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पुस्तकालय की सक्रिय मौजूदगी में किस तरह का समाज बनने की संभावना है?

cropped-IMG_-38w3hu.jpgअगर बचपन से पुस्तकालय के अनुभव के भरपूर मौके बच्चों को मिलेंगे तो बच्चों का बचपन ज्यादा ख़ुशहाल होगा। वे अपने आसपास की परिस्थिति को ज्यादा बेहतर ढंग से समझने वाले होंगे। उनके किसी पाठ या टेक्स्ट को समझ केसाथ पढ़ने की क्षमता का विकास होगा। ऐसे माहोल में बच्चे पढ़ी हुई सामग्री को अपनी जिंदगी से जोड़ पाएंगे और अपने मौलिक विचारों को व्यक्त करने के लिए प्रेरित होंगे। इस फायदों के साथ-साथ अन्य फायदे हैं कि उनकी भाषा समृद्ध होगी और उनके ऐसे दोस्तों की संख्या बढ़ेंगी जो संवाद के माध्यम से चीजडों को हल करने की परंपरा मे भरोसा करते हों।

लाइब्रेरी की मौजूदगी का समाज पर असर

ऐसे समाज में बच्चों और बड़े भी किसी परिस्थिति पर प्रतिक्रिया की बजाय सोच-विचारकर जवाब देने की संस्कृति को आगे बढ़ाएंगे। आपसी संवाद और विचार-विमर्श से मुद्दों का समाधान खोजने की प्रवृत्ति ऐसे समाज में होगी। सही अर्थों में ऐसा समाज जीवंत पुस्तक संस्कृति वाला समाज होगा, जहाँ किसी किताब का विरोध लेखक की हत्या या उसके ऊपर शारीरिक हिंसा के माध्यम से देने की कोशिश नहीं होगा। ऐसी प्रतिक्रियाओं का मुखर विरोध ऐसे समाज में होगा।

इस तरह के समाज में लोकतंत्र की जड़ें ज्यादा मजबूत होंगी। सरकार के सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक रचनात्मक संवाद होगा और समालोचना की स्वीकार्यता होगी। ऐसे समाज में रचनात्मकता का विकास होगा और सामान्य जनजीवन में ख़ुशहाली होगी। पहली स्थिति में समाज में पढ़ने का माहौल होगा, पढ़ने को प्रोत्साहन मिलेगा। पढ़ने की आदत विकसित करने को महत्वपूर्ण माना जाएगा। तथ्यों और तर्कों के आधार पर अपनी बात करने वाले व्यवहार को स्वीकार्यता मिलेगा और अफवाहों के माध्यम से समाज में टकराव या विभाजन की रेखा खींचने वाली कोशिशों को विफलता ही मिलेगी, ऐसी बात कही जा सकती है।

आखिर में कह सकते हैं कि ऐसे समाज में पुस्तकालय की स्थिति ज्यादा मजबूत और सक्रिय होगी। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पुस्तकालय के इस्तेमाल की आदत को प्रोत्साहन मिलेगा। समाज में समझ के साथ पढ़ने और मौलिक विचारों को व्यक्त करने का भयमुक्त माहौल उपलब्ध होगा।

विपरीत स्थिति में क्या होगा?

अगर किसी समाज में बच्चों को पुस्तकालय भरपूर अवसर नहीं मिले तो बच्चे समझ के साथ पढ़ना सीखने और पढ़ने के आनंद से रूबरू नहीं हो पाएंगे। बच्चों की डिकोड़िंग कौशल तो बेहतर होगी, लेकिन वे समझ के साथ पढ़ना सीखने में तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करेंगे। ऐसा समाज असहिष्णु समाज होगा। ऐसे समाज में ह्वाट्सऐप और फेसबुक पर लिखी जाने वाली अनाप-शनाप बातों और अखबारों में छपने वाली पेड सामग्री को भी सच मान लिया जाएगा। ऐसी स्थिति में समाज में पढ़े-लिखे लोगों की स्थिति कमज़ोर होगी। राजनीति व समाजिक सक्रियता में पढ़े-लिखे तबके की मौजदूगी कमज़ोर होगी। ऐसे समाज में लेखकों व विचारों के खिलाफ सुनियोजित तरीके से कमज़ोर करने के अभियान चलाए जाएंगे।

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