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समसामयिक चर्चाः लॉकडाउन में कैसे सिमट रहा है बच्चों का संसार?

यह चित्र उत्तराखंड के बच्चों ने जश्न-ए-बचपन की गतिविधि के दौरान बनाये हैं।

आज के इस वैश्विक महामारी कोरोना में रोगों पर विजय पाने का एक ही मूल मंत्र सामाजिक दूरी (सही संदर्भ में फिजिकल डिस्टेंसिंग यानि शारीरिक दूरी) है। वहीं भौतिकता से अंधे हो चुके लोगों के बीच पहले से व्याप्त इस दूरी को इस बीमारी ने कई गुना और बढ़ा दिया। मल्टीनेशनल कंपनियों ने जहाँ कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ अर्थात घर से ही कंप्यूटर के माध्यम से काम करने की छुट दे रखी है, विद्यालय बंद होने से बच्चे अपने-अपने घरों में कैद से हो गये हैं।

दुसरे शब्दों में ये कहें कि पहले जहाँ रोजी-रोटी की तलाश में सुबह से शाम तक सब भागने में मगन थे और घर सिर्फ नौकरों के हवाले था, छोटे बच्चे केयर टेकर के हवाले थे वहीं इस बीमारी ने एकल परिवार को एक सूत्र में बाँध दिया है। अब इसका फायदा कहें या नुकसान ये तो समय बतायेगा पर भौतिकता के इस युग में पारिवारिक सुरक्षा को समझने और महसूस करने का एक मौका तो लोगों को मिला ही है।

बच्चों का सिमटता संसार

इन सब बातों में जो सबसे बुरी चीज आज देखने को मिल रही है वो है बच्चों का सिमटता संसार। आज पूरा परिवार जब एक छत के नीचे है तो इसमें पति- पत्नी के कटु संबंधों को भी उजागर कर दिया है जिसका दुष्प्रभाव भी बच्चों के ऊपर पड़ रहा है। चीन जो महामारी का केंद्र था , वहाँ लॉक डाउन में तलाक की दर बढ़ गयी क्योंकि सब एक दुसरे पर हावी होने के होड़ में सामाजिक मर्यादा ही भूल गये। मानव जीवन आज कंप्यूटर, मोबाइल और टीवी का गुलाम बन गया है।

इस बात को आगे बढ़ाने के पहले मैं एक कहानी पर चर्चा करना चाहुंगा। कुछ साल पहले किसी व्यक्ति ने अपने कक्षा 6 में पढने वाले पुत्र के लिए एक करियर कोच से आई आई टी कोचिंग के बारे में सलाह मांगी तो करियर कोच भी परेशान हो गया और बोला – सर आपने निर्णय लेने में काफी देरी कर दी, आपको इसके जन्म के समय से ही कोचिंग का निर्णय ले लेना चाहिए। कहने का आशय यही है की हम अनावश्यक रूप से बच्चों पर एक दबाब बना रहे हैं।

“माँ बाप का अपने दायित्व से छुटकारा पाने और स्कुल से अधिक चाह जिससे बच्चे ज्यादा से ज्यादा पढाई और अन्य कार्यों में व्यस्त रहे ने बच्चों के ऊपर एक अनचाहा बोझ बढ़ा दिया है जो एक खतरनाक ट्रेंड है क्योंकि इससे बच्चे अपने बचपन को भूलते जा रहे हैं” – इशिता मुखर्जी – सीबीएसई रिसोर्स पर्सन

बच्चों पर ‘एक्सट्रा पढ़ाई’ का दबाव कितना सही?

यह दबाब सामाजिक स्पर्धा में आगे निकलने के लिए है। पर जब लोग कोरोना के चक्कर में घरों में रहने के लिए मजबूर हैं। बाहर की दुनिया के मनोरंजन के तमाम साधन जैसे पार्क, जिम या खेलने का मैदान सब बंद है तो अब माता-पिता अपने बच्चों को इस छुट्टी का सदुपयोग पढ़ाई के रूप में करवाना चाहते हैं। अधिक से अधिक घर पर पढ़ना, स्कूल द्वारा ऑनलाइन क्लासें भी चलायी जा रही हैं, तो स्कूल की पढाई, घर का काम और साथ में एक्स्ट्रा पढाई कि बच्चा और पढ़ाई में तेज़ हो सके।

हालात पर तब और अधिक चिंता होती है जब नर्सरी में पढने वाले बच्चों को भी एक्टिविटी के नाम पर ऑनलाइन क्लासेज करने पड़ रहे हैं।

सीबीएसई में शिक्षक प्रशिक्षक श्रीमती इशिता मुखर्जी ने एक चौकाने वाला वाकया सुनाया जहाँ एक नर्सरी के छात्र को एक्टिविटी के नाम पर आटा को क्ले के रूप में उपयोग करने और हल्दी, और विभिन्न रंगों की मदद से आकृति बनाना सिखाया जा रहा था। अब सवाल ये है क्या शिक्षा देने के नाम पर हम एक बच्चे से उसका बचपन तो नही छीन रहे? दो- तीन दशक पहले तक तो लोग 5 साल की उम्र तक घर में रहते और खेलते कूदते थे और ऐसा नही है वो जीवन में कुछ नहीं कर पाते थे।

किताबी शिक्षा के नाम पर बनाया जा रहा है दबाव

आज शिक्षा देने के होड़ में और वो भी सिर्फ किताबी ज्ञान देने के नाम पर हम 3 साल या उससे कम उम्र के बच्चों के ऊपर एक अनावश्यक दबाब बना रहे हैं। बच्चों के ऊपर पड़ने वाला यह मानसिक दबाव उसके मस्तिष्क विकास के लिए घातक हैं। क्यों ना हम इस छुट्टी का प्रयोग पारिवारिक समरसता बनाने में करें। ऐसे कई खेल है जो हम अपने समय में खेलते थे क्यों ना बच्चों के साथ बच्चा बनकर वो खेल खेले जहाँ हम भी अपने बचपन को जी सकें।

“बालपन से बच्चे खेलों की जगह टेलीविजन के कार्टून, youtube या ऑनलाइन गेम की वजह से सामाजिक नही हो पा रहें है और लॉकडाउन का यह समय अवश्य ही माता पिता को बच्चों से इस बुरी लत को छुड़ाने में व्यतीत किया जाना आवश्यक है” – नमिता झा

उन्हें लोककथाओं, आधुनिक समय में लिखी जा रही कहानियों के विपुल संग्रह से परिचित करा सकते हैं। कहानी सुनाकर एक शिक्षाप्रद जानकारी खेल खेल में दें। लूडो, कैरम, चेस, लुका-छिपी जैसे खेल घर में खेलें, पंचतंत्र, अकबर – बीरबल, तेनाली राम की कहानी, गणितीय पहेली से दिमागी कसरत कराएँ और उसके मानसिक विकास में योगदान दें।

बच्चों को वास्तविक अनुभव से रूबरू होने का समय दें

बड़े बच्चे जो कक्षा 6 से अधिक कक्षा में पढ़ते हैं उन्हें श्रम का महत्व समझाते हुए अपने कपड़े धोना, फूलों में पानी देना या घरेलू काम में मदद देना सीखा सकते है जिससे कल को अगर वो हॉस्टल जाएँ तो अपने काम को करने में किसी हिचकिचाहट का सामना ना करना पड़ें। बच्चों को अचानक से मिले अवकाश का अर्थ ये कभी नही है की हम सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्धी के लिए एक बचपन को नष्ट करने पर आमादा हो जाएँ। बचपन जीवन का सबसे अनमोल पल है जिसे जीना जरूरी है।

हम इस अवकाश का प्रयोग उसे एक कर्मठ इन्सान बनाने में लगायें जहाँ वो मानवीय संवेदना को महत्व दे सके। आज सड़क पर घायल व्यक्ति दम तोड़ देता है और कोई उसे अस्पताल नही पहुंचाता क्योंकि हम किताबी ज्ञान देने के चक्कर में मानवीय मूल्यों की शिक्षा देना ही भूल गये। क्यों ना हम अपने बच्चों को स्काइप या अन्य उपकरणों के मदद से दोस्तों से मिलाएं , दोस्तों के माँ बाप के साथ जुडकर एक सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ायें। आस- पास के गरीब मजदूरों को जिनकी रोजी रोटी इस महामारी ने छीन ली को खाना या अन्य जरूरत का सामान देकर सहयोग की भावना जगाने में करें।

जीवन को जीना सिखाने के लिए , मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए ही ये वैश्विक महामारी के इस संकट काल का उपयोग हम अपने आप को एक मशीन मानव नहीं, बल्कि एक ऐसा मानव जो ईश्वरीय कृति है के लिए करें।

(लेखक परिचयः डॉ राजेश कुमार ठाकुर वर्तमान में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , रोहिणी , सेक्टर 16 दिल्ली -110089 में बतौर शिक्षक काम कर रहे हैं। 60 पुस्तकें , 500 गणितीय लेख, 400 से अधिक ब्लॉग व 10 रिसर्च पेपर प्रकाशित। 300 से अधिक विद्यालयों में शिक्षक-प्रशिक्षण का अनुभव। इस लेख के संदर्भ में आपके विचार और अनुभव क्या है, टिप्पणी लिखकर बताएं)

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Jai Shekhar

इस लेख की बहुत सी बातें काम की हैं, खास कर इस विषम समय का उपयोग बच्चों को सामाजिक शिक्षा देने के लिए करना। मेरी बिटिया ने भी डस्टिंग सीखा, उबले आलू छीलना, औरअपनी प्लेट कटोरी धुलना, स्वयम से नहाना और कपड़े पहनना और सबसे जरूर स्वयम से भोजन करना सीखा है और कर रही है।अभी वह6 वर्ष की है।
यह समय दुलार का है और दुलार के साथ ऐसा सिखाने का भी जिससे बच्चा स्वावलम्बी बन सके।

Nishu marwaha

Very well said

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