
डॉ. केवल आनन्द काण्डपाल, रा0 उ0 मा0 वि0 पुड्कुनी, बागेश्वर, उत्तराखण्ड में प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार चिंतन और लेखन आपकी रोज़मर्रा की दिनचर्या का हिस्सा है। आपको हाल ही में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। आपको एजुकेशन मिरर की पूरी टीम की तरफ से बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
आप एजुकेशन मिरर के नियमित पाठक और सक्रिय लेखक भी हैं। आपकी लेखनी के विस्तार में अनुभवों की गहरी छाप को पढ़ते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है। एजुकेशन मिरर की शिक्षक इंटरव्यू सिरीज़ की पाँचवीं कड़ी में पढ़िए इस बातचीत का पहला हिस्सा।
एजुकेशन मिररः आपका बचपन कहाँ बीता और उन दिनों को आप कैसे याद करते हैं? आज के बच्चों के बचपन और अपने बचपन के दिनों में आप क्या बड़ा अंतर महसूस करते हैं?
डॉ. केवल आनंद काण्डपालः मेरे बचपन का शुरूआती हिस्सा 04 वर्ष की उम्र तक इलाहाबाद (अब प्रयाग) में गुजरा। मेरी जन्मभूमि इलाहाबाद की है। उस दौर की बहुत ही धुंधली यादें हैं। अपने घर की धुंधली सी तस्वीर याद है। इसके बाद अगले 6 वर्ष हल्द्वानी में व्यतीत हुए। इस दौर की बहुत सी बाते अच्छी से याद है। हमारा मुहल्ले में हिन्दू, मुस्लिम, सिख और एक क्रिस्टियन आंटी भी रहती थी। धर्म के आधार पर अपने मुहल्ले के परिवारों की पहचान मैं वर्तमान समझ के आधार कर पा रहा हूँ। उस दौर में तो सभी को चाचा, मामा, दादा, आंटी, ताई नानी के रूप में जानते थे। उस समय के बच्चे किसी भी घर में घुस सकते थे धमा-चौकड़ी मच सकते थे। कभी-कभी डांट भी मिलती थी परन्तु इतनी सख्त नहीं कि दुबारा उस घर में जाना न हो। इसके बाद के 4 वर्ष अपने पैतृक गाँव में गुजरे। वहां तो सारा गाँव ही अपना लगता था, हम बच्चे किसके घर में मिलेंगे, यह तय नहीं था परन्तु अपने घर में कोई नहीं मिलेगा यह तय था। आज के बचपन में वक़्त से पहले सयानापन आ गया है। अब बच्चे विद्यालय, होमवर्क, ट्यूशन और गैजेट्स में इतने व्यस्त हैं कि उनका बचपन कहीं खो गया है।
एजुकेशन मिररः स्कूली दिनों की कोई ख़ास घटना जो किसी शिक्षक या बच्चों से जुड़ी हुई हो अब तक आपको याद आती हो?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: घटनाएँ तो बहुत हैं। बचपन में मेरे दोस्त बहुत कम थे। मैंने कक्षा 7 से कक्षा 10 की पढाई गाँव में की है। वहीँ कक्षा 8 के साल की एक घटना याद आती है। हमारा किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया था और हमारी बोलचाल बंद थी। हम घर से साथ-साथ विद्यालय आते-जाते परन्तु आपस में बोलते नहीं थे। यह सिलसिला लगभग 3 माह चला। इस अवधि में हमारे घर पर कोई आने जाने वाला मिठाई लाता तो एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए हम चुपके से एक-दूसरे के झोले में रख देते परन्तु बातचीत नहीं होती। घर पर यहाँ तक पास पढ़ोस में किसी को भी इसकी खबर नहीं थी कि हमारी बोलचाल बंद है। कापियों का आदान-प्रदान छोटे भाई-बहनों के माध्यम से होता था, उनको भी इसकी खबर नहीं थी। हम आपस में बोलना शुरू करना चाहते थे परन्तु पहल कौन करे इसी पर बात अटकी थी। एक दिन मेरे इस मित्र की माँ जिनको में गाँव के रिश्ते में ताई जी कहता था किसी काम से हमारे साथ-साथ दुकान तक आयीं। रास्तेभर हमारी कोई बात न होते देख कर उन्होंने हम दोनों से पूछा “क्यों रे तुम्हारा झगड़ा तो नहीं हुआ है?” हाँ दोनों ही दोस्त एक साथ एक दूसरे का नाम लेकर बोल पड़े ‘तू बता झगड़ा हुआ है’। हम दोनो का जवाब था ‘नहीं तो’ और हमारी बोलचाल शुरू हो गयी। बाद में उस दिन तो हमने इतनी बातें की कि तो हमने इतनी बातें की कि पिछले तीन माह की कसर पूरी हो गयी। इतनी शिद्द्त से दोस्ती आज भी बच्चे निभाते होंगे क्या ? निभाते ही होंगे।
एजुकेशन मिररः आपके बचपन के दिनों में पाठ्य पुस्तकों के अलावा किस तरह की सामग्री आपको पढ़ने के लिए मिलती थी? अभी बच्चों को किस तरह का अवसर मिल रहा है, इस बारे में अपने अनुभव बताएं।
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: इसके दो उत्तर हैं जब तक मैंने हल्द्वानी में कक्षा 1 से कक्षा 6 तक अध्ययन किया, मुझे चंदा मामा, चंपक जैसी कहानी की पुस्तकें पिताजी हर माह बिना नागा लाकर देते रहे, अब मैं समझता हूँ कि छोटी सी तनख्वाह में ये सब जुटाना पिताजी के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहा होगा। विद्यालय में भी यहाँ तक कि प्राथमिक विद्यालय में अलमारी में पुस्तकें, पत्रिकायें रहती थी। विद्यालय में मध्यावकाश में कोई बच्चा पढना चाहे तो पढ़ने को मिलती थीं। शनिवार को जो बच्चा पढ़ने के लिए घर ले जाना चाहें, ले जाने की अनुमति थी। रविवार को हर हाल में पूरी पढ़कर सोमवार को विद्यालय में जमा कर देते थे हम बच्चे। हमारे बीच इसी बात की होड़ थी कि कौन कितनी पुस्ताकें/पत्रिकाएं पढ़ लेता है।
घर पर भी पाठ्य पुस्तक से इतर पुस्तकों को पढने पर रोक-टोक नहीं थी। पिता जी का कहना था कि आंखिर कुछ तो पढ़ ही रहा है, इसका फायदा ही होगा। माता जी बहुत बार स्कूल की किताबों से बाहर की चीज पढने पर नाराज़ रहती थीं। पिताजी के हस्तक्षेप से मामला मेरे पक्ष में सुलझ जाता था। गाँव में रहते पत्रिकाओं का सिलसिला तो टूट गया परन्तु स्कूल के छोटे से पुस्तकालय से बहुत सी पुस्तकें मैंने पढ़ी। आजकल बच्चों के पास समय ही कहाँ है ? होम वर्क है, ट्यूशन है, अंग्रेजी बोलने की क्लासेज हैं, ग्रूमिंग क्लासेज हैं, बच्चियों के लिए डांस-म्यूजिक की क्लासेज हैं, इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स हैं, पढने के लिए समय कहाँ से लाये बच्चे? फिर माता-पिता इसकी अनुमति दें, तब ना। अब बच्चे को जन्मदिन पर पुस्तकें नहीं मिलतीं, इसके अलावा अन्य चीजें भले ही मिल जाएँ।
एजुकेशन मिररः स्कूली दिनों के कोई शिक्षक जिनके पढ़ाने का तरीका आपको बेहद पसंद आया हो? उनके साथ जुड़ी कोई रोचक घटना साझा करें।
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: मेरे लिए तो सभी गुरु-जन बंदनीय हैं। मुझे कक्षा 7 एवं 8 के गुरु जी आदरणीय भास्कर पन्त जी का पढ़ाने तरीका बहुत अच्छा लगता था। मुझे याद नहीं है कि कभी इन्होने किसी बच्चे की पिटाई की हो। हमें हिंदी, संस्कृत पढ़ाते थे, कविता को तो इतने मधुर सुर में गाकर सुनाते थे कि हम बच्चों की उत्सुकता कविता में बढ़ जाती थी। इसी तरह संस्कृत के श्लोक लयताल में सुनाते थे कि इनका हिंदी में अर्थ जानने की उत्सुकता बढ़ जाती थी। मुझे अभी तक याद है कि उन्होंने हिंदी की पाठ्य पुस्तक के किसी भी पाठ को पैराग्राफ दर पैराग्राफ कभी नहीं पढ़ाया।
हाँ, किसी भी पाठ, कविता को शुरू करने से पहले पाठ एवं कविता से संदर्भित बहुत सी बातें करते थे, लेखक या कवि के बारे में बताते थे। इसके बाद ही पाठ एवं कविता की शुरुआत होती थी। दरअसल हममें इतनी अधिक उत्सुकता हो जाती थी कि उनके पाठ/कविता शरू करने से पहले ही हम बच्चे कई-कई बार पढ़ चुके होते थे। किसी पाठ से नाटक बनाना, नाटक की कहानी लिखना, कविता की कहानी बनाना, कहानी पर कविता लिखना आदि गतिविधियाँ हमने खूब की हैं। साहित्य में यत्किंचित रुचि या रुझान मुझ में है, यह सब उन्हीं गुरु जी की कृपा का प्रतिसाद है।
एजुकेशन मिररः अक्सर कहा जाता है कि हमारा प्रिय विषय वही होता है जिसे हमारे प्रिय शिक्षक या फेवरेट टीचर पढ़ा रहे होते हैं। इस विचार को लेकर क्या कहना चाहेंगे?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: इस विचार से सहमत हूँ। यहाँ पर इतना और जोड़ना चाहूँगा कि शिक्षक के प्रिय होने के एक से अधिक कारण भी हो सकते हैं। मुझे तो छोटी कक्षाओं में वो गुरुजन बहुत पसंद आते थे जो सभी बच्चों से एक सामान व्यवहार करते थे, उनको सभी प्रिय थे, वे सभी पर गुस्सा हो सकते थे। हाँ यह जरुर है कि यदि शिक्षक इस तरह से पढ़ाते हों कि पढने में रस आने लगे तो यकीनन वह हमारा प्रिय विषय बन जाता है। मुझे अपने के ऐसे गुरु जी श्री भाष्करानंद पन्त याद आते हैं,, जिन्होंने हमें कक्षा 7 एवं 8 में हिंदी और संस्कृत पढ़ाया था।

एजुकेशन मिररः आपके मन में पहली बार शिक्षक बनने का विचार कब आया? क्या इस विचार के पीछे किसी शिक्षक की प्रेरणा थी या इस क्षेत्र में जॉब की संभावनाओं ने आपको क़दम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: कक्षा 11 में बिज़नेस स्टडीज पढ़ाने वाले गुरु जी आदरणीय श्री बी. एन. गुप्ता जी को देखकर पहली बार मन में विचार आया कि मुझे शिक्षक बनना चाहिए। दरअसल कक्षा में उनका प्रोफेशनल तरीका बहुत पसंद आता था। उस दौरान हमारे विद्यालय में वही एकमात्र शिक्षक थे, जिनसे हम बहस कर सकते थे। कक्षा में अनुशासन पसंद और कक्षा के बाहर फ्रेंड की तरह पेश आने वाले श्री गुप्ता जी की अमिट छाप अभी तक मस्तिष्क में बनी हुई है। आप कक्षा में हमारे भावी सपनों के बारे में बात करते थे। तब सपने तो बहुत स्पष्ट नहीं थे परन्तु शिक्षक की छवि बहुत लुभाती थी। स्नातक अध्ययन के दौरान मेरे शिक्षक आदरणीय प्रो0 पूरण चन्द्र कविदयाल जी एवं प्रो0 भाष्कर दत्त अवस्थी जी ने इस सपने को स्पष्ट आकर देने में मदद की। वस्तुतः इन दोनों गुरुजनों का मुझे शिक्षक की भूमिका के लिए तैयार करने में अहम् योगदान है।
एजुकेशन मिररः शिक्षक बनने का फैसला करने के बाद आपने कौन सी पढ़ाई की और उन दिनों में क्या-क्या सपने और विचार आपके मन में आते थे कि मैं शिक्षक बनकर क्या-क्या करूंगा?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: मैं तो कहूँगा कि मेरी लगभग मेरी लगभग आधे से ज्यादा पढाई-लिखाई तो शिक्षक बनने के बाद ही हुई है। एल0 एल0 बी0, पी0 एच0 डी0, एल0 एल0 एम0, एम0 ए0 (शिक्षा शास्त्र, अर्थशास्त्र), विशेष शिक्षा में प्रोफेशनल डिप्लोमा आदि शिक्षक बनने के बाद ही किया। शिक्षक बनने के शुरूआती दिनों में तो एक तरह से जुनून था कि मेरे विषय का परीक्षाफल सबसे अच्छा रहे। सौभाग्य से ऐसा हुआ भी। केवल एक वर्ष को छोड़कर जब परीक्षाफल 98 प्रतिशत था, सभी वर्षों में 100 प्रतिशत रहा। बाद में कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़कर समझ बनी कि परीक्षाफल से ज्यादा महत्वपूर्ण है विद्यार्थियों में लगातार सीखने की ललक पैदा करना। बाद के वर्षों में इसी दिशा में काम किया और इसका परिणाम पहले से भी अच्छा रहा। विद्यार्थी सीखने की जिम्मेदारी लेने लगे, मेरी परीक्षाफल बेहतर रहने की चिंता भी जाती रही। इन बाद के वर्षों में मैंने शिक्षक जीवन का अधिक आनन्द उठाया। इस दौर के विद्यार्थी जो अब आर्थिक एवं पारिवारिक दृष्टि से स्थापित हो चुके हैं, सोशल मीडिया में मेरी फ्रेंड लिस्ट में हैं, उन दिनों को याद करते रहते हैं। इससे महसूस होता है कि संभवतः उस दौर में मेरी कोशिश सही दिशा में थी।
एजुकेशन मिररः जब आपको पहली बार किसी सरकारी/निजी या अन्य स्कूल में पढ़ाने का मौका मिला तो आपके कैसे अनुभव रहे? या आपने क्या महसूस किया?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: सौभाग्य से मुझे पहली बार एक ऐसे सरकारी विद्यालय में पढ़ाने का सुअवसर मिला, जहाँ शिक्षक के कार्य व्यवहार एवं आचरण के उच्च मानक थे। विद्यालय में मेरे वरिष्ठ शिक्षक एक से एक विलक्षण और विशिष्ट। प्रधानाचार्य आदरणीय श्री गोपाल कृष्ण पांथरी जी तो मेरे मेंटर ही थे। शिक्षक बनने के लिए मेरी शिक्षा भले ही पहले हो गयी हो परन्तु मुझे दीक्षित अपने ही किया। शिक्षक बनने के शुरूआती दो सालों में आपने रोज एक घंटा अपने कक्ष में बिठाकर बहुत सारी बातें सिखायीं, क्लास रजिस्टर में फीस भरना, अध्यापक डायरी भरना, पत्राचार, लोक व्यवहार आदि बहुत कुछ सिखाया। सीनियर शिक्षक भी हरदम मदद एवं सिखाने के लिए तत्पर रहते थे और कभी भी नया अध्यापक होने का अहसास नहीं होने देते थे। तब प्राइवेट स्कूलों का बोलबाला तो था नहीं, सरकारी विद्यालयों के प्रति समाज में विशेष तरह का सम्मान था और यह और बेहतर करने के लिए प्रेरित करता था।
एजुकेशन मिररः शुरूआती दिनों में शिक्षण के दौरान किस तरह की चुनौतियां आपके सामने आयीं और आपने कैसे उनका समाधान किया?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: विषय पढ़ाने में तो कोई विशेष चुनौती सामने नहीं आयी। मैंने ही अपने लिए ऊँचे मानक निर्धारित कर लिए थे कि परीक्षाफल शत-प्रतिशत रहना चाहिए। सो कभी-कभी उद्विग्नता बढ़ जाती थी। इसके लिए वरिष्ठ शिक्षकों से बात की, गिजूभाई बधेका की ‘दिवास्वप्न’, यशपाल समिति की रिपोर्ट ‘शिक्षा बिना बोझ के’ पढ़ीं। इसके बाद नजरिया बदला। बाद के वर्षों में समझ बनी कि यदि विद्यार्थियों में पढने की ललक जग जाए, वे सीखने की जिम्मेदारी लेने लगें तो भी परिणाम अच्छे ही होंगे। बाद के वर्षों में यह समस्या भी नहीं रही।
एजुकेशन मिररः आपके अनुसार शिक्षा के क्या-क्या उद्देश्य हो सकते हैं? शिक्षा किसी बच्चे को जीवन के लिए कैसे तैयार करती है?
डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल: जीवन की तैयारी के लिए शिक्षा के उद्देश्यों की स्पष्टता बहुत जरुरी है । हमारे देश के सन्दर्भ में कहें तो एक लोकतान्त्रिक देश के लिए शिक्षा का मुख्य उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि लोकतंत्र के लिए उपयोगी नागरिक हेतु जरुरी ज्ञान, कौशलों और मूल्यों का बीजारोपण करना। यह किसी विषय को पढने, उस विषय में अच्छे अंक लाने, किसी प्रतियोगी परीक्षा को पास करने से अधिक महत्वपूर्ण मूल्य है। एक होशियार डॉक्टर जो मरीजों की किडनी निकाल लेता था, हमारे समाज के लिए खतरनाक है। एक किसान जो पूरी इमानदारी और लगन से अपने खेतों में काम करता है, हमारे लोकतंत्र के लिए जरुरी है, समाज के लिए उपयोगी है।

शिक्षा यदि बच्चों को ज्ञान की सतत खोज करने के लिए प्रेरित करे, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन के कौशल सिखाए, भारत के संविधानिक मूल्यों के प्रति न केवल आस्था वरन इसको व्यवहार में अपनाने की प्रतिबद्धता पैदा करे, तभी हम कह सकते हैं कि शिक्षा अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। कक्षा-कक्ष में चलने वाला उपक्रम मात्र ही शिक्षा नहीं है। यह तो कक्षा में, कक्षा के बाहर, विद्यालय में, विद्यालय से बाहर भी सतत रूप से चलने वाली प्रक्रिया है। इन सभी जगहों में काम करने की, निर्णय लेने की, आपसी संवाद की, सीखने-सिखाने की, व्यवहार की सभी प्रक्रियाओं में लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन हो। सिद्धांत और व्यवहार में भेद न रहे, तभी हम कह सकते हैं कि बच्चे को एक जिम्मेदार नागरिक रूप में विकसित करने की तैयारी ठीक दिशा में चल रही है। कोई विषय पढ़ लेना, किसी पाठ को याद कर लेना, परीक्षा पास कर लेना, इस बड़े उपक्रम के छोटे-छोटे हिस्से है, हालांकि यह भी जरुरी है।
( डॉ0 केवल आनन्द काण्डपाल वर्तमान में उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में रा0 उ0 मा0 वि0 पुड्कुनी (कपकोट) में प्रधानाचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अध्ययन, शोध व अध्यापन में सक्रियता से काम कर रहे हैं। इस इंटरव्यू के बारे में आप अपनी राय टिप्पणी लिखकर या फिर Email: kandpal_kn@rediffmail.com के माध्यम से सीधे लेखक तक पहुंचा सकते हैं।)
तत्कालिक यथार्थता को इंगित करता हुआ यह साक्षात्कार अद्भुत प्रयास है प्रिय बृजेश।परंतु वर्तमान समय में शिक्षा और शिक्षक को लेकर सच्चाइयां ओझल होती नजर आ रही हैं। “हाथी के दांत खाने को कुछ और और दिखाने को कुछ और” कहावत चरितार्थ होती है ।यह अपने आप में एक गम्भीर चिंतन का विषय है। तुम्हारा प्रयास सार्थक है। समाज की दशा को स्पष्ट करते हुए दिशा प्रदान करने का अद्भुत प्रयास।
प्रतिभा शक्ला