Trending

मुजफ्फरनगर: पढ़ाई के नाम पर ‘नफरत का एजेंडा व शारीरिक दण्ड’ स्वीकार्य नहीं

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक निजी स्कूल में शिक्षिका द्वारा एक बच्चे की अन्य बच्चों द्वारा पिटाई करवाने का मामला सुर्खियों में है। यह घटना ट्विटर पर भी ट्रेंड कर रही है। मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार एक मुस्लिम बच्चे को प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका ने पाँच का पहाड़ा न सुना पाने पर कक्षा में मौजूद अन्य बच्चों से उसे थप्पड़ मारने को कहा और अन्य बच्चों के सामने उसके ऊपर धार्मिक भेदभाव करने वाली टिप्पणी भी की।

इस दौरान कक्षा में अन्य बच्चों से पिटने वाला यह बच्चा रो रहा है, लेकिन फिर भी एक शिक्षक से अपेक्षित संवेदनशील व्यवहार की झलक ‘शिक्षिका’ की तरफ से प्रदर्शित नहीं हो रही है। इस घटना पर सबसे पहली बात तो यही कही जा सकती है कि किसी भी शिक्षक के द्वारा बच्चों के साथ जाति, धर्म, संप्रदाय, पारिवारिक पृष्ठभूमिक, सामाजिक-आर्थिक आधार पर होने वाला भेदभाव एक लोकतांत्रिक देश में दी जाने वाली शिक्षा में किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

बच्चों को विद्यालय में मिले ‘भयमुक्त वातावरण’

किसी भी विद्यालय में ‘भयमुक्त वातावरण’ का होना बच्चों के सीखने और उनके स्वाभाविक विकास के लिए आवश्यक है। शिक्षा का अधिकार क़ानून और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 बड़े ही स्पष्ट शब्दों में शारीरिक दण्ड के विचार को अस्वीकार करते हैं। किसी भी शिक्षक को अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर किसी समुदाय के बच्चों को टार्गेट करने, उसके साथ भेदभाव करने और अन्य बच्चों के बीच उसके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की बखिया उधेड़ने का अधिकार नहीं है। इस घटना को एक संज्ञेय अपराध की नज़रिये से देखते हुए कठोर कार्रवाई करनी चाहिए और एफआईआर दर्ज़ करनी चाहिए। अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों ने एक घटना के विरोध में एक दिन स्कूल बंद रखने का फैसला किया था। निजी स्कूलों के संचालन के तौर-तरीकों की निगरानी करने की आवश्यकता है और इनको भी विभिन्न मुद्दों पर संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

मानसिकता में बदलाव की जरूरत

किसी भी बच्चे द्वारा ‘पाँच का पहाड़ा न सुना पाना’ कोई अपराध नहीं है। मूल समस्या बच्चों के खिलाफ एक ख़ास तरह की मानसिकता व पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर भेदभाव वाला व्यवहार करना और उसे शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित करना है। इसके लिए शिक्षक को भी त्वरित न्याय करने वाले व्यवहार से बचना चाहिए। अन्य बच्चों को इस घटना में शामिल करना एक बड़ा दुखद पहलू है जिसकी पड़ताल होनी चाहिए और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इस आशय का एक सर्कुलर पूरे प्रदेश में संचालित सभी निजी-सरकारी स्कूलों के लिए जारी होना चाहिए। इसके साथ ही साथ संबंधित जिम्मेदारी लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

एक पल को हम-आप यह मान लें कि अगर इस घटना का वीडियो वायरल नहीं होता तो हमें पता ही नहीं चलता कि इस निजी स्कूल में क्या हो रहा है। लेकिन बच्चों को इस घटना का पूरा पता होता। वहाँ के गाँव/समुदाय के लोगों को इस घटना के बारे में बच्चों से जानकारी होती। लेकिन उस एक बच्चे के लिए यह घटना पूरे जीवनभर के लिए एक ऐसा भयानक अनुभव बन गई,जो वह जीवनभर नहीं भूल पाएगा। अन्य बच्चों द्वारा उसका मजाक उड़ाये जाने की भी आशंका है। एक मासूम के मन पर इसका विपरीत मनोवैज्ञानिक असर पड़ेगा। इस संदर्भ में बच्चे को काउंसिलिंग के माध्यम से सपोर्ट करना चाहिए। उसको पड़ोस के किसी अन्य विद्यालय में दाख़िला दिलवाने व उसकी शिक्षा जारी रहने को लेकर भी सहयोग करना चाहिए।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x