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21वीं सदी में शिक्षा: शिक्षक की प्रतिबद्धता, स्वायत्तता और मिशन का भाव शिक्षा में बदलाव लेकर आयेगा

शिक्षा पर होने वाले किसी भी विमर्श में ज़मीनी सच्चाइयों और सैंद्धांतिकी का साथ-साथ मौजूद होना बड़ी अहम बात है। आमतौर पर जहाँ ज़मीनी अनुभवों की बात होती है, वहां सिद्धांत के लिए जगह नहीं होती। केवल प्रेक्टिस और व्यावहारिक चुनौतियों व सफलताओं की चर्चा होती है। मगर इस संदर्भ में वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार ‘21वीं सदी में विद्यालयी शिक्षाः बदलते आयाम, हस्तक्षेप और उभरते विकल्प’ कई मायनों में अलग था। इसका आयोजन 6 से 8 अप्रैल के बीच हिंदी शिक्षण अधिगम केंद्र और शिक्षा विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

इसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षा विभाग के वक्ताओं के साथ-साथ वैकल्पिक स्कूलों का संचालन करने वाले और शिक्षा में टेक्नोलॉजी के माध्यम से हस्तक्षेप और भावी विकल्प की संभावनाओं को साकार करने वाले लोग भी मौजूद थे।

टेक्नोलॉजी वाले सेक्शन वाले ‘स्वयंप्रभा’ चैनल के कार्यक्रमों और एजुकेशन मिरर पर होने वाले लेखन का भी जिक्र हुआ कि 21वीं सदी की शिक्षा में टेक्नोलॉजी की मौजूदगी, असर और महत्व तो खारिज नहीं किया जा सकता है। मगर हमें भारत के संदर्भ में यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि टेक्नोलॉजी ऐसी हो जो शिक्षकों का सहयोग करे, न कि उनका विकल्प बनने की कोशिश करे।

‘शिक्षा में मिशन का भाव है जरूरी’

सेमीनार की अवधारणा का मूल वक्तव्य देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आनंद प्रकाश ने कहा, “बीज जब खुद को खो देता है, तभी नये पौधे का जन्म होता है। शिक्षा पर विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवों पर सार्थक चर्चा हो, चुनौतियों को रेखांकित किया जाये। यह भी देखा जाए कि हमारी चुनौती वास्तविक है या आभासी। शिक्षा के उद्देश्य क्या सदैव एक से रहते हैं, या शिक्षा के उद्देश्य भी समय-समय पर बदलते रहते हैं, शिक्षा आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी और कौशलों का विकास का एक जरिया भी है।’

उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “क्या शिक्षा का उद्देश्य मुक्ति है, अगर हाँ तो इस मुक्ति का अभिप्राय क्या है? क्या शिक्षा का अर्थ सार्वजनिक व निजी सत्यों की तलाश है। शिक्षा के साथ एक मिशन का भाव होना जरूरी है, क्योंकि अगर शिक्षा से ही आदर्श चले गये तो हमें कैसे पता चलेगा कि हम जो कर रहे हैं वह किस दिशा में जा रहा है। कुछ आदर्श ज़िंदा रहेंगे, तभी हमें पता चलेगा कि हमारी व्यावहारिकता किस दिशा में जा रही है।”

इसी चर्चा में परंपरा के गतिशील संप्रत्यय होने की बात कही गई कि हमारा एक पाँव ज़मीन पर रहे, तो दूसरा आगे बढ़ने को तत्पर रहे। यही स्थिति हमारे गतिशील और जीवंत बने रहने के लिए श्रेयस्कर है।

सेमीनार में वैकल्पिक शिक्षा में होने वाले प्रयोगों को मुख्य धारा की शिक्षा के साथ सतत संवाद की प्रक्रिया में बने रहने और एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी की बजाय पूरक की भूमिकाओं में देखने का अनुरोध भी किया गया ताकि भविष्य की स्पष्ट राह खोजी जा सके।

‘हमारा काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करना भर नहीं है’

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र ने इस सेमीनार के शुरू में कहा, “व्यवस्थित ढंग से अपने से पार जाने की क्षमता का विकास हो, इसके लिए विद्यालयी शिक्षा में प्रयास हो यह जरूरी है।”

संस्थागत रूप देने की कुछ मजबूरियों को हमें अपनाना पड़ता है। अगर शिक्षा, शिक्षण व सीखने को हम क्रिया मानते हैं तो हम करते कैसे (प्रक्रिया) हैं, इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है।

हमारा काम ज्ञान के नीर से पानी का लोटा भरना या पाठ्यक्रम पूरा करना भर नहीं होना चाहिए। क्योंकि व्यवहारिक समस्या है कि लोगों के पास डिग्री है, मगर काम करने नहीं आता है।

मेमोरी के बारे में हमने जो सुना है, उसको भी जब बताते हैं तो कुछ जोड़कर बताते हैं। यानि इसमें भी निर्माण और पुनर्निर्माण होता है। संस्थाओं के स्वरूप में थोड़ी लचीलापन जरूरी है तभी हम शिक्षा को उसकी जकड़बंदी से मुक्त करने के सवाल को हल कर पाएंगे।

शेष विस्तार से पढ़िए अगली पोस्ट में।

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