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कविताः ‘सुबह से लेकर शाम तुम्हारी, होती है विज्ञान से प्यारी’

जो ऊपर फेंको क्यों नीचे आता
कूकर सीटी कैसे बजाता.
दूध दही कैसे बन जाता
नीबू क्यों है इतना खटाता.
चिड़िया कैसे उड़ जाती हैं

आवाज़ फ़ोन मेँ कैसे आती है.
मुर्गी क्यों अंडा देती है
फ्रिज कैसे ठंडा देती है.
सवाल बहुतेरे जवाब ना कोई
इतनी जिज्ञासा ले सीमा सोयी.
नींद ना रात भर उसे पड़ी
खुली आँख उठ हुई खड़ी.

झट पट हो कर के तैयार
जा पहुंची स्कूल के द्वार.
मन मेँ उथल पुथल मची थी
प्रश्नों की एक लड़ी लगी थी.
जैसे ही मैडम जी आईं
सीमा ने कह व्यथा सुनाई.
बोली समझ ना कुछ आता है
यह सब कैसे हो जाता है.

मैडम बोलीं नन्ही जान
इन सबका उत्तर विज्ञान.
आओ मिलकर जाने इसे
जांचे परखें तब मानें इसे.
कोई बात तुम यूँही ना मानो
जब तक प्रयोग कर स्वयं ना जानो.

जो प्रयोग कर सिद्धांत बनाते
वोह ही वैज्ञानिक हैँ कहलाते.
हर कण कण मेँ विज्ञान बसा है
जीवन सुविधाओं से सजा है.
सुबह से लेकर शाम तुम्हारी
होती है विज्ञान से प्यारी.

घड़ी, बल्ब, पंखा और कार
सबका है विज्ञान आधार.
मोबइल, फैक्स और टेलीफोन
सब हैँ यह संचार के जोन.
रेडियो, टेलीविज़न और सिनेमा
सब में है विज्ञान रमा.

ट्रेक्टर, उर्वरक और ट्यूबवेल
करते हैँ यह क़ृषि सफल.
कंप्यूटर, इंटरनेट, प्रोजेक्टर
आते हैँ शिक्षा मे काम.
शैक्षिक उपग्रह EDUSAT
का भी तो बड़ा है नाम.
जितने प्रश्न सब संज्ञान मे है
सबका उत्तर विज्ञान मे है.

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(ज़ैतून ज़िया पिछले 5 सालों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। वर्तमान में आप उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सहायक अध्यापक के रूप में उच्च प्राथमिक विद्यालय गाजू, विकास खण्ड कछौना में काम कर रही हैं। आपको लिखना और पढ़ना दोनों बेहद पसंद हैं। इसके साथ ही विज्ञान शिक्षण को रोचक बनाने का प्रयास कर रही हैं। बतौर शिक्षक आपके पास निजी और सरकारी दोनों तरह के विद्यालयों में पढ़ाने का अनुभव है।)

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