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बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

कविता: पंक्षी हैं हम खुले आसमान के

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पंछी हैं हम 

खुले आसमान के

खेलते हैं हम 

पेडों की छाँव में। 

 

हम नदी का पानी पीते हैं 

और शांति से रहते हैं

और अच्छे से भी जीते हैं। 

पर तब भी लोगों को सहते हैं

 

वे लोग हमें पकड़ कर 

पिंजरों में बंद कर देते हैं। 

वे लोग हमें रुलाकर 

हमारी आज़ादी छीन लेते हैं 

 

हमें चैन से जीने दो 

हमें पिंजरों में मत पकड़ो 

खुले आसमान की सांस लेने दो 

 

परतंत्रता की जंजीरों में

मत जकड़ो हमें 

क्यूंकि पंछी हैं हम  खुले आसमान के 

खेलते हैं हम 

पेडों की छाँव में।   

 

इस कविता के लेखक चैतन्य मलहोत्रा हैंजो कक्षा सातवीं में पढ़ते हैं।

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