्वभाव ही सीखते रहने का हो। कुछ अन्य शिक्षक ऐसे हो सकते हैं, जो अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी या निष्ठा की वजह से कुछ सीखते रहना चाह सकते हैं, ताकि अपने काम में उन्हें मदद मिले। यदि किसी अच्छे शिक्षक के मन को कुरेदें, तो हम वहाँ एक नैतिक उद्देश्य पाएंगे। यह नैतिक उद्देश्य बच्चों के प्रति उनकी जवाबदेही से जुड़ा होगा।

ध्यान देने वाली बात है कि कर्तव्य की इस विवशता के परे वह अनिवार्य तत्व क्या है, जो एक शिक्षक को शिक्षक बनाता है, जो उसे लगातार सीखते रहने की प्रक्रिया में बनाए रख सकता है? मेरे विचार में वह सबसे ज़रूरी बात सभी बच्चों (बिना किसी भेदभाव के) के प्रति स्नेह का भाव है, उनकी तहेदिल से परवाह करना है। उनके साथ होने, उनकी ज़िंदगी के लिए कुछ अच्छा करने, उनके हर तरह के विकास में मदद करने, उनका सीखना सुनिश्चित करने में एक भीतरी खुशी महसूस करना है। यदि ऐसा नहीं है, तो एक शिक्षक होने की अभी शुरुआत भी नहीं हुई।

‘बच्चों की परवाह’ कहाँ से आती है?

लेकिन बच्चों की ऐसी परवाह किसी व्यक्ति में आती कैसे है? क्या यह स्वभावगत संवेदनशीलता का मसला है या बच्चों के प्रति हमारे नज़रिए से जुड़ी बात है? शायद यह एक-दूसरे की पूरक है। अगर मैं स्वभाव से ही संवेदनशील हूँ, तो कुछ भी नया सीखने-सिखाने में बच्चों के जीवन का विकास, उनका भला देख और महसूस कर पाउंगा। ऐसा होने पर बच्चों के हित के लिए सोचना, उनके विकास के लिए पूरा प्रयास करना और इसके लिए स्वयं सीखते रहना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होगी।

या फिर अगर बच्चों के प्रति मेरा नज़रिया व्यापक है तो हर एक बच्चे में मैं आने वाली पूरी पीढ़ी और उनके विकास में पूरे समाज, देश और मनुष्य जाति का विकास देख सकूंगा। ऐसा होने पर स्वाभाविक रूप से मैं उनके सीखने की ज़रूरतों और कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील हो जाऊंगा। और यह मुझे खुद भी सीखते रहने के लिए प्रेरित करेगी।यदि बच्चों के प्रति ऐसा व्यापक नज़रिया, संवेदनशीलता, उनसे स्नेह, उनकी परवाह एक शिक्षक के भीतर है तो उसके वास्तविक अर्थ में शिक्षक होने या बनने की पहली अनिवार्य शर्त पूरी होती है। यह सब किसी शिक्षक में कैसे विकसित हो, यह अलग प्रश्न है। और इनसे परे शिक्षक की जानकारी, समझ, क्षमता, व्यवहार और अन्य परिप्रेक्ष्य के सवाल तो हैं ही।

(इस पोस्ट के लेखक नितेश वर्मा पूर्व पत्रकार हैं और वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में राजस्थान के जालौर जिले में कार्यरत हैं।)

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